- फूड सेफ्टी ऑफिसरों की वरिष्ठता पर घमासान,हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी नहीं थमा विवाद
- हाईकोर्ट ने कहा…2015 और 2016 की नियुक्ति
- अलग,फिर भी सरकार ने रिव्यू का रास्ता क्यों चुना?
- हाईकोर्ट ने निरस्त किया विभागीय आदेश,फिर
- भी रिव्यू में गई सरकार…आखिर क्या है वजह?
- वरिष्ठता विवाद से आगे बढ़ा मामला,अब शैक्षणिक योग्यता पर भी उठे गंभीर सवाल
- सर्वेश-सिद्धार्थ की वरिष्ठता पर हाईकोर्ट की आपत्ति,अब पात्रता पर भी जांच की मांग तेज
- पहले वरिष्ठता या पहले पात्रता
- की जांच? फूड सेफ्टी ऑफिसरों के
- विवाद ने खड़े किए बड़े सवाल
- वरिष्ठता, पदोन्नति और शैक्षणिक योग्यता…फूड सेफ्टी विभाग का विवाद गहराया
- हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी नहीं थमा विवाद, वरिष्ठता के साथ अब डिग्री पर भी सवाल
- क्या नियमों से ऊपर है विभागीय बचाव? वरिष्ठता विवाद के बीच शैक्षणिक
- योग्यता की जांच की मांग…
- हाईकोर्ट ने खारिज की वरिष्ठता की दलील, फिर भी रिव्यू में सरकार…अब सर्वेश-सिद्धार्थ की पात्रता पर भी उठे सवाल
- 2015 और 2016 की अलग नियुक्ति को एक करने पर हाईकोर्ट ने जताई आपत्ति,नियुक्ति में प्रयुक्त शैक्षणिक योग्यता की जांच की मांग के बीच शासन के फैसले पर उठ रहे प्रश्न
रवि सिंह
रायपुर/बिलासपुर,12 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग में फूड सेफ्टी ऑफिसरों की वरिष्ठता को लेकर वर्षों से चल रहा विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है,छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वर्ष 2015 और वर्ष 2016 की अलग-अलग भर्ती प्रक्रियाओं से नियुक्त अधिकारियों को एक ही वरिष्ठता सूची में शामिल करना सेवा नियमों के अनुरूप नहीं है, न्यायालय ने विभाग द्वारा जारी वरिष्ठता सूची के आधार बने आदेश को निरस्त करते हुए पूरे मामले पर पुनर्विचार का निर्देश दिया था,लेकिन अब राज्य शासन ने उस आदेश को लागू करने के बजाय उसके खिलाफ पुनर्विलोकन (रिव्यू) याचिका दायर करने का निर्णय लिया है।
क्या है पूरा मामला?-विवाद वर्ष 2021 में जारी फूड सेफ्टी ऑफिसरों की वरिष्ठता (ग्रेडेशन) सूची से जुड़ा है,इस सूची में वर्ष 2015 में नियुक्त कुछ अधिकारियों को वर्ष 2016 में नियुक्त अधिकारियों से नीचे स्थान दिया गया था। इसी को चुनौती देते हुए अपर्णा आर्या,राखी ठाकुर और सरिता पटेल ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की थी,याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनकी नियुक्ति दिसंबर 2015 में हुई थी,जबकि सर्वेश कुमार यादव,सिद्धार्थ पांडे और एक अन्य अधिकारी की नियुक्ति मार्च 2016 में हुई,इसके बावजूद विभाग ने वरिष्ठता सूची में वर्ष 2016 में नियुक्त अधिकारियों को उनसे ऊपर स्थान दे दिया,जिससे उनकी पदोन्नति और अन्य सेवा लाभ प्रभावित हो रहे हैं।
वरिष्ठता ही तय करती है पदोन्नति का भविष्य- सरकारी सेवाओं में वरिष्ठता केवल सूची तक सीमित नहीं होती, उसी के आधार पर पदोन्नति,चयन वेतनमान, विभागीय पदस्थापन और भविष्य के कई प्रशासनिक निर्णय लिए जाते हैं,यदि बाद में नियुक्त अधिकारी को वरिष्ठता में ऊपर रखा जाता है तो पहले नियुक्त कर्मचारियों के संवैधानिक और सेवा संबंधी अधिकार प्रभावित होते हैं, यही कारण था कि इस मामले में वरिष्ठता सूची को लेकर विवाद सीधे पदोन्नति से जुड़ गया।
आदेश लागू करने के बजाय सरकार पहुंची रिव्यू में-हाईकोर्ट के निर्देश के बाद उम्मीद थी कि विभाग न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए वरिष्ठता सूची पर पुनर्विचार करेगा,लेकिन 10 जुलाई 2026 को विधि एवं विधायी कार्य विभाग ने महाधिवक्ता कार्यालय को पत्र जारी कर स्पष्ट कर दिया कि राज्य शासन ने 28 अप्रैल 2026 के आदेश के खिलाफ पुनर्विलोकन (रिव्यू) याचिका दायर करने का निर्णय लिया है,महाधिवक्ता कार्यालय को समय-सीमा के भीतर रिव्यू पिटीशन दाखिल करने तथा कार्रवाई से विभाग को अवगत कराने के निर्देश दिए गए हैं, साथ ही स्वास्थ्य विभाग को भी आवश्यक समन्वय करने के लिए पत्र भेजा गया है।
रिव्यू के फैसले पर टिकी विभाग की निगाहें- अब यह पूरा मामला एक बार फिर न्यायालय के समक्ष जाएगा,रिव्यू पिटीशन पर आने वाला निर्णय केवल तीन याचिकाकर्ताओं या संबंधित अधिकारियों तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग में वरिष्ठता निर्धारण,पदोन्नति और भविष्य की सेवा संबंधी व्यवस्थाओं पर भी व्यापक प्रभाव डाल सकता है, फिलहाल इतना स्पष्ट है कि हाईकोर्ट ने अलग-अलग भर्ती वर्षों को मिलाकर वरिष्ठता तय करने की प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं,जबकि राज्य शासन उस आदेश की न्यायिक समीक्षा चाहता है, अब अंतिम निर्णय न्यायालय के रिव्यू आदेश पर निर्भर करेगा।
वरिष्ठता से पहले शैक्षणिक योग्यता की जांच क्यों नहीं?– फूड सेफ्टी ऑफिसर पद पर सर्वेश कुमार यादव और सिद्धार्थ पांडे के नाम केवल वरिष्ठता और पदोन्नति विवाद तक सीमित नहीं हैं,इन दोनों अधिकारियों की शैक्षणिक योग्यता और नियुक्ति की पात्रता को लेकर भी लंबे समय से शिकायतें विभिन्न स्तरों पर की जाती रही हैं, हाल ही में मुख्यमंत्री,मुख्य सचिव,स्वास्थ्य विभाग, एफएसएसएआई,ईओडब्ल्यू और एसीबी सहित कई संस्थाओं को भेजे गए शिकायत-पत्र में भी मांग की गई है कि फूड सेफ्टी ऑफिसरों की नियुक्ति और पदोन्नति में प्रयुक्त शैक्षणिक योग्यता,डिग्री की वैधता तथा एफएसएसएआई नियमों के अनुरूप पात्रता की स्वतंत्र जांच कराई जाए, ऐसे में विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि जब संबंधित अधिकारियों की मूल पात्रता और शैक्षणिक दस्तावेजों पर ही शिकायतें लंबित हैं, तब उनकी वरिष्ठता और पदोन्नति का बचाव करने की इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई जा रही है? प्रशासन पहले यह स्पष्ट क्यों नहीं करता कि जिन अधिकारियों को पदोन्नति का लाभ मिला,वे नियुक्ति के समय निर्धारित योग्यता और पात्रता की सभी शर्तों को पूरा करते थे या नहीं? कई शिकायतकर्ताओं का तर्क है कि यदि किसी अधिकारी की नियुक्ति की वैधता या शैक्षणिक योग्यता ही जांच के दायरे में है,तो उस स्थिति में उसकी पदोन्नति का प्रश्न स्वाभाविक रूप से द्वितीयक हो जाता है,पहले यह तय होना चाहिए कि संबंधित अधिकारी की नियुक्ति विधिसम्मत थी या नहीं,यदि नियुक्ति ही नियमों के अनुरूप नहीं पाई जाती, तो उसके आधार पर दी गई पदोन्नति और वरिष्ठता भी स्वतः विवाद के घेरे में आ सकती है, शिकायतों में यह भी मांग की गई है कि वर्ष 2011 से अब तक फूड सेफ्टी ऑफिसर पद पर हुई सभी नियुक्तियों और पदोन्नतियों की स्वतंत्र जांच कराई जाए, सभी अधिकारियों की शैक्षणिक योग्यता का सत्यापन कराया जाए तथा जांच पूरी होने तक प्रस्तावित पदोन्नतियों पर भी विचार रोका जाए, हालांकि,यह भी उल्लेखनीय है कि अब तक किसी सक्षम जांच एजेंसी या न्यायालय ने सर्वेश कुमार यादव अथवा सिद्धार्थ पांडे की शैक्षणिक योग्यता या नियुक्ति को अवैध घोषित नहीं किया है, वर्तमान में ये आरोप शिकायतों और जांच की मांग के रूप में हैं, संबंधित अधिकारियों और विभाग का विस्तृत पक्ष सामने आना तथा सक्षम प्राधिकारी द्वारा जांच पूरी होना अभी शेष है।
विभाग ने मेरिट सूची का दिया था आधार…
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से हाईकोर्ट में यह तर्क दिया गया कि वरिष्ठता सूची छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (सामान्य सेवा शर्तें) नियम, 1961 के नियम-12 के अनुसार तैयार की गई है,विभाग का कहना था कि चूंकि सर्वेश कुमार यादव और सिद्धार्थ पांडे चयन की मेरिट सूची में ऊपर थे,इसलिए उन्हें वरिष्ठता सूची में भी ऊपर रखा गया, इसी आधार पर विभाग ने न्यायालय से याचिका खारिज करने की मांग की।
हाईकोर्ट ने माना—दो अलग नियुक्तियां
प्रक्रियाओं को नहीं जोड़ा जा सकता
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडे ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2015 और वर्ष 2016 की अलग-अलग नियुक्तियां प्रक्रिया का परिणाम थीं,ऐसे में दोनों वर्षों के अधिकारियों को एक ही संयुक्त वरिष्ठता सूची में रखना नियम-12 की भावना के विपरीत है, न्यायालय ने कहा कि जब भर्ती वर्ष अलग हैं,तो वरिष्ठता निर्धारण भी उसी आधार पर होना चाहिए,अदालत ने 18 नवंबर 2021 के विभागीय आदेश को निरस्त करते हुए संबंधित प्राधिकारी को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं की वरिष्ठता पर नए सिरे से विचार किया जाए और 60 दिनों के भीतर निर्णय लिया जाए।
क्या उठ रहे हैं सवाल?
सरकार के इस फैसले के बाद विभागीय हलकों में कई सवाल चर्चा का विषय बने हुए हैं,सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब हाईकोर्ट ने अलग-अलग भर्ती वर्षों की संयुक्त वरिष्ठता सूची पर स्पष्ट आपत्ति जताते हुए पुनर्विचार का निर्देश दिया था,तब विभाग ने पहले न्यायालय के निर्देशों का पालन करने के बजाय रिव्यू याचिका का रास्ता क्यों चुना? दूसरा सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सरकार विभाग द्वारा पूर्व में जारी वरिष्ठता सूची का विधिक बचाव कर रही है, या उसके पास ऐसे अतिरिक्त कानूनी आधार हैं जिन्हें वह अब रिव्यू याचिका में न्यायालय के समक्ष रखना चाहती है? इन प्रश्नों का उत्तर फिलहाल शासन की रिव्यू याचिका और उसके तर्क सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा।
सरकार का पक्ष जानना भी जरूरी
यह उल्लेखनीय है कि उपलब्ध सरकारी पत्र में केवल रिव्यू पिटीशन दायर करने के निर्णय का उल्लेख है, उसमें यह नहीं बताया गया है कि राज्य शासन किन विशिष्ट कानूनी आधारों पर हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दे रहा है,इसलिए यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि किसी विशेष अधिकारी को नियमों के विपरीत लाभ देने का प्रयास किया जा रहा है। इस संबंध में सरकार का विस्तृत पक्ष अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है।
रिव्यू पिटीशन पर टिकी सबकी नजर…
अब पूरा मामला पुनः हाईकोर्ट के समक्ष जाएगा। रिव्यू पिटीशन पर आने वाला फैसला केवल कुछ अधिकारियों की वरिष्ठता तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग में भविष्य की वरिष्ठता सूची,पदोन्नति प्रक्रिया और सेवा नियमों की व्याख्या पर भी व्यापक प्रभाव डालेगा, इसके साथ ही यदि शैक्षणिक योग्यता और पात्रता संबंधी शिकायतों की स्वतंत्र जांच होती है, तो उसका प्रभाव भी इस पूरे विवाद की दिशा तय कर सकता है।
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