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अम्बिकापुर@600 बच्चों का कुपोषण दूर करने का दावा,अदाणी विद्या मंदिर के मॉडल पर उठेंगे कई सवाल भी…

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एक साल के ‘हेल्थ एक्शन रिसर्च प्रोजेक्ट’ के सफल होने का दावा लेकिन मेडिकल डेटा,स्वतंत्र मूल्यांकन और सरकारी पुष्टि सामने नहीं


-संवाददाता-
अम्बिकापुर,02 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। सरगुजा के साल्ही स्थित अदाणी फाउंडेशन द्वारा संचालित अदाणी विद्या मंदिर ने दावा किया है कि उसके एक वर्ष तक चले ‘हेल्थ एक्शन रिसर्च प्रोजेक्ट’ से 14 गांवों के 600 विद्यार्थियों में कुपोषण और शारीरिक कमजोरी की समस्या में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। विद्यालय का कहना है कि अब प्रार्थना सभा के दौरान बच्चों को चक्कर आने की शिकायत पूरी तरह समाप्त हो गई है। हालांकि इस दावे के साथ कई ऐसे प्रश्न भी जुड़े हैं,जिनका जवाब सार्वजनिक होना बाकी है। विद्यालय के अनुसार शैक्षणिक सत्र 2024-25 में प्रतिदिन 15 से 20 बच्चों को प्रार्थना सभा के दौरान कमजोरी और चक्कर आने की शिकायत होती थी। जांच में अधिकांश बच्चों का वजन सामान्य से कम पाया गया। इसके बाद डायटीशियन की सलाह पर विशेष पोषण योजना और नियमित व्यायाम कार्यक्रम शुरू किया गया। योजना के तहत बच्चों को प्रतिदिन दूध के साथ माल्ट आधारित पेय, सोयाबीन, मूंग, चना, मौसमी फल और संतुलित भोजन दिया गया। साथ ही नियमित व्यायाम कराया गया। विद्यालय का दावा है कि 12 महीने बाद बच्चों का वजन बढ़ा, सहनशक्ति बेहतर हुई और चक्कर आने की समस्या समाप्त हो गई।
दावे के साथ कई सवाल भी : विद्यालय ने इसे ‘एक्शन रिसर्च प्रोजेक्ट’ बताया है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि अध्ययन किस वैज्ञानिक पद्धति से किया गया, कितने बच्चों की चिकित्सकीय जांच पहले और बाद में हुई, किस संस्था या विशेषज्ञ ने परिणामों का स्वतंत्र सत्यापन किया तथा क्या यह अध्ययन किसी मेडिकल या सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान द्वारा प्रमाणित है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि जिन बच्चों को पहले कुपोषित बताया गया था, उनका पोषण स्तर किस सरकारी या चिकित्सकीय मानक (जैसे डब्ल्यूएचओ या आईसीएमआर) के आधार पर निर्धारित किया गया और परियोजना पूरी होने के बाद उनमें कितना मात्रात्मक सुधार दर्ज किया गया।
सरकारी आंकड़ों से तुलना जरूरी
सरगुजा सहित प्रदेश के कई आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। ऐसे में यदि किसी विद्यालय ने वास्तव में एक वर्ष में 600 बच्चों की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार किया है, तो इस मॉडल का स्वतंत्र मूल्यांकन कर इसे सरकारी स्तर पर भी अपनाने की संभावना तलाशनी चाहिए। वहीं यदि यह केवल संस्थागत दावा है, तो उसके समर्थन में विस्तृत मेडिकल रिपोर्ट और शोध निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाने चाहिए। विद्यालय प्रबंधन का कहना है कि स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया यह मॉडल ग्रामीण बच्चों के स्वास्थ्य सुधार का प्रभावी उदाहरण है। हालांकि सार्वजनिक हित में इस तरह के दावों की पारदर्शी जांच और स्वतंत्र पुष्टि भी उतनी ही आवश्यक है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि यह पहल वास्तव में एक सफल स्वास्थ्य मॉडल है या केवल संस्थागत उपलब्धि का दावा।


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