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कोरिया/बैकुंठपुर@ दो साल,दो नाबालिग,दो आत्महत्याएं…क्या व्यवस्था और समाज की संवेदनशीलता भी दो हिस्सों में बंट गई?

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  • 2024 में पुलिस पर प्रताड़ना के आरोप,2026 में दुकान संचालकों पर कार्रवाई की मांग…आखिर समाज का पैमाना अलग क्यों?
  • पटना से बैकुंठपुर तक : दो नाबालिगों की मौत ने खड़े किए एक जैसे सवाल क्या न्याय की आवाज भी व्यक्ति देखकर उठती है?
  • दो घटनाएं,एक सवाल : नाबालिगों की मौत पर क्या समाज और व्यवस्था का रवैया एक जैसा रहा?
  • एक मामले में पुलिस पर आरोप, दूसरे में दुकान संचालकों पर…दो साल में दो आत्महत्याओं ने खोल दी व्यवस्था की परतें
  • नाबालिगों की दो मौतें,दो अलग प्रतिक्रियाएं…क्या न्याय का पैमाना भी बदल जाता है?
  • दो साल में दो नाबालिगों ने गंवाई जान,क्या संवेदनशीलता और जवाबदेही भी दो हिस्सों में बंट गई?
  • पटना से बैकुंठपुर तक : क्या कोरिया में नाबालिगों से जुड़े मामलों से व्यवस्था ने सबक लिया?
  • वर्ष 2024 में पुलिस पर लगे कथित प्रताड़ना के आरोपों से लेकर वर्ष 2026 में दुकान संचालकों पर दर्ज एफआईआर तक—दोनों घटनाओं ने पुलिस, समाज और न्याय व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर बहस छेड़ दी है…

-रवि सिंह-
कोरिया/बैकुंठपुर,12 जुलाई 2026 (घटती-घटना)।
किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और सबसे असहाय व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है,जब बात नाबालिग बच्चों की हो,तो यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है, कोरिया जिले में पिछले दो वर्षों के भीतर नाबालिगों की आत्महत्या से जुड़े दो ऐसे मामले सामने आए, जिन्होंने पूरे जिले को झकझोर दिया, दोनों घटनाएं अलग-अलग समय और परिस्थितियों में हुईं, दोनों की कानूनी स्थिति अलग है,लेकिन दोनों घटनाओं में एक समानता दिखाई देती है दोनों मामलों में आत्महत्या से पहले कथित मानसिक प्रताड़ना के आरोप सामने आए,यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या समाज और व्यवस्था ने दोनों मामलों को समान संवेदनशीलता से देखा? या फिर आरोप किस पर हैं, इसके आधार पर प्रतिक्रिया बदल गई?
पहला मामलाः वर्ष 2024,पटना थाना क्षेत्र और नाबालिग की आत्महत्या- 20 नवंबर 2024 को पटना थाना क्षेत्र में एक नाबालिग के गुम होने के बाद उसका शव बरामद हुआ,उस मामले की जांच के दौरान पुलिस एक अन्य 14 वर्षीय नाबालिग को पूछताछ के लिए थाने लेकर आई,बाद में मृतक नाबालिग के पिता द्वारा राज्यपाल,राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग सहित विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं को दिए गए आवेदन में आरोप लगाया गया कि उनके पुत्र के साथ थाने में मारपीट, धमकी और मानसिक प्रताड़ना की गई,आवेदन में यह भी कहा गया कि पूछताछ के बाद शाम को उसे छोड़ दिया गया, लेकिन अगले ही दिन उसने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली, परिजनों का आरोप था कि पुलिस के व्यवहार और मानसिक दबाव के कारण नाबालिग ने यह कदम उठाया,उस समय इस मामले को लेकर कई समाचार प्रकाशित हुए, पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे और बाल अधिकारों के उल्लंघन का मुद्दा भी सामने आया, हालांकि पुलिस ने अपनी जांच आगे बढ़ाई और मूल हत्या प्रकरण में चालान भी पेश किया,लेकिन परिजनों द्वारा लगाए गए प्रताड़ना के आरोपों पर आज तक कोई स्पष्ट सार्वजनिक निष्कर्ष सामने नहीं आया।
दूसरा मामला : वर्ष 2026,नाबालिग आदिवासी छात्रा की आत्महत्या-लगभग दो वर्ष बाद 7 जुलाई 2026 को बैकुंठपुर में एक और नाबालिग की आत्महत्या ने पूरे जिले को हिला दिया, एफआईआर के अनुसार नाबालिग आदिवासी छात्रा पर एक दुकान में चोरी का आरोप लगाया गया,शिकायत में आरोप है कि दुकान संचालकों ने उसे घंटों बैठाकर रखा, मानसिक दबाव बनाया,धन की मांग की और उसकी स्कूटी रोक ली, अगले दिन छात्रा ने आत्महत्या कर ली,इस मामले में तीन दिन बाद अपराध दर्ज हुआ और आरोपियों के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता तथा अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज किया गया,इसके बाद पूरे जिले में व्यापक जनआंदोलन देखने को मिला,पुलिस परिवार स्वयं सड़क पर उतरा, राजनीतिक दल सक्रिय हुए और आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग तेज हो गई।
दोनों घटनाएं अलग,लेकिन सवाल एक जैसे- यह स्पष्ट है कि दोनों मामलों की परिस्थितियां अलग थीं, एक मामले में आरोप पुलिस पर लगे, दूसरे मामले में आरोप निजी दुकान संचालकों पर लगे, लेकिन यदि दोनों मामलों की सामाजिक प्रतिक्रिया को देखा जाए,तो कई लोगों के मन में प्रश्न उठ रहे हैं, क्या वर्ष 2024 में भी उतनी ही ताकत से समाज पुलिस कर्मियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग को लेकर सामने आया था? क्या तब भी हजारों लोग सड़क पर उतरे थे? क्या तब भी उतना ही दबाव बनाया गया था जितना आज बनाया जा रहा है? यही वे प्रश्न हैं जिन पर चर्चा हो रही है।
क्या समाज भी व्यक्ति देखकर तय करता है कि किसके लिए आवाज उठानी है?- यह प्रश्न केवल पुलिस या प्रशासन से जुड़ा नहीं है,यह समाज से भी जुड़ा हुआ प्रश्न है,यदि किसी मामले में आरोपी पुलिसकर्मी हो,तो क्या समाज उतनी मजबूती से खड़ा होता है? और यदि आरोपी कोई निजी व्यक्ति या व्यापारी हो, तो क्या प्रतिक्रिया बदल जाती है? लोकतंत्र में न्याय का सिद्धांत यही कहता है कि पीडि़त की पीड़ा बराबर होती है,प्रताड़ना यदि किसी पुलिसकर्मी ने की हो तो भी उतनी ही गंभीर है,और यदि किसी निजी व्यक्ति ने की हो तो भी उतनी ही गंभीर है।
क्या दोनों मामलों में एक जैसी जवाबदेही तय हुई?- वर्ष 2024 के मामले में परिजनों ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए, उन्होंने कहा कि नाबालिग को मानसिक रूप से प्रताडि़त किया गया,यदि यह आरोप गलत थे तो जांच में सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए थी,यदि आरोप सही थे तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए थी,आज भी कई लोग यह प्रश्न पूछते हैं कि उस मामले में आखिर कार्रवाई किस स्तर तक पहुंची।
नाबालिग आदिवासी छात्रा प्रकरण में तेजी से बढ़ा सामाजिक दबाव– इसके विपरीत नाबालिग आदिवासी छात्रा मामले में समाज बड़ी संख्या में सामने आया, पुलिस परिवार स्वयं सड़क पर उतर आया, राजनीतिक दल सक्रिय हो गए,पूर्व विधायक, जनप्रतिनिधि,सामाजिक संगठन और स्थानीय नागरिक लगातार कार्रवाई की मांग करते रहे,यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की सकारात्मक तस्वीर भी है कि समाज न्याय की मांग कर रहा है,लेकिन इसी के साथ यह तुलना भी सामने आ रही है कि क्या वर्ष 2024 में भी यही संवेदनशीलता दिखाई गई थी?
क्या कानून सबके लिए समान है?
यह पूरा घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न भी खड़ा करता है, यदि किसी निजी व्यक्ति पर यह आरोप लगता है कि उसकी कथित प्रताड़ना, धमकी या मानसिक दबाव के कारण किसी ने आत्महत्या की, तो पुलिस प्रथम दृष्टया अपराध दर्ज कर जांच शुरू करती है, ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि यदि किसी मामले में पुलिसकर्मियों पर भी प्रताड़ना या मानसिक दबाव के ऐसे ही आरोप लगाए जाएं और आरोप हो कि उसी के कारण किसी व्यक्ति ने आत्महत्या की, तो क्या उस स्थिति में भी समान कानूनी कसौटी पर जांच और आवश्यक होने पर अपराध दर्ज नहीं होना चाहिए? लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानून के शासन का मूल सिद्धांत यही है कि कानून की नजर में सभी समान हैं, इसलिए ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच, समान मानदंड और जवाबदेही ही न्याय व्यवस्था पर जनता के विश्वास को मजबूत कर सकती है।
दोहरा चरित्र या अलग परिस्थितियां?-कई लोग इसे समाज का दोहरा चरित्र कह रहे हैं,वहीं कुछ लोगों का तर्क है कि दोनों मामलों की परिस्थितियां अलग थीं,इसलिए प्रतिक्रिया भी अलग रही,सच्चाई जो भी हो,लेकिन यह बहस अब सार्वजनिक हो चुकी है।
सबसे बड़ा सवाल—क्या हर नाबालिग बराबर है?- दोनों मामलों से सबसे बड़ा प्रश्न यही निकलकर सामने आता है क्या हर नाबालिग के अधिकार बराबर हैं? क्या हर बच्चे की मौत समान संवेदनशीलता की हकदार है? क्या न्याय की मांग व्यक्ति देखकर होनी चाहिए? या केवल इस आधार पर कि एक बच्चा अब इस दुनिया में नहीं रहा?
पुलिस और समाज—दोनों के लिए आत्ममंथन का समय- इन दोनों घटनाओं ने केवल पुलिस व्यवस्था को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को आईना दिखाया है,पुलिस के लिए यह आवश्यक है कि नाबालिगों से जुड़े मामलों में पूछताछ, हस्तक्षेप और संकट प्रबंधन के दौरान अधिक संवेदनशील और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जाए, वहीं समाज को भी यह तय करना होगा कि उसकी आवाज किसी व्यक्ति, संस्था या पद के आधार पर नहीं, बल्कि न्याय के सिद्धांत पर उठनी चाहिए।
न्याय का पैमाना एक होना चाहिए-यह लेख किसी मामले में दोष तय करने का प्रयास नहीं है, दोनों मामलों में अंतिम सत्य जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही सामने आएगा, लेकिन दोनों घटनाओं ने एक ऐसा सवाल जरूर छोड़ दिया है,जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, यदि एक नाबालिग की मौत पर पूरा समाज सड़क पर उतरता है और दूसरी घटना में अपेक्षाकृत खामोश रहता है,तो यह आत्ममंथन का विषय है,कानून का शासन तभी मजबूत होगा जब न्याय का पैमाना हर व्यक्ति के लिए समान होगा, चाहे आरोप किसी पुलिसकर्मी पर हों, किसी प्रभावशाली व्यक्ति पर हों या किसी सामान्य नागरिक पर—जवाबदेही,संवेदनशीलता और निष्पक्षता का स्तर एक जैसा होना चाहिए, तभी समाज यह विश्वास कर पाएगा कि न्याय व्यक्ति देखकर नहीं, बल्कि तथ्य और कानून देखकर किया जाता है।


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