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खड़गवां/एमसीबी@ कागजों में वत्स पैदा,धरातल पर सन्नाटा

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  • एमसीबी पशुपालन विभाग की योजनाओं पर उठे बड़े सवाल
  • कृत्रिम गर्भाधान योजना में बड़ा फर्जीवाड़ा? गांव-गांव सत्यापन हुआ तो खुल सकती हैं कई परतें…
  • सरकारी रिकॉर्ड में हजारों वत्स,गांवों में नहीं मिल रहे सबूत,एमसीबी पशुपालन विभाग जांच के घेरे में…
  • क्या कागजों में ही बढ़ गया पशुधन? एमसीबी में कृत्रिम गर्भाधान योजना पर करोड़ों के खेल का आरोप…
  • कोरिया के बाद अब एमसीबी में भी पशुपालन विभाग पर सवाल,कृत्रिम गर्भाधान और वत्स पालन योजना की निष्पक्ष जांच की मांग…
  • आंकड़ों का खेल या योजनाओं का सच? एमसीबी पशुपालन विभाग के दावों पर उठे गंभीर सवाल…
  • कागजों में हजारों गर्भाधान,हकीकत में कितने? एमसीबी पशुपालन विभाग की योजनाओं पर जांच की मांग तेज…
  • कागजों में सफलता,जमीन पर सवाल! करोड़ों की पशुपालन योजनाओं का होगा भौतिक सत्यापन?
  • एमसीबी में पशुपालन विभाग का ‘कागजी विकास’? कृत्रिम गर्भाधान और वत्स पालन योजना पर उठे बड़े सवाल…

-राजेन्द्र शर्मा-
खड़गवां/एमसीबी,11 जुलाई 2026 (घटती-घटना)।
छत्तीसगढ़ सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, पशुपालकों की आय बढ़ाने और दुग्ध उत्पादन में वृद्धि के उद्देश्य से पशुपालन विभाग के माध्यम से कृत्रिम गर्भाधान एवं वत्स पालन जैसी कई महत्वाकांक्षी योजनाओं का संचालन कर रही है,इन योजनाओं पर हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं ताकि बेहतर नस्ल के पशु तैयार हों और किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सके,लेकिन मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी) जिले में इन योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।
कोरिया जिले में पशुपालन विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे सवालों के बाद अब एमसीबी जिले में भी निजी कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ता एवं वत्स पालन योजना के आंकड़ों पर संदेह जताया जा रहा है,स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि विभाग द्वारा शासन को भेजे गए हजारों कृत्रिम गर्भाधान और वत्स जन्म के आंकड़े वास्तविकता से मेल नहीं खाते,यदि गांव-गांव जाकर स्वतंत्र भौतिक सत्यापन कराया जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।
नागपुर क्षेत्र को लेकर सबसे अधिक चर्चा-स्थानीय सूत्रों के अनुसार नागपुर क्षेत्र में कृत्रिम गर्भाधान और वत्स जन्म के आंकड़ों को लेकर सबसे अधिक संदेह व्यक्त किया जा रहा है,दावा किया जा रहा है कि जिस संख्या में रिपोर्ट भेजी गई है,उस अनुपात में पशुधन ही उपलब्ध नहीं है, यदि स्वतंत्र जांच में यह बात प्रमाणित होती है तो यह केवल रिकॉर्ड की गलती नहीं बल्कि योजनाओं के संचालन में गंभीर अनियमितता मानी जाएगी।
क्या बिना जांच स्वीकार कर लिए गए आंकड़े?-सबसे बड़ा सवाल विभागीय कार्यप्रणाली पर उठ रहा है। आरोप है कि निजी कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ताओं द्वारा भेजे गए आंकड़ों को संबंधित अधिकारियों ने बिना पर्याप्त सत्यापन के स्वीकार कर लिया,यदि ऐसा हुआ है तो यह स्पष्ट करता है कि निगरानी तंत्र पूरी तरह कमजोर रहा या फिर कागजी उपलब्धियों को ही वास्तविक उपलब्धि मान लिया गया,ऐसे में यह भी जांच का विषय है कि संबंधित अधिकारियों ने मौके पर जाकर कभी सत्यापन किया भी या नहीं।
करोड़ों रुपये की योजनाओं पर उठे पारदर्शिता के सवाल-कृत्रिम गर्भाधान और वत्स पालन योजनाओं के संचालन में हर वर्ष बड़ी मात्रा में सरकारी धन खर्च किया जाता है, इस राशि का उद्देश्य केवल रिकॉर्ड तैयार करना नहीं बल्कि किसानों तक वास्तविक लाभ पहुंचाना है,यदि योजनाओं के लाभार्थियों का सही सत्यापन नहीं हुआ,तो यह भी जांच का विषय बनता है कि सरकारी राशि का उपयोग वास्तव में किस आधार पर किया गया, विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में केवल विभागीय जांच पर्याप्त नहीं होगी,बल्कि स्वतंत्र एजेंसी से ऑडिट और भौतिक सत्यापन कराया जाना चाहिए।
किसानों तक योजना का पूरा लाभ नहीं पहुंचने का आरोप-ग्रामीण पशुपालकों का कहना है कि सरकार की मंशा अच्छी है, लेकिन जमीनी स्तर पर योजनाओं का लाभ अपेक्षित रूप से नहीं मिल रहा,कई किसानों का कहना है कि यदि विभाग के रिकॉर्ड में उनके नाम से कृत्रिम गर्भाधान या वत्स जन्म दर्ज है तो उन्हें इसकी जानकारी तक नहीं है,वहीं कुछ किसानों का कहना है कि वर्षों से योजनाओं के नाम पर केवल कागजी प्रगति दिखाई जा रही है,इसी कारण अब सामाजिक एवं भौतिक सत्यापन की मांग तेज होती जा रही है।
सरकारी रिकॉर्ड में हजारों उपलब्धियां,लेकिन धरातल पर तस्वीर अलग?
सूत्रों के अनुसार जिले के सभी विकासखंडों से हर माह बड़ी संख्या में कृत्रिम गर्भाधान, गर्भधारण और वत्स जन्म की रिपोर्ट तैयार कर शासन को भेजी जाती है,इन्हीं आंकड़ों के आधार पर विभाग योजनाओं की सफलता का दावा करता है और सरकारी खर्च का औचित्य भी प्रस्तुत किया जाता है,लेकिन अब आरोप यह है कि इन आंकड़ों का पर्याप्त भौतिक सत्यापन नहीं किया गया। कई मामलों में केवल कागजी रिपोर्टों के आधार पर उपलब्धियां दर्शा दी गईं,यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न होगा।
भौतिक सत्यापन हुआ तो खुल सकती हैं कई परतें…
पशुपालन क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि कृत्रिम गर्भाधान कोई ऐसा कार्य नहीं है जिसे केवल कागजों में दिखाया जा सके,प्रत्येक गर्भाधान का रिकॉर्ड,संबंधित पशुपालक, पशु की पहचान,गर्भधारण और वत्स जन्म तक का पूरा विवरण उपलब्ध होना चाहिए,यदि विकासखंडवार मासिक रिपोर्ट के आधार पर गांव-गांव जाकर पशुपालकों से पूछताछ की जाए,जन्मे वत्सों का मिलान कराया जाए और संबंधित पशुओं का सत्यापन हो,तो वास्तविक स्थिति स्वतः सामने आ जाएगी।
कोरिया के बाद अब एमसीबी भी जांच के घेरे में…
कोरिया जिले में भी पशुपालन विभाग की योजनाओं को लेकर सवाल उठ चुके हैं,अब एमसीबी जिले में भी लगभग उसी प्रकार के आरोप सामने आने से पूरे संभाग में पशुपालन विभाग की कार्यप्रणाली पर चर्चा शुरू हो गई है,यदि दोनों जिलों की योजनाओं की संयुक्त जांच कराई जाती है तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि योजनाएं वास्तविक रूप से सफल रही हैं या केवल कागजी उपलब्धियों के आधार पर संचालित होती रही हैं।
विशेषज्ञों की राय-डिजिटल ट्रैकिंग और थर्ड पार्टी ऑडिट जरूरी
पशुपालन क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि अब केवल विभागीय रिकॉर्ड पर्याप्त नहीं हैं,प्रत्येक कृत्रिम गर्भाधान को डिजिटल पोर्टल पर दर्ज किया जाए, पशु का टैग नंबर, पशुपालक का आधार सत्यापन,जीपीएस लोकेशन और जन्मे वत्स का फोटो रिकॉर्ड रखा जाए,साथ ही प्रत्येक वर्ष स्वतंत्र एजेंसी से थर्ड पार्टी ऑडिट कराया जाए,ताकि योजनाओं में पारदर्शिता बनी रहे और सरकारी धन का सही उपयोग सुनिश्चित हो सके।
यदि आरोप सही निकले तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
यदि जांच में यह सामने आता है कि कृत्रिम गर्भाधान और वत्स जन्म के आंकड़े वास्तविकता से मेल नहीं खाते,तो कई गंभीर प्रश्न स्वतः खड़े होंगे क्या केवल निजी कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ता जिम्मेदार होंगे? या फिर उन विभागीय अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होगी जिन्होंने बिना सत्यापन रिपोर्ट स्वीकार की? क्या सरकारी धन की वसूली होगी? क्या संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय और आपराधिक कार्रवाई होगी?
अब इन सवालों के जवाब का इंतजार…
अब पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही हैं क्या एमसीबी जिले में कृत्रिम गर्भाधान और वत्स जन्म के सभी आंकड़ों का गांव-गांव जाकर स्वतंत्र भौतिक सत्यापन कराया जाएगा? क्या प्रत्येक विकासखंड की मासिक रिपोर्ट की निष्पक्ष जांच होगी? क्या इस योजना पर खर्च हुई सरकारी राशि का विशेष ऑडिट कराया जाएगा? क्या जांच में अनियमितताएं मिलने पर निजी कार्यकर्ताओं के साथ विभागीय अधिकारियों की भी जिम्मेदारी तय होगी? और सबसे बड़ा सवाल—क्या शासन इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए उच्चस्तरीय जांच कराएगा या यह मामला भी केवल फाइलों तक सीमित रह जाएगा?


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