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संपादकीय @ गाली से नहीं दबेगा सवाल

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डिजिटल पत्रकारिता क्यों चुभ रही है?
डॉक्टर्स डे के एक सार्वजनिक मंच से स्वतंत्र पत्रकारों,सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स और यूट्यूब पत्रकारों के लिए जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया गया,उसने एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है। असहमति का उत्तर तर्क से दिया जाना चाहिए या अपशब्दों से? जब किसी पत्रकार को चोर, चोट्टा या उससे भी अधिक अशोभनीय शब्दों से संबोधित किया जाता है,तो यह केवल व्यक्ति विशेष का नहीं,बल्कि लोकतांत्रिक संवाद का भी अपमान है।
लोकतंत्र में पत्रकारिता की पहली जिम्मेदारी सत्ता,व्यवस्था और प्रभावशाली संस्थानों से सवाल पूछना है। यदि सवालों का जवाब तथ्यों से देने के बजाय पत्रकारों की नीयत और व्यक्तित्व पर हमला किया जाने लगे,तो यह स्वस्थ लोकतंत्र का संकेत नहीं माना जा सकता।
पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल पत्रकारिता ने अपनी अलग पहचान बनाई है। सीमित संसाधनों के बावजूद अनेक स्वतंत्र पत्रकार गांवों,कस्बों और दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंचे हैं,जहां अक्सर मुख्यधारा की मीडिया की मौजूदगी नहीं होती। स्थानीय भ्रष्टाचार,स्वास्थ्य सेवाओं की खामियां,किसानों की समस्याएं,आदिवासी इलाकों के मुद्दे और प्रशासनिक लापरवाही जैसे विषयों को सोशल मीडिया और यूट्यूब के माध्यम से व्यापक चर्चा तक पहुंचाया गया है। यही कारण है कि आम नागरिक का एक वर्ग आज सीधे ऐसे पत्रकारों से संपर्क करता है, क्योंकि उसे विश्वास है कि उसकी आवाज़ बिना देरी के सामने आएगी।
सरगुजा इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण है। यहां अनेक ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में किसी बड़ी मीडिया संस्था के पहुंचने से पहले स्थानीय डिजिटल पत्रकार घटनास्थल पर पहुंच जाते हैं। कई बार अस्पतालों की मनमानी, भूमाफियाओं के विवाद,प्रशासनिक लापरवाही अथवा जनसमस्याओं को सबसे पहले इन्हीं प्लेटफॉर्मों ने उजागर किया है। ग्रामीणों के लिए किसी बड़े मीडिया कार्यालय तक पहुंचना कठिन हो सकता है,लेकिन एक स्थानीय यूट्यूब पत्रकार तक फोन पहुंचाना आसान होता है। स्थानीय भाषा और सामाजिक जुड़ाव के कारण लोगों का भरोसा भी इन पर बढ़ा है।
यह भी उतना ही सच है कि डिजिटल माध्यम में जिम्मेदारी और तथ्यपरकता की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। जिस प्रकार मुख्यधारा की मीडिया पर निष्पक्षता का दायित्व है,उसी प्रकार स्वतंत्र पत्रकारों पर भी तथ्यों की पुष्टि, संतुलित प्रस्तुति और पत्रकारिता की मर्यादा बनाए रखने की जिम्मेदारी है। लेकिन कुछ लोगों की संभावित गलतियों के आधार पर पूरे वर्ग को अपमानित करना उचित नहीं कहा जा सकता।
आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है,लेकिन गाली कभी तर्क का विकल्प नहीं हो सकती। यदि किसी रिपोर्ट से असहमति है तो उसका उत्तर तथ्यों से दिया जाना चाहिए,न कि पत्रकारों की गरिमा पर प्रहार करके। इतिहास बताता है कि सवाल पूछने वालों को चुप कराने के प्रयास हमेशा हुए हैं,लेकिन समाज अंततः उन्हीं आवाज़ों को याद रखता है जिन्होंने सत्ता से प्रश्न पूछने का साहस किया।
आज आवश्यकता किसी पत्रकार को गोदी,यूट्यूबर,चोर या चोट्टा जैसे विशेषणों में बांटने की नहीं,बल्कि इस बात पर विचार करने की है कि आम नागरिक अपनी शिकायत लेकर किसके पास जा रहा है। यदि ग्रामीण,गरीब और पीडि़त व्यक्ति सबसे पहले किसी स्थानीय डिजिटल पत्रकार को फोन करता है,तो यह केवल उस पत्रकार की लोकप्रियता नहीं,बल्कि व्यवस्था और पारंपरिक मीडिया के सामने भी एक गंभीर प्रश्न है।
पत्रकारिता का मूल्य उसके मंच से नहीं,उसके साहस,विश्वसनीयता और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता से तय होता है। गालियां कुछ क्षणों की तालियां दिला सकती हैं, लेकिन लोकतंत्र को जीवित रखने का काम हमेशा सवाल ही करते हैं।


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