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संपादकीय@ विधायक बनाम तहसीलदार, सुशासन की मेज पर फेंकी गई फाइल, या सिस्टम की सड़ चुकी आत्मा?

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विधायक VS तहसीलदार, फाइल फेंकने से लेकर गिरफ्तारी ड्रामे तक, आखिर कब सुधरेगा जनता को नौकर समझने वाला सिस्टम?
लेख by रवि सिंह- छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के सीतापुर में विधायक रामकुमार टोप्पो और नायब तहसीलदार के बीच हुआ विवाद अब सिर्फ मारपीट, एफआईआर और गिरफ्तारी का मामला नहीं रह गया है, यह घटना उस सड़े हुए प्रशासनिक ढांचे का एक्स-रे बन चुकी है जिसमें जनता को सुविधा नहीं, सजा मिलती है, जहां सरकारी दफ्तर काम करने की जगह कम और आदमी को थकाकर तोड़ देने वाली प्रयोगशाला ज्यादा बन चुके हैं, जहां अधिकारी कुर्सी पर बैठते ही खुद को संविधान का वारिस और जनता को भीख मांगने वाला समझने लगते हैं, और जहां नेता जनता की लड़ाई कम, अपनी ताकत का प्रदर्शन ज्यादा करते हैं, सीतापुर में जो हुआ, वह अचानक नहीं हुआ, यह उस गुस्से का विस्फोट है जो सालों से तहसील, थाना, जनपद, निगम और कलेक्टर कार्यालयों के बाहर लाइन में खड़े लोगों के भीतर जमा होता आ रहा है, फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार लाइन में खड़ी महिला किसी गरीब किसान की पत्नी नहीं थी, किसी मजदूर की बेटी नहीं थी, बल्कि विधायक की बहन थी, इसलिए मामला तहसील के कमरे से निकलकर मीडिया, सोशल मीडिया और सत्ता के गलियारों तक पहुंच गया।
सोचिए, एक महिला चार दिन तक सरकारी दफ्तर के चक्कर काटती रही, कभी कहा गया रीडर नहीं है, कभी कहा गया फाइल नहीं है, कभी कहा गया बाद में आना, यह वही सरकारी तंत्र है जो हर साल विज्ञापन छापता है सुशासन, जनसेवा, पारदर्शिता, डिजिटल प्रशासन का, लेकिन जमीन पर हाल यह है कि एक फाइल आज भी अधिकारी की टेबल पर ऐसे घूमती है जैसे किसी मंदिर में दर्शन की लाइन लगी हो और जनता प्रसाद नहीं, कृपा मांग रही हो, और फिर जब बहस बढ़ी तो आरोप है कि नायब तहसीलदार ने फाइल फेंक दी, महिला से तू-तड़ाक की, बाहर निकलने को कहा, अब सवाल यह है कि क्या यह पहली बार हुआ? बिल्कुल नहीं, हर दिन हजारों आम आदमी ऐसे अपमान का सामना करते हैं, कोई अधिकारी फाइल पटक देता है, कोई बाबू बोल देता है समझ नहीं आता क्या? कोई कर्मचारी ऐसे घूरता है जैसे जनता नहीं अपराधी सामने खड़ा हो, लेकिन तब कोई कैमरा नहीं होता, कोई संघ हड़ताल नहीं करता, कोई प्रशासनिक गरिमा खतरे में नहीं पड़ती, कोई सोशल मीडिया पर न्याय नहीं मांगता, क्योंकि तब सामने सिर्फ आम आदमी होता है, और इस देश में आम आदमी का अपमान अब सामान्य प्रक्रिया माना जाने लगा है।
असल सवाल यह नहीं है कि विधायक सही हैं या तहसीलदार, असल सवाल यह है कि ऐसी नौबत आई क्यों?
यही इस पूरे विवाद का सबसे जहरीला सच है, अब दूसरी तरफ विधायक रामकुमार टोप्पो हैं, उनके समर्थकों पर मारपीट, दबाव और हंगामे के आरोप लगे, एफआईआर हुई, गिरफ्तारी की बात हुई, विधायक बोले कि वे गिरफ्तारी देने जा रहे थे लेकिन समर्थकों की वजह से नहीं जा पाए, फिर बयान आया कि गोपनीय तरीके से गिरफ्तारी देंगे, वाह! आम आदमी की गिरफ्तारी पुलिस रात में दरवाजा तोड़कर करती है, लेकिन नेता जी गोपनीय गिरफ्तारी देंगे, यह भारतीय लोकतंत्र का वह व्यंग्य है जिस पर हंसते-हंसते भी शर्म आती है, विधायक ने यह भी कहा कि यह सुशासन की सरकार है, मेरे खिलाफ एफआईआर कराने में दिक्कत नहीं हुई, यह बयान सुनकर शायद पूरा प्रदेश हंसा भी होगा और रोया भी होगा, क्योंकि जनता जानती है कि इसी सुशासन में उसकी शिकायतें महीनों फाइलों में सड़ती रहती हैं, एक साधारण आदमी अगर किसी अधिकारी के खिलाफ शिकायत कर दे तो उसकी शिकायत का हाल वही होता है जो बरसात में सरकारी सड़क का — ऊपर से चमकदार, अंदर से धंस चुकी, असल सवाल यह नहीं है कि विधायक सही हैं या तहसीलदार, असल सवाल यह है कि ऐसी नौबत आई क्यों?- क्यों एक महिला चार दिन तक दफ्तर के चक्कर काटती रही? क्यों एक अधिकारी जनता से संवाद करने के बजाय अहंकार दिखाने लगा? क्यों एक विधायक को लगा कि सिस्टम से काम नहीं होगा तो ताकत दिखानी पड़ेगी? क्यों हर सरकारी कार्यालय में आम आदमी खुद को अपराधी जैसा महसूस करता है? यह पूरा मामला उस जहरीले गठजोड़ को उजागर करता है जिसमें सत्ता और प्रशासन दोनों जनता को नीचे खड़ा देखकर ही खुश होते हैं।
अधिकारी सोचता है — “मैं कुर्सी पर हूं, जनता लाइन में खड़ी रहे…नेता सोचता है — “मैं सत्ता में हूं, अधिकारी मेरी बात माने
और दोनों के बीच पिसता है वह आदमी जिसने वोट भी दिया, टैक्स भी दिया और फिर भी सम्मान नहीं पाया, आज राजस्व निरीक्षक संघ तहसीलदार के समर्थन में हड़ताल कर रहा है, गिरफ्तारी की मांग कर रहा है, प्रशासनिक सुरक्षा की बात कर रहा है, बिल्कुल करनी चाहिए, यदि किसी अधिकारी के साथ मारपीट हुई है तो कानून को कार्रवाई करनी चाहिए, लेकिन यही संघ तब कहां चला जाता है जब कोई किसान महीनों नामांतरण के लिए चक्कर काटता है? जब कोई बुजुर्ग पेंशन के लिए फाइल लेकर भटकता है? जब कोई आदिवासी जमीन के कागज के लिए बाबुओं के सामने हाथ जोड़ता है? तब कौन हड़ताल करता है जनता के सम्मान के लिए? सच यह है कि इस देश में सिस्टम को जनता की तकलीफ नहीं दिखती, उसे सिर्फ अपनी प्रतिष्ठा दिखती है, यहां अधिकारी का अपमान लोकतंत्र पर हमला बन जाता है, लेकिन जनता का अपमान कार्यप्रणाली कहलाता है, यदि यही घटना किसी गरीब आदमी के साथ हुई होती तो शायद वह थाने तक भी नहीं पहुंच पाता, पुलिस उसी से पूछती — “तू ज्यादा समझदार बन रहा है क्या?” लेकिन यहां सामने विधायक थे, इसलिए पूरा सिस्टम एक्टिव हो गया, यही इस व्यवस्था का असली चेहरा है, और इस पूरे मामले में सरकार की भूमिका सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में है।
चुनाव तक जनता मालिक होती है, चुनाव खत्म होते ही वही जनता दफ्तरों में आवेदक बन जाती है
सरकारें चुनाव जीतने के लिए हर हथकंडा अपनाती हैं, जाति, धर्म, भावनाएं, वादे, घोषणाएं — सब कुछ, लेकिन सिस्टम सुधारने के नाम पर वही पुरानी फाइलें, वही पुराना रवैया, वही पुराना अहंकार चलता रहता है, आखिर क्यों नहीं तय किया जाता कि किसी भी नागरिक का काम तय समय में होगा? क्यों नहीं ऐसे अधिकारियों पर कार्रवाई होती जो जनता को बेवजह घुमाते हैं? क्यों शिकायतों का निपटारा सिर्फ कागजों में होता है? सच यह है कि सरकारें जनता को वोटर मानती हैं, नागरिक नहीं, चुनाव तक जनता मालिक होती है, चुनाव खत्म होते ही वही जनता दफ्तरों में आवेदक बन जाती है, और फिर शुरू होता है चक्कर काटने का राष्ट्रीय खेल, इस पूरे विवाद में विधायक की आलोचना भी जरूरी है, यदि समर्थकों ने दबाव बनाया, यदि हाथापाई हुई, यदि कानून तोड़ा गया, तो कार्रवाई होनी ही चाहिए. लोकतंत्र में विधायक जनता का प्रतिनिधि होता है, दबंगई का लाइसेंसधारी नहीं, लेकिन प्रशासनिक तंत्र को भी आईना देखना होगा, जनता को अपमानित करने की आदत अब अधिकारियों को भारी पड़ने लगी है, आज सोशल मीडिया पर दो गैंग बन चुके हैं, एक कह रहा है विधायक गुंडा है, दूसरा कह रहा है तहसीलदार भ्रष्ट और अहंकारी है, लेकिन दोनों पक्ष उस असली बीमारी पर बात नहीं कर रहे जिससे यह विस्फोट हुआ — जनता और प्रशासन के बीच बढ़ती नफरत।
सरकारी दफ्तर अब सेवा केंद्र नहीं, मानसिक प्रताड़ना केंद्र बनते जा रहे हैं?
सरकारी दफ्तर अब सेवा केंद्र नहीं, मानसिक प्रताड़ना केंद्र बनते जा रहे हैं, जहां आदमी काम से कम, सिस्टम से ज्यादा हारता है, सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि हर सरकार खुद को जनता की सरकार कहती है, लेकिन जनता अगर तहसील पहुंच जाए तो उसे पता चलता है कि असली सरकार बाबू की मेज पर बैठी है, वह तय करेगा फाइल चलेगी या नहीं, वह तय करेगा हस्ताक्षर होंगे या नहीं, वह तय करेगा आदमी सम्मान पाएगा या अपमान, और जब यही व्यवस्था लगातार लोगों को तोड़ती है, तब कभी गुस्सा विधायक के रूप में फूटता है, कभी वकीलों के रूप में, कभी किसानों के रूप में और कभी सड़क पर हंगामे के रूप में, सीतापुर का यह विवाद दरअसल चेतावनी है, यदि सरकारें अब भी नहीं समझीं कि जनता सिर्फ वोट देने की मशीन नहीं है, तो ऐसे टकराव बढ़ते जाएंगे, यदि प्रशासन अब भी जनता को परेशान होने योग्य प्रजाति समझता रहा, तो एक दिन सरकारी दफ्तरों के खिलाफ गुस्सा विस्फोट बन जाएगा, और यदि नेता जनता की समस्याओं को निजी ताकत दिखाने का मंच बनाते रहे, तो लोकतंत्र सिर्फ पोस्टर में बचेगा, आज जरूरत सिर्फ विधायक की गिरफ्तारी या तहसीलदार के समर्थन की नहीं है, जरूरत उस पूरे सिस्टम की सर्जरी की है जिसमें आम आदमी की इज्जत सबसे सस्ती चीज बन चुकी है, क्योंकि सबसे बड़ा सवाल आज भी वहीं खड़ा है यदि विधायक की बहन चार दिन चक्कर काट सकती है, तो फिर इस प्रदेश में एक साधारण नागरिक की औकात आखिर है क्या?

रवि सिंह
कोरिया छत्तीसगढ़

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