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लेख@ कानूनी नोटिस या दबाव की रणनीति?

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  • खबरों पर सवाल उठाने वालों के लिए भी जरूरी है जवाबदेही
  • जब खबर छपती है…तो सवाल उठते हैं…जब सवालों पर नोटिस आता है…तो लोकतंत्र की असली परीक्षा शुरू होती है…

पत्रकारिता का मूल धर्म है — सवाल पूछना। सत्ता,व्यवस्था और संस्थानों से जवाब मांगना। लेकिन यही पत्रकारिता तब कटघरे में खड़ी हो जाती है जब सवालों के जवाब देने के बजाय खबर लिखने वाले को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की जाती है। हाल ही में खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग से जुड़ी खबरों को लेकर भेजे गए कानूनी नोटिस ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या हर आलोचनात्मक खबर को मानहानि मान लिया जाएगा या फिर सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों से जुड़े मामलों में पारदर्शिता की मांग करना लोकतांत्रिक अधिकार है?
कानूनी नोटिस में भारतीय न्याय संहिता,2023 की धारा 356 के तहत मानहानि का हवाला देते हुए आरोप लगाया गया है कि प्रकाशित खबरों से संबंधित अधिकारियों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है। नोटिस में यह भी कहा गया है कि नियुक्ति,पदोन्नति और सेवा नियमों से जुड़े मामलों को प्रशासनिक या न्यायिक माध्यम से उठाया जाना चाहिए था,मीडिया के माध्यम से नहीं।
यह तर्क अपने स्थान पर है कि किसी भी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने का अधिकार किसी को नहीं है। पत्रकारिता का उद्देश्य किसी व्यक्ति को बदनाम करना नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर व्यवस्था से सवाल करना है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि सरकारी पदों पर नियुक्ति,पदोन्नति,नियमों की व्याख्या और विभागीय निर्णय जैसे विषय सार्वजनिक हित से जुड़े होते हैं। ऐसे मामलों में मीडिया की भूमिका केवल सूचना देना नहीं,बल्कि जनता के सामने तथ्यों को रखना भी होती है।
सवाल यह है कि यदि किसी विभागीय प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं तो उसका समाधान क्या केवल कानूनी नोटिस होगा? या फिर संबंधित विभाग को सामने आकर दस्तावेजों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए? लोकतंत्र में जवाबदेही केवल पत्रकारों की नहीं होती, बल्कि उन संस्थानों की भी होती है जिनके निर्णय जनता के विश्वास से जुड़े होते हैं।
किसी भी खबर पर आपत्ति हो सकती है। तथ्य गलत हों तो उसका खंडन किया जा सकता है। कानूनी रास्ता भी अपनाया जा सकता है। लेकिन खबर के बाद सीधे 50 लाख रुपये के मुआवजे की मांग,माफी और प्रकाशन रोकने जैसी शर्तें यह सवाल जरूर खड़ा करती हैं कि क्या यह केवल कानूनी अधिकार का प्रयोग है या फिर आलोचनात्मक पत्रकारिता पर दबाव बनाने का प्रयास?
आज के दौर में पत्रकारिता भी चुनौतियों से घिरी है। एक ओर फर्जी खबरों और बिना प्रमाण के आरोपों पर नियंत्रण जरूरी है,वहीं दूसरी ओर सच बोलने और सवाल उठाने वाली पत्रकारिता को भी संरक्षण मिलना चाहिए। क्योंकि यदि हर सवाल के जवाब में नोटिस और मुकदमे का डर खड़ा कर दिया जाएगा तो लोकतंत्र में चौथे स्तंभ की भूमिका कमजोर होगी।
वहीं पत्रकारों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। किसी भी व्यक्ति की छवि प्रभावित करने वाली खबर प्रकाशित करने से पहले दस्तावेज, पक्ष और तथ्यात्मक आधार मजबूत होना चाहिए। आरोप और प्रमाण के बीच की दूरी को खत्म करना ही निष्पक्ष पत्रकारिता की पहचान है।
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा पहलू यही है कि विवाद किसी व्यक्ति विशेष का नहीं,बल्कि व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही का है। यदि नियुक्तियां नियमों के अनुसार हुई हैं तो दस्तावेज खुद सबसे बड़ा जवाब हैं। और यदि कहीं अनियमितता है तो उसे छिपाने के बजाय जांच और सुधार की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
कानूनी नोटिस लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक अधिकार है,लेकिन सवाल पूछना भी लोकतंत्र का अधिकार है। जरूरत इस बात की है कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिम्मेदारी समझें। क्योंकि मजबूत लोकतंत्र वही होता है जहां व्यवस्था सवालों से डरती नहीं और पत्रकारिता तथ्यों से आगे बढ़कर किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का माध्यम नहीं बनती। अंततः यही कहा जा सकता है कि खबरों से असहमति हो सकती है…लेकिन सवालों को दबाने की कोशिश लोकतंत्र के लिए हमेशा चिंता का विषय रहती है।


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