

श्रम और स्नेह का अनूठा संगम : जहाँ पसीने की खुशबू और रिश्तों की मिठास एक हो जाती है…
सिर्फ पारिश्रमिक नहीं,सम्मान का पर्वः जहाँ श्रम का मोल प्रेम,विश्वास और अपनत्व से चुकाया जाता है…
राजन पाण्डेय
कोरिया,12 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ के सरगुजा और कोरिया अंचल की पहचान केवल धान के कटोरे के रूप में ही नहीं, बल्कि अपनी जीवंत लोक परंपराओं और मानवीय मूल्यों के कारण भी है,यहां खेती केवल आजीविका का साधन नहीं,बल्कि संस्कृति,रिश्तों और सामूहिक श्रम का उत्सव है, ऐसी ही एक अनूठी और भावनात्मक परंपरा है ‘छेवर’,जो धान की रोपाई पूरी होने के बाद मनाई जाती है,यह पर्व खेतों में बहाए गए पसीने का सम्मान तो है ही,साथ ही किसान और खेतिहर श्रमिकों के बीच आत्मीय रिश्तों की मिसाल भी प्रस्तुत करता है,धान की रोपाई वर्षभर के सबसे कठिन कृषि कार्यों में गिनी जाती है,तेज धूप,लगातार बारिश,घुटनों तक कीचड़ और घंटों झुककर काम करने के बावजूद किसान और श्रमिक मिलकर भविष्य की फसल की नींव रखते हैं, जब रोपाई का अंतिम दिन आता है,तब पूरे उत्साह के साथ ‘छेवर’ मनाया जाता है। यह केवल काम खत्म होने का अवसर नहीं, बल्कि सामूहिक श्रम की सफलता का उत्सव होता है।
जब धान के पौधों से बनती है ‘धान की राखी’-छेवर का सबसे भावुक और सांस्कृतिक रूप तब सामने आता है, जब खेतों में काम करने वाली श्रमिक बहनें किसान भाइयों की कलाई पर धान के कोमल पौधों (कंसों) से बनी ‘धान की राखी’ बांधती हैं, यह राखी केवल रक्षा का प्रतीक नहीं, बल्कि खेत, फसल,प्रकृति और आपसी विश्वास के अटूट संबंध का संदेश देती है,राखी बांधते समय बहनों के चेहरे पर संतोष और आत्मीयता का भाव होता है,जबकि किसान भाई भी पूरे सम्मान के साथ इस परंपरा को निभाते हैं,यह दृश्य बताता है कि खेतों में साथ काम करने वाले लोग केवल श्रमिक और किसान नहीं,बल्कि एक-दूसरे के सुख-दुख के सहभागी भी हैं।
श्रमिकों के सम्मान का दिन…
छेवर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस दिन किसान अपने साथ काम करने वाले श्रमिकों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं, उन्हें निर्धारित मजदूरी के साथ विशेष सम्मान दिया जाता है,कई स्थानों पर सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है,तो कहीं अतिरिक्त पारिश्रमिक या उपहार देकर उनके योगदान का सम्मान किया जाता है,इस परंपरा में मालिक और मजदूर का संबंध औपचारिक नहीं रहता, बल्कि परिवार जैसा अपनापन दिखाई देता है।
संस्कृति,संवेदना और सामाजिक समरसता का संदेश
आज जब आधुनिक जीवनशैली में रिश्ते औपचारिक होते जा रहे हैं,तब सरगुजा और कोरिया की यह परंपरा समाज को यह संदेश देती है कि मेहनत का सम्मान,श्रमिकों के प्रति आदर और भाईचारे की भावना ही किसी भी समाज की वास्तविक पूंजी है,यहां श्रम का मूल्य केवल धन से नहीं, बल्कि सम्मान,प्रेम और विश्वास से चुकाया जाता है, ‘छेवर’ यह भी सिखाता है कि खेती केवल अन्न उत्पादन की प्रक्रिया नहीं,बल्कि सामाजिक समरसता का आधार भी है, खेतों में बोए गए धान के पौधों के साथ-साथ यहां विश्वास,अपनापन और आत्मीय रिश्तों के बीज भी अंकुरित होते हैं।
लोक संस्कृति की अमूल्य धरोहर
लोक संस्कृति के जानकारों का मानना है कि ऐसी परंपराएं गांवों की सामाजिक एकजुटता को मजबूत करती हैं,धान की राखी इस बात का प्रतीक है कि अन्न केवल खेतों में नहीं,बल्कि प्रेम,सहयोग और परस्पर सम्मान की भूमि पर भी उगता है,बदलते समय में भी यदि यह परंपरा जीवित है,तो यह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक समृद्धि और सामाजिक चेतना का प्रमाण है,वास्तव में, ‘छेवर’ केवल धान की रोपाई पूर्ण होने का उत्सव नहीं, बल्कि श्रम,सम्मान,भाईचारे और संस्कृति का ऐसा पर्व है,जो यह संदेश देता है कि जब तक किसान और श्रमिकों के बीच यह आत्मीय रिश्ता कायम रहेगा,तब तक छत्तीसगढ़ की धरती केवल धान ही नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और मानवीय मूल्यों की भी समृद्ध फसल उगाती रहेगी।
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