

- प्रतिनियुक्ति से शुरू हुई कहानी,
- संविलियन पर जाकर अटक गई
- मत्स्य महासंघ का कर्मचारी,कलेक्टर कार्यालय की कुर्सी और 24 साल की व्यवस्था
- नियम हार गए, जुगाड़ जीत गया? चौबीस साल तक चलती रही प्रतिनियुक्ति की कहानी
- प्रतिनियुक्ति की रजत जयंती,24 साल तक चलता रहा सरकारी जुगाड़!
- संविलियन नहीं हुआ फिर भी नहीं टूटा संबंध!आखिर किसका था संरक्षण?
- सेवा पुस्तिका खुली तो खुल गए राज! चौबीस साल की प्रतिनियुक्ति पर उठे सवाल
- कलेक्टर कार्यालय में 24 साल की पदस्थापना,नियमों से बड़ी थी व्यवस्था?
- जुगाड़ एक्सप्रेस: वर्ष 2000 से 2024 तक दौड़ती रही प्रतिनियुक्ति की गाड़ी
- कुर्सी वही,फाइल वही,कहानी वही! आखिर कैसे चलता रहा 24 साल का जुगाड़?
- राजस्व विभाग में जगह नहीं मिली,फिर भी व्यवस्था नहीं टूटी!
- ‘अस्थायी’ का स्थायी साम्राज्य! कोरिया की फाइलों से निकली 24 साल पुरानी कहानी
- मत्स्य महासंघ से कलेक्टर कार्यालय तक का ऐसा सफर,
- जिसे देखकर सरकारी नियम भी पूछ रहे होंगे—”आखिर मैं किस काम का हूं?”
-रवि सिंह-
कोरिया,14 जून 2026(घटती-घटना)। सरकारी दफ्तरों में अक्सर कहा जाता है कि फाइलों की अपनी एक जिंदगी होती है,कुछ फाइलें जन्म लेते ही धूल खा जाती हैं,कुछ वर्षों तक टेबलों पर भटकती रहती हैं और कुछ ऐसी होती हैं जो किसी सरकारी कर्मचारी से भी ज्यादा लंबी सेवा कर जाती हैं, कोरिया जिले से जो दस्तावेज दैनिक घटती-घटना के सामने आए है वह ऐसी ही कहानी को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है, जिसमें प्रतिनियुक्ति,पदस्थापना,संविलियन,सेवा पुस्तिका और प्रशासनिक संरक्षण जैसे शब्द एक साथ दिखाई देते हैं।
यह कहानी किसी एक आदेश, एक कलेक्टर, एक विभाग या एक सरकार की नहीं है,यह कहानी लगभग चौबीस वर्षों तक फैली उस प्रशासनिक यात्रा की है, जिसमें एक अस्थायी व्यवस्था इतनी लंबी चली कि वह खुद स्थायी व्यवस्था जैसी दिखाई देने लगी,दस्तावेज बताते हैं कि वर्ष 2000 में मत्स्य महासंघ से जुड़े कर्मचारी घनश्याम प्रसाद मिश्रा को प्रतिनियुक्ति पर कलेक्टर कार्यालय कोरिया भेजा गया, सामान्य सरकारी समझ कहती है कि प्रतिनियुक्ति कुछ समय के लिए होती है, लेकिन यहां प्रतिनियुक्ति ने शायद कैलेंडर देखना ही बंद कर दिया, साल गुजरते गए,सरकारें बदलती रहीं,अधिकारी आते-जाते रहे, लेकिन व्यवस्था अपनी जगह बनी रही।
प्रतिनियुक्ति या सरकारी अमरत्व?
यदि सरकारी सेवा नियमों पर कोई शोधार्थी शोध करना चाहे तो उसे यह मामला अवश्य पढ़ना चाहिए,क्योंकि यहां प्रतिनियुक्ति ने वह उपलब्धि हासिल की दिखाई देती है जो सामान्य सरकारी कर्मचारी अपने पूरे करियर में नहीं कर पात,सवाल यह नहीं कि किसी कर्मचारी ने अच्छा काम किया या नहीं,सवाल यह है कि यदि प्रतिनियुक्ति अस्थायी थी तो वह चौबीस वर्षों तक कैसे चलती रही? यदि मूल विभाग मत्स्य महासंघ था तो प्रशासनिक नियंत्रण की अंतिम रेखा कहां खिंची हुई थी? यदि
कर्मचारी की आवश्यकता इतनी ही महत्वपूर्ण थी तो नियमित वैधानिक समाधान क्यों नहीं खोजा गया? सरकारी व्यवस्था में अक्सर कहा जाता है कि नियमों का पालन आवश्यक है, लेकिन इस फाइल को देखने के बाद ऐसा लगता है कि नियम एक तरफ खड़े होकर व्यवस्था को गुजरते हुए देख रहे थे और व्यवस्था मुस्कुराते हुए आगे बढ़ रही थी।
संविलियन का सपना और नियमों की दीवार
दस्तावेजों और प्रशासनिक चर्चाओं से यह भी संकेत मिलता है कि राजस्व विभाग में संविलियन की संभावनाएं भी टटोली गईं,यदि यह सही है तो यह समझना कठिन नहीं कि लंबे समय तक किसी कार्यालय में कार्यरत रहने वाला कर्मचारी उसी व्यवस्था का हिस्सा बनना चाहेगा, लेकिन यहां कहानी का दूसरा पक्ष सामने आता है,संविलियन का रास्ता आसान नहीं था,नियम सामने खड़े थे,परिणाम यह हुआ कि संविलियन संभव नहीं हो पाया,यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है, जब संविलियन नहीं हो सकता था तो फिर व्यवस्था कैसे चलती रही? क्या हर बार प्रशासनिक आवश्यकता का हवाला दिया गया? क्या हर बार कार्यालयीन मजबूरी का तर्क आगे आया? या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि व्यवस्था ने नियमों से ज्यादा मजबूत जगह बना ली थी?
फाइलों की भाषा में छिपे संकेत…
वर्ष 2020 के दस्तावेज विशेष रूप से ध्यान खींचते हैं,इनमें जिला प्रशासन द्वारा स्पष्ट रूप से यह बताया गया कि स्टेनोग्राफर वर्ग-01 की आवश्यकता है और कार्यालयीन कार्य प्रभावित हो सकते हैं,यह तर्क निश्चित रूप से महत्व रखता है,लेकिन प्रश्न यह भी है कि यदि आवश्यकता इतनी गंभीर थी तो वर्षों तक नियमित भर्ती,पदस्थापना या वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई? क्या पूरा जिला प्रशासन एक ऐसी व्यवस्था पर निर्भर था जो मूल रूप से अस्थायी थी? यदि उत्तर ‘हाँ’ है तो यह प्रशासनिक कमजोरी का विषय है,यदि उत्तर ‘नहीं’ है तो फिर चौबीस वर्षों तक व्यवस्था जारी रखने का कारण क्या था?
सेवा पुस्तिका ने खोल दी पुरानी अलमारी
वर्ष 2024 में जब सेवा पुस्तिका और निरंतरता प्रमाण पत्र की मांग सामने आई तो मानो वर्षों से बंद अलमारी का ताला खुल गया, सेवा पुस्तिका किसी कर्मचारी का सरकारी इतिहास होती है,उसमें दर्ज हर प्रविष्टि उसके करियर की कहानी कहती है,जब मूल विभाग ने सेवा पुस्तिका मांगी तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठा कि आखिर इतने वर्षों तक सेवा संबंधी नियंत्रण की वास्तविक स्थिति क्या रही? क्या सभी अभिलेख समय पर अद्यतन हुए? क्या विभागीय अनुमतियां नियमित रूप से ली गईं? क्या प्रतिनियुक्ति की अवधि का समय-समय पर परीक्षण हुआ? क्या प्रशासनिक आदेशों की श्रृंखला पूरी तरह नियमसम्मत थी? इन सवालों का उत्तर रिकॉर्ड में होगा,लेकिन फिलहाल सवालों की संख्या उत्तरों से अधिक दिखाई देती है।
सरकारी व्यवस्था की सबसे बड़ी बीमारी—‘चलने दो’
भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में एक अनौपचारिक सिद्धांत वर्षों से जीवित है—चलने दो,यदि कोई व्यवस्था बिना विवाद के चल रही है तो उसे छेड़ने से बचो,यदि कोई फाइल वर्षों से एक ही तरीके से चल रही है तो उसे वैसे ही चलने दो, यदि कोई अस्थायी व्यवस्था स्थायी जैसी हो गई है तो उसे भी चलने दो, समस्या यहीं से शुरू होती है, क्योंकि जब कोई व्यवस्था नियमों के स्थान पर परंपरा के भरोसे चलने लगती है तो एक दिन वही परंपरा विवाद का विषय बन जाती है,कोरिया की यह कहानी भी कुछ ऐसी ही प्रतीत होती है,चौबीस वर्षों तक सब कुछ सामान्य लगता रहा, लेकिन जैसे ही पुराने दस्तावेज सामने आए, लोगों ने पूछना शुरू कर दिया—आखिर यह सब हुआ कैसे?
सवाल जो अब भी जवाब मांग रहे हैं…
यदि प्रतिनियुक्ति अस्थायी थी तो उसकी अधिकतम अवधि कितनी थी? यदि संविलियन संभव नहीं था तो प्रयास किस आधार पर किए गए? यदि कर्मचारी मूल विभाग का था तो सेवा पुस्तिका इतने लंबे समय तक किस प्रशासनिक नियंत्रण में रही? यदि कार्यालय को वास्तव में कर्मचारी की आवश्यकता थी तो नियमित समाधान क्यों नहीं खोजा गया? यदि सब कुछ नियमों के अनुसार था तो फिर चौबीस वर्षों तक एक ही व्यवस्था को बनाए रखने की आवश्यकता क्यों पड़ती रही? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर केवल भावनाओं या समर्थन-विरोध से नहीं,बल्कि रिकॉर्ड और नियमों से ही दिया जा सकता है।
फाइलों में दर्ज प्रशासनिक दर्शन
इस पूरे प्रकरण को देखने के बाद ऐसा लगता है मानो फाइलें स्वयं कह रही हों कि सरकारी कार्यालयों में दो व्यवस्थाएं साथ-साथ चलती हैं,एक वह जो नियम पुस्तिका में लिखी होती है और दूसरी वह जो व्यवहार में लागू होती है,नियम पुस्तिका कहती है प्रतिनियुक्ति अस्थायी है, व्यवहार कहता है जरूरत पड़ने पर यह पीढि़यां पार कर सकती है,नियम पुस्तिका कहती है संविलियन के लिए प्रक्रिया है,व्यवहार कहता है प्रयास करते रहिए,शायद कभी रास्ता निकल आए,नियम पुस्तिका कहती है हर व्यवस्था का समयबद्ध परीक्षण होना चाहिए,व्यवहार कहता है—जब तक कोई सवाल न पूछे,सब ठीक है।
चौबीस साल लंबी इस कहानी का अंतिम निष्कर्ष क्या होगा…
कोरिया जिले की यह फाइल अब केवल एक कर्मचारी की फाइल नहीं रह गई है,यह सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली,प्रतिनियुक्ति व्यवस्था,प्रशासनिक निर्णयों और वर्षों से चल रही परंपराओं का आईना बन चुकी है,चौबीस साल लंबी इस कहानी का अंतिम निष्कर्ष चाहे जो निकले,लेकिन इतना तय है कि इसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सरकारी व्यवस्था नियमों से चलती है या फिर उन व्यवस्थाओं से,जो समय के साथ नियमों से भी अधिक शक्तिशाली हो जाती हैं,और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा प्रश्न है।
अब क्या होना चाहिए?
इस पूरे मामले में सबसे आवश्यक चीज पारदर्शिता है,यदि सभी आदेश,प्रतिनियुक्तियां,अनुमतियां और सेवा संबंधी निर्णय नियमों के अनुरूप हुए हैं तो उन्हें सार्वजनिक परीक्षण से डरने की आवश्यकता नहीं है,लेकिन यदि कहीं प्रक्रियात्मक त्रुटियां हुई हैं तो उनकी समीक्षा भी उतनी ही आवश्यक है, क्योंकि यह मामला केवल एक कर्मचारी का नहीं है,यह उन सैकड़ों कर्मचारियों का भी प्रश्न है जो वर्षों से नियमों के अनुसार अपनी सेवा यात्रा पूरी कर रहे हैं और यह उम्मीद रखते हैं कि व्यवस्था सभी के लिए समान रूप से लागू हो।
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