कॉन्स्टेबल प्रमोशन जारी रहेगी,अंतिम आदेश पर रोक…
बिलासपुर,21 मई 2026। छत्तीसगढ़ पुलिस विभाग में चल रही आरक्षकों (कॉन्स्टेबलों) की पदोन्नति प्रक्रिया को लेकर बिलासपुर हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील अंतरिम आदेश जारी किया है। न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि विभाग द्वारा चलाई जा रही कॉन्स्टेबल प्रमोशन की विभागीय प्रक्रिया अपने तय कार्यक्रम के अनुसार जारी रह सकती है, लेकिन मामले की अगली सुनवाई होने तक किसी भी आरक्षक के लिए अंतिम पदोन्नति आदेश (फाइनल प्रमोशन ऑर्डर) जारी नहीं किया जाएगा। इस बड़े मामले की सुनवाई छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के माननीय जस्टिस पी.पी. साहू की एकल पीठ (सिंगल बेंच) में संपन्न हुई। कोर्ट ने यह बड़ी अंतरिम राहत राज्य के विभिन्न जिलों में पदस्थ 72 से अधिक पीडि़त आरक्षकों द्वारा सामूहिक रूप से दायर की गई याचिकाओं पर विचार करने के बाद दी है। अब इस पूरे मामले की विस्तृत और अगली सुनवाई 15 जून को निर्धारित की गई है। छत्तीसगढ़ के अलग-अलग पुलिस जिलों में इन दिनों आरक्षक (कॉन्स्टेबल) पद से प्रधान आरक्षक (हेड कॉन्स्टेबल) के पद पर बड़े पैमाने पर विभागीय पदोन्नति की प्रक्रिया संचालित की जा रही है। इसी वर्तमान प्रक्रिया की विसंगतियों को गंभीर चुनौती देते हुए कोरबा जिले में पदस्थ आरक्षक लव कुमार पात्रे, भूपेंद्र कुमार पटेल, विक्रम सिंह शांडिल्य सहित कुल 73 पुलिस आरक्षकों ने हाईकोर्ट की शरण ली है। याचिकाकर्ताओं ने अपनी इस रिट याचिका में राज्य शासन, गृह विभाग के सचिव, पुलिस महानिदेशक,बिलासपुर रेंज के आईजी और कोरबा के एसपी समेत कई अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को औपचारिक रूप से पक्षकार बनाया है।
स्वेच्छा से ट्रांसफर और वरिष्ठता सूची को
लेकर उपजा मुख्य विवाद,नियमों की अनदेखी का आरोप
याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे वकीलों का मुख्य तर्क है कि वर्तमान में चल रही प्रमोशन प्रक्रिया में उन पुलिसकर्मियों को भी वरिष्ठ मानकर सूची में सबसे आगे रखा जा रहा है, जिन्होंने पूर्व में अपनी मर्जी और निजी कारणों से दूसरे जिलों में अपना ट्रांसफर (तबादला) कराया था। याचिका में दी गई दलील के मुताबिक,छत्तीसगढ़ पुलिस एग्जीक्यूटिव फोर्स कांस्टेबल भर्ती, पदोन्नति एवं सेवा शर्त नियम 2007 में किए गए संशोधनों के बाद यह कानूनी प्रावधान पूरी तरह स्पष्ट है कि यदि कोई कर्मचारी अपनी स्वेच्छा से दूसरे जिले में स्थानांतरण लेता है, तो नए जिले में उसकी वरिष्ठता (सीनियरिटी) सबसे निचले पायदान पर मानी जाएगी। इसके बावजूद, पुलिस विभाग द्वारा वर्तमान पदोन्नति प्रक्रिया में उनके मूल नियुक्ति तिथि के आधार पर अनुचित लाभ देने का गंभीर आरोप लगाया गया है।
1 जून को जारी होने वाली थी अंतिम सूची,
राज्य सरकार ने कोर्ट में रखा अपना पक्ष
अदालत के समक्ष याचिकाकर्ताओं ने चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि यदि इस मामले में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा तत्काल हस्तक्षेप नहीं किया गया होता,तो विभाग द्वारा आगामी 1 जून 2026 को अंतिम फिट लिस्ट (फाइनल प्रमोशन सूची) सार्वजनिक कर दी जाती। इससे उन स्थानीय आरक्षकों के हितों को भारी नुकसान पहुंचता जो पिछले कई वर्षों से बिना किसी ट्रांसफर के एक ही जिले में पूरी निष्ठा से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से दलील पेश करते हुए सरकारी वकील ने कहा कि पुलिस मुख्यालय द्वारा पूर्व में जारी किए गए स्पष्टीकरण पत्र को याचिका में सीधे तौर पर चुनौती नहीं दी गई है। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, याचिका दायर करने वाले कई पुलिसकर्मियों के नाम भी इस फिट लिस्ट में शामिल हो सकते हैं।
हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना सेवा नियमों का
उल्लंघन,विभागीय समिति को दिए निर्देश
दोनों पक्षों की लंबी और विस्तृत दलीलें सुनने के बाद,बिलासपुर हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया (पहली नजर में) यह स्वीकार किया कि यह पूरा मामला सीधे तौर पर स्थापित सेवा नियमों के सही तरीके से पालन न होने से जुड़ा हुआ है। इसके बाद कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए अंतरिम आदेश जारी किया और कहा कि विभागीय पदोन्नति समिति अपनी कागजी और चयन प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है, लेकिन माननीय न्यायालय की पूर्व अनुमति के बिना किसी भी परिस्थिति में अंतिम प्रमोशन ऑर्डर का क्रियान्वयन नहीं किया जाएगा।
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