- रिकॉर्ड में 100 प्रतिशत टीकाकरण, गांवों में बिना टीके घूम रहे मवेशी!
- खड़गवां से उठे सवाल पूरे एमसीबी जिले तक पहुंचे, किसानों का दावा—”न टीम आई, न टीका लगा”, फिर भी पोर्टल पर दर्ज हो गई शत-प्रतिशत उपलब्धि
- ग्रामवार भौतिक सत्यापन हो तो खुल सकती है फर्जी रिपोर्टिंग की बड़ी पोल, स्वतंत्र जांच की उठी मांग
-राजेन्द्र शर्मा-
खड़गवां/एमसीबी 02 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। पशुधन को संक्रामक एवं जानलेवा चापा-खुरा (फुट एंड माउथ डिजीज-एफएमडी) रोग से बचाने के लिए केंद्र एवं राज्य शासन द्वारा हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च कर व्यापक टीकाकरण अभियान चलाया जाता है,इस अभियान का उद्देश्य जिले के प्रत्येक पात्र पशु तक टीका पहुंचाकर बीमार की रोकथाम करना होता है,लेकिन मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी) जिले, विशेषकर खड़गवां विकासखंड में इस अभियान की सफलता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। क्षेत्र के अनेक पशुपालकों का आरोप है कि विभाग ने सरकारी रिकॉर्ड और ऑनलाइन पोर्टल पर लगभग 100 प्रतिशत टीकाकरण का दावा कर दिया, जबकि वास्तविकता में बड़ी संख्या में पशुओं को टीका लगाया ही नहीं गया, किसानों का कहना है कि न तो टीकाकरण दल उनके गांव पहुंचा और न ही उनके पशुओं का टीकाकरण हुआ, फिर भी रिकॉर्ड में उनके पशुओं को टीका लगा हुआ दर्शा दिया गया, यदि इन आरोपों में सच्चाई है,तो यह मामला केवल विभागीय लापरवाही तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि सरकारी धन के उपयोग, रिकॉर्ड की विश्वसनीयता और पशुधन सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय बन सकता है।
रिकॉर्ड में सफलता,जमीन पर अधूरा अभियान?-कई गांवों के पशुपालकों का दावा है कि उन्होंने अपने पशुओं को कोई टीका लगते नहीं देखा, कुछ ग्रामीणों का कहना है कि उनके यहां टीकाकरण टीम कभी पहुंची ही नहीं,जबकि विभागीय रिकॉर्ड में उनके गांव का कार्य पूर्ण दिखाया गया है,यदि यह स्थिति सही है, तो सवाल उठता है कि क्या शासन को वास्तविक प्रगति रिपोर्ट भेजी गई या फिर केवल कागजों पर उपलब्धि दिखाकर अभियान को सफल घोषित कर दिया गया।
क्या ऑनलाइन पोर्टल में फर्जी आंकड़े अपलोड किए गए?
पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ऑनलाइन डेटा है। वर्तमान व्यवस्था में टीकाकरण के बाद पशुओं का विवरण पोर्टल पर दर्ज किया जाता है, किसानों का आरोप है कि जिन पशुओं का टीकाकरण हुआ ही नहीं, उनके नाम भी रिकॉर्ड में दर्ज कर दिए गए। यदि ऐसा हुआ है तो यह जानना आवश्यक होगा कि आंकड़े किस कर्मचारी ने दर्ज किए? किस अधिकारी ने उनका सत्यापन किया? क्या लाभार्थी पशुपालकों से कोई पुष्टि ली गई? क्या टीकाकरण का कोई भौतिक प्रमाण उपलब्ध है? यदि जांच में रिकॉर्ड और वास्तविकता में अंतर मिलता है, तो यह फर्जी रिपोर्टिंग का गंभीर मामला माना जा सकता है।
ग्रामवार भौतिक सत्यापन से सामने आ सकती है पूरी सच्चाई
पशुपालकों और ग्रामीणों का कहना है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए प्रत्येक गांव में घर-घर जाकर भौतिक सत्यापन कराया जाना चाहिए, उनकी मांग है कि ऑनलाइन पोर्टल में दर्ज प्रत्येक किसान और उसके पशुओं का मौके पर मिलान किया जाए। जिन पशुओं के टीकाकरण का दावा किया गया है, उनकी पुष्टि संबंधित पशुपालकों से कराई जाए, ग्रामीणों का मानना है कि यदि यह प्रक्रिया अपनाई गई तो कुछ ही दिनों में स्पष्ट हो जाएगा कि वास्तव में कितने पशुओं को टीका लगाया गया और कितने केवल रिकॉर्ड में दर्ज कर दिए गए।
15 वर्षों से एक ही स्थान पर जमे कर्मचारियों की भूमिका पर भी उठे सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि पशु चिकित्सा विभाग में कुछ अधिकारी एवं कर्मचारी वर्षों से एक ही विकासखंड अथवा जिले में पदस्थ हैं, उनका मानना है कि लंबे समय तक एक ही स्थान पर रहने से जवाबदेही प्रभावित होती है और स्थानीय स्तर पर प्रभाव का दायरा बढ़ जाता है, ग्रामीणों ने ऐसे कर्मचारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच तथा आवश्यकता पड़ने पर स्थानांतरण की मांग भी उठाई है, ताकि विभागीय कार्यप्रणाली में पारदर्शिता आए।
स्वतंत्र जांच की उठी मांग-ग्रामीणों और पशुपालकों ने राज्य शासन से मांग की है कि पूरे एमसीबी जिले में संचालित चापा-खुरा टीकाकरण अभियान की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए, साथ ही ग्रामवार भौतिक सत्यापन, ऑनलाइन पोर्टल का ऑडिट, टीकाकरण रजिस्टर की जांच तथा जिम्मेदार अधिकारियों एवं कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जाए, उनका कहना है कि यदि जांच निष्पक्ष ढंग से हुई तो टीकाकरण अभियान की वास्तविक स्थिति सामने आ जाएगी और भविष्य में इस प्रकार की अनियमितताओं पर रोक लग सकेगी।
प्रशासन का पक्ष-इस संबंध में पशु चिकित्सा विभाग के संबंधित अधिकारियों का पक्ष प्राप्त नहीं हो सका,विभाग का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
गर्मी में जंगलों में थे मवेशी,फिर गांव में टीकाकरण कैसे हो गया?
किसानों के अनुसार अभियान के दौरान अधिकांश ग्रामीण अपने मवेशियों को जंगल, चरागाह और खुले क्षेत्रों में चरने के लिए छोड़ देते हैं। कई पशु पूरे दिन गांव से बाहर रहते हैं और शाम को लौटते हैं, ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिन पशुओं की उस समय गांव में मौजूदगी ही नहीं थी,उनका टीकाकरण आखिर किस प्रकार कर दिया गया? यदि टीकाकरण दल गांव पहुंचा भी था,तो क्या उसने वास्तव में सभी पशुओं का इंतजार किया? या फिर बिना सत्यापन के ही आंकड़े तैयार कर लिए गए? ग्रामीणों का कहना है कि यदि पशु गांव में उपलब्ध नहीं थे,तो ऑनलाइन पोर्टल में उनके नाम किस आधार पर दर्ज किए गए? क्या किसी अधिकारी ने इन आंकड़ों का भौतिक सत्यापन किया था या केवल कागजी प्रक्रिया पूरी कर अभियान को सफल घोषित कर दिया गया?
क्या मामला केवल खड़गवां तक सीमित है या पूरे एमसीबी जिले में?
क्षेत्र में चर्चा है कि यह मामला केवल खड़गवां विकासखंड तक सीमित नहीं हो सकता,कई पशुपालकों का कहना है कि जिले के अन्य विकासखंडों में भी इसी प्रकार की स्थिति हो सकती है,यदि पूरे एमसीबी जिले के टीकाकरण अभियान की स्वतंत्र जांच कराई जाए तो वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है,हालांकि इन दावों की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
लाखों रुपये खर्च,लेकिन लाभ किसे मिला?
हर वर्ष शासन टीकाकरण अभियान पर बड़ी राशि खर्च करता है,वैक्सीन की खरीद,परिवहन,कोल्ड चेन,कर्मचारियों की तैनाती और अभियान संचालन पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं,यदि पशुओं तक टीका पहुंचा ही नहीं और रिकॉर्ड में शत-प्रतिशत उपलब्धि दर्शा दी गई,तो यह जांच का विषय होगा कि सरकारी धन का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के अनुरूप हुआ या नहीं।
दैनिक घटती-घटना के 10 बड़े सवाल
क्या खड़गवां विकासखंड में वास्तव में 100 प्रतिशत चापा-खुरा टीकाकरण हुआ?
क्या यही स्थिति पूरे एमसीबी जिले में भी है?
जिन पशुओं को टीका नहीं लगा, उनके नाम रिकॉर्ड में कैसे दर्ज हुए?
ऑनलाइन पोर्टल में आंकड़े किस अधिकारी के सत्यापन के बाद अपलोड किए गए?
क्या प्रत्येक गांव में टीकाकरण दल वास्तव में पहुंचा था?
क्या शासन को वास्तविक प्रगति रिपोर्ट भेजी गई या केवल कागजी उपलब्धि दिखाई गई?
अभियान में खर्च हुई सरकारी राशि का ऑडिट क्यों न कराया जाए?
क्या ग्रामवार भौतिक सत्यापन पूरे मामले का खुलासा करेगा?
वर्षों से एक ही स्थान पर पदस्थ कर्मचारियों की भूमिका की जांच होगी?
यदि अनियमितता सिद्ध होती है तो जिम्मेदारी किस अधिकारी की तय होगी?
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