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संपादकीय@ मंच की कुर्सी,प्रोटोकॉल और लोकतंत्र की मर्यादा

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शासकीय आयोजनों में दिखावे की संस्कृति पर विराम लगाने की जरूरत…
लोकतंत्र में पद का सम्मान जरूरी है,लेकिन पद से भी ऊपर जनता का सम्मान होता है। शासकीय कार्यक्रम जनता के लिए होते हैं और इन कार्यक्रमों का उद्देश्य शासन की योजनाओं, जनहित के कार्यों और सामाजिक सरोकारों को आगे बढ़ाना होता है। ऐसे में यदि किसी कार्यक्रम में चर्चा का केंद्र बच्चों,जनता या योजनाओं के बजाय मंच की व्यवस्था और बैठने की जगह बन जाए तो यह व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
हाल ही में राजपुर में आयोजित शाला प्रवेश उत्सव में मंच व्यवस्था को लेकर सामरी विधायक के नाराज होने का मामला सामने आया। शाला प्रवेश उत्सव जैसे आयोजन शिक्षा के उत्साह,बच्चों के स्वागत और नए सत्र की शुरुआत के लिए होते हैं। ऐसे कार्यक्रमों में सबसे बड़ा सम्मान उन बच्चों का होना चाहिए,जिनके भविष्य को लेकर पूरा आयोजन किया जाता है। लेकिन जब मंच व्यवस्था को लेकर विवाद की स्थिति बनती है तो यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारे शासकीय आयोजनों में प्रोटोकॉल को लेकर स्पष्टता और संतुलन की कमी है।
यह केवल किसी एक व्यक्ति या एक कार्यक्रम का विषय नहीं है। यह एक व्यापक व्यवस्था से जुड़ा प्रश्न है कि आखिर शासकीय मंचों पर किसे प्राथमिकता मिले और उसका आधार क्या हो?
लोकतंत्र में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। विधायक,सांसद,पंचायत प्रतिनिधि और नगरीय निकायों के चुने हुए सदस्य सीधे जनता के वोट से चुनकर आते हैं। वे जनता की समस्याओं और अपेक्षाओं को शासन तक पहुंचाने वाले प्रतिनिधि होते हैं। इसलिए शासकीय कार्यक्रमों में उनका सम्मान और उचित स्थान लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।
लेकिन इसके साथ यह भी उतना ही आवश्यक है कि मंच व्यवस्था किसी व्यक्ति विशेष की प्रतिष्ठा या प्रभाव के आधार पर नहीं,बल्कि निर्धारित नियमों और प्रोटोकॉल के आधार पर हो। नामांकित सदस्य,मनोनीत पदाधिकारी, निगम-मंडल-आयोगों के गैर-निर्वाचित अध्यक्ष या अन्य जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों का भी सम्मान होना चाहिए,लेकिन उनकी भूमिका और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भूमिका में अंतर को स्पष्ट रूप से समझना होगा।
सरकार और प्रशासन को इस दिशा में एक समान और पारदर्शी प्रोटोकॉल बनाने की आवश्यकता है। हर विभाग,हर जिले और हर कार्यक्रम में एक जैसी व्यवस्था होनी चाहिए,ताकि किसी को कम या ज्यादा महत्व मिलने की भावना पैदा न हो। नियम स्पष्ट होंगे तो विवादों की संभावना भी कम होगी।
आज सबसे बड़ी चुनौती केवल प्रोटोकॉल की नहीं,बल्कि बढ़ती हुई वीआईपी संस्कृति की है। लोकतंत्र में पद सेवा का माध्यम होना चाहिए, विशेष अधिकार जताने का नहीं। दुर्भाग्य से कई बार छोटे-बड़े आयोजनों में मंच,स्वागत,कुर्सी और सम्मान को लेकर ऐसी प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है, जिससे जनता के बीच गलत संदेश जाता है।
यह देश 150 करोड़ नागरिकों की साझी भागीदारी से चलता है। हर नागरिक इस लोकतांत्रिक व्यवस्था का बराबर का भागीदार है। निर्वाचित जनप्रतिनिधि और शासकीय अधिकारी अपनी संवैधानिक और प्रशासनिक जिम्मेदारियों के कारण अलग भूमिका में होते हैं, लेकिन लोकतंत्र में मूल भावना समानता की ही है।
लाल बत्ती हटाने या सरकारी सुविधाएं कम करने भर से वीआईपी संस्कृति समाप्त नहीं होगी। इसके लिए समाज और व्यवस्था दोनों को अपनी सोच बदलनी होगी। जमीनी स्तर पर खुद को विशेष दिखाने की प्रवृत्ति,हर जगह सम्मान की अपेक्षा और पद के आधार पर अलग व्यवहार की मांग लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है।
शासकीय कार्यक्रमों की गरिमा तभी बनी रहेगी जब वहां व्यक्ति से ज्यादा उद्देश्य को महत्व दिया जाएगा। शाला प्रवेश उत्सव जैसे कार्यक्रमों में सबसे बड़ा चेहरा बच्चा होना चाहिए,किसान सम्मेलन में किसान,स्वास्थ्य कार्यक्रम में मरीज और जनकल्याण कार्यक्रमों में आम नागरिक।
मंच की कुर्सियां बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती,लेकिन मंच की सोच बदलने से लोकतंत्र मजबूत होता है। जरूरत इस बात की है कि शासकीय कार्यक्रम सत्ता प्रदर्शन का माध्यम न बनकर जनसेवा और जनभागीदारी का प्रतीक बनें।क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी कुर्सी किसी नेता,अधिकारी या पदाधिकारी की नहीं,बल्कि जनता की होती है।


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