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बैकुंठपुर/कोरिया@ कोरिया कलेक्ट्रेट का “स्थायी स्टेनो राज”

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  • विभाग मत्स्य निगम का, लेकिन नियंत्रण राजस्व विभाग पर?
  • राजस्व विभाग के स्टेनो संलग्नीकरण झेलते रहेज्और प्रतिनियुक्ति वाला कर्मचारी बना स्थायी व्यवस्था !
  • दो दशक से अधिक समय से कलेक्ट्रेट में जमे प्रभावशाली स्टेनोग्राफर पर उठे नए सवाल, संभाग आयुक्त से जांच की मांग तेज


-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/कोरिया 21 मई 2026 (घटती-घटना)।
सरकारी दफ्तरों में अक्सर कहा जाता है कि व्यवस्था नियमों से चलती है, लेकिन कोरिया कलेक्ट्रेट में अब जो चर्चाएं सामने आ रही हैं,उन्हें सुनकर लोग व्यंग्य में कहने लगे हैं कि यहां व्यवस्था नियमों से नहीं,बल्कि स्थायी प्रतिनियुक्ति से चलती रही।
मामला एक ऐसे स्टेनोग्राफर का है जो मूल रूप से राजस्व विभाग का कर्मचारी नहीं बताया जाता,बल्कि मत्स्य निगम/मत्स्य विभाग से जुड़ा अर्ध शासकीय कर्मचारी है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि पिछले दो दशक से अधिक समय से वही कर्मचारी कलेक्टर कार्यालय की सबसे प्रभावशाली शाखा में पदस्थ बना हुआ है,अब सवाल केवल प्रतिनियुक्ति का नहीं रह गया है, चर्चा इस बात की है कि आखिर राजस्व विभाग के वास्तविक स्टेनो कर्मचारियों का हक किसने रोका? क्यों नियमित कर्मचारी वर्षों तक इधर-उधर संलग्न होते रहे और प्रतिनियुक्ति वाला कर्मचारी कलेक्ट्रेट की सबसे महत्वपूर्ण कुर्सी पर स्थायी स्टेनो बनकर बैठा रहा? और अब जब यह मामला खुलकर सामने आने लगा है,तब प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि क्या संभाग आयुक्त इस पूरे मामले में संज्ञान लेंगी?
सबसे बड़ा सवाल — आखिर सिस्टम चल कौन रहा था?
पूरे मामले ने अब कोरिया कलेक्ट्रेट की प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है,क्या व्यवस्था नियमों से चल रही थी? या फिर वर्षों से बना एक प्रभावशाली नेटवर्क पूरे सिस्टम को नियंत्रित कर रहा था? कर्मचारियों का कहना है कि यदि समय रहते इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो यह केवल प्रतिनियुक्ति विवाद नहीं रहेगा,बल्कि प्रशासनिक विश्वसनीयता का मुद्दा बन जाएगा,फिलहाल कलेक्ट्रेट में सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है वास्तविक स्टेनो संलग्नीकरण झेलते रहे…और प्रतिनियुक्ति वाला ‘स्थायी स्टेनो’ बनकर पूरी व्यवस्था चलाता रहा!
मुख्य सवाल यह हैं…
क्या दो दशक से अधिक समय तक प्रतिनियुक्ति नियमसम्मत है?
क्या विभागीय स्टेनो कर्मचारियों का हक प्रभावित हुआ?
क्या सेवा पुस्तिका और प्रतिनियुक्ति आदेशों की जांच होगी?
क्या संवेदनशील शाखाओं में पदस्थापना की समीक्षा होगी?
क्या कलेक्टर शाखा में वास्तविक विभागीय स्टेनो को अवसर मिलेगा?

प्रतिनियुक्ति या स्थायी सरकारी पट्टा?
सरकारी नियमों में प्रतिनियुक्ति का उद्देश्य सीमित समय के लिए प्रशासनिक आवश्यकता पूरी करना माना जाता है,सामान्यतः कुछ वर्षों बाद कर्मचारी को मूल विभाग में वापस भेज दिया जाता है, लेकिन कोरिया कलेक्ट्रेट में यह व्यवस्था कुछ अलग ही दिखाई देती है,यहां प्रतिनियुक्ति अस्थायी नहीं बल्कि स्थायी मॉडल में बदल गई,सूत्रों के अनुसार संबंधित कर्मचारी पिछले दो दशक से अधिक समय से लगातार राजस्व विभाग और कलेक्टर कार्यालय में पदस्थ हैं,यानी कलेक्टर बदले…सरकारें बदलीं…जिले का विभाजन हुआ…प्रशासनिक ढांचा बदला…लेकिन यदि कुछ नहीं बदला तो वह थी यह स्थायी प्रतिनियुक्ति,अब कर्मचारी व्यंग्य में कहते हैं यहां सरकारी योजनाएं अस्थायी हैं, लेकिन कुछ कुर्सियां विरासत में चलती हैं।
राजस्व विभाग के स्टेनो आखिर गए कहां?
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब राजस्व विभाग में स्वयं स्टेनो कर्मचारी मौजूद थे,तब उन्हें कलेक्टर शाखा में अवसर क्यों नहीं मिला? सूत्रों के अनुसार कई नियमित स्टेनो कर्मचारी वर्षों तक दूसरे सेक्शन,दूसरे कार्यालयों और संलग्नीकरण की व्यवस्था में उलझे रहे, लेकिन दूसरी ओर प्रतिनियुक्ति वाला कर्मचारी लगातार कलेक्टर शाखा की सबसे प्रभावशाली कुर्सी पर बना रहा,अब कर्मचारी पूछ रहे हैं क्या राजस्व विभाग में योग्य स्टेनो नहीं थे या फिर कुर्सी पहले से आरक्षित थी?
सुरेश यादव को भी नहीं मिला मौका…
चर्चा में सबसे प्रमुख नाम राजस्व विभाग के स्टेनोग्राफर सुरेश यादव का लिया जा रहा है,सूत्र बताते हैं कि वे लंबे समय तक कोरिया में पदस्थ रहे। इतना ही नहीं,वे आईएएस रीता यादव के पति भी बताए जाते हैं,इसके बावजूद उन्हें कभी कलेक्टर स्टेनो का चार्ज नहीं मिला, बताया जा रहा है कि लगातार सीमित भूमिका और उपेक्षा के बाद अंततः जनवरी 2026 में उन्होंने अपनी प्रतिनियुक्ति मंत्रालय राजस्व विभाग में करा ली, अब कर्मचारी सवाल उठा रहे हैं कि जब अनुभवी और नियमित राजस्व विभागीय स्टेनो मौजूद थे,तब उन्हें जिम्मेदारी क्यों नहीं दी गई? कर्मचारी अब व्यंग्य में कहते हैं यहां योग्यता से ज्यादा जरूरी शायद कुर्सी से पुराना रिश्ता था।
रश्मि गुप्ता वर्षों तक दूसरे सेक्शन में ही रहीं…
सूत्रों के अनुसार स्टेनो रश्मि गुप्ता भी लंबे समय तक कोरिया में कार्यरत रहीं, लेकिन उन्हें कभी कलेक्टर स्टेनो नहीं बनाया गया, बताया जाता है कि वे वर्षों तक दूसरे सेक्शन में ही काम करती रहीं और बाद में दूसरे जिले चली गईं, अब सवाल उठ रहा है कि आखिर विभागीय महिला स्टेनो कर्मचारियों को भी अवसर क्यों नहीं मिला? क्या कलेक्टर शाखा सिर्फ स्थायी प्रतिनियुक्ति मॉडल के लिए सुरक्षित थी?
सचिन गोयल कोरिया में पदस्थ लेकिन काम संभाग आयुक्त कार्यालय में…
मामले में एक और दिलचस्प पहलू सचिन गोयल को लेकर सामने आया है,सूत्रों के अनुसार उनकी पदस्थापना कोरिया में है,लेकिन वे संभाग आयुक्त कार्यालय में संलग्न हैं। वहीं उनका वेतन कोरिया से निकलता है,अब कर्मचारी सवाल उठा रहे हैं कि जब नियमित स्टेनो अलग-अलग जगहों पर संलग्न किए जा रहे थे,तब कलेक्टर शाखा में वर्षों से वही प्रतिनियुक्ति वाला कर्मचारी क्यों बना रहा?
डीएमएफ वाला टेकचंद साहू भी बैठता था स्टेनो कक्ष में…
सूत्रों के अनुसार टेकचंद साहू,जो डीएमएफ शाखा से जुड़े बताए जाते हैं,पहले स्टेनो कक्ष में बैठते थे। बाद में उन्हें डीएमएफ शाखा में भेजा गया,इस पूरे मामले ने अब यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि आखिर कलेक्ट्रेट की महत्वपूर्ण शाखाओं में बैठने और काम करने का निर्णय किस आधार पर होता था? क्या यह प्रशासनिक व्यवस्था तय करती थी या फिर प्रभाव?
संतोष पांडेय एसीबी गिरफ्त में आए तो बदली व्यवस्था?
कर्मचारियों के बीच चर्चा में संतोष पांडेय का नाम भी सामने आ रहा है, जो कुछ समय तक स्टेनो रहे,बताया जाता है कि एसीबी कार्रवाई के बाद उनका स्थानांतरण अन्यत्र हो गया,अब सवाल उठ रहा है कि क्या कार्रवाई केवल कुछ मामलों तक सीमित रही और बाकी व्यवस्थाएं पहले जैसी चलती रहीं?
क्या अर्ध शासकीय कर्मचारी के हाथों में गोपनीय फाइलें सुरक्षित हैं?
पूरा मामला अब प्रशासनिक सुरक्षा पर भी बड़ा सवाल बन चुका है, कलेक्ट्रेट जैसे संवेदनशील कार्यालय में हर दिन सैकड़ों महत्वपूर्ण फाइलों का ट्रांजैक्शन होता है, इनमें गोपनीय पत्राचार,राजस्व प्रकरण, विभागीय जांच,शिकायतें और प्रशासनिक आदेश शामिल रहते हैं, ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या किसी दूसरे विभाग के अर्द्धशासकीय कर्मचारी के हाथों में इतने वर्षों तक महत्वपूर्ण फाइलों का संचालन सुरक्षित और नियमसम्मत माना जा सकता है? प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि सामान्यतः संवेदनशील शाखाओं में उन्हीं कर्मचारियों की नियुक्ति की जाती है जिनकी जवाबदेही स्पष्ट रूप से तय हो सके, लेकिन यहां स्थिति अलग दिखाई देती है, अब कर्मचारी व्यंग्य में कहते हैं फाइलें राजस्व की…कर्मचारी मत्स्य विभाग काज्और जवाबदेही भगवान भरोसे!
शिकायतें हुईं लेकिन कार्रवाई नहीं!
सूत्र बताते हैं कि वर्षों में संबंधित स्टेनो के खिलाफ कई शिकायतें हुईं, कुछ शिकायतें एसीबी तक पहुंचीं,कुछ उच्च स्तर तक गईं, लेकिन अब तक किसी बड़ी कार्रवाई की सार्वजनिक जानकारी सामने नहीं आई, अब लोग सवाल पूछ रहे हैं क्या शिकायतें दबा दी गईं? क्या जांच फाइलों में ही गायब हो गई? या फिर सरकारी परंपरा के अनुसार विचाराधीन होकर धूल खा रही हैं? कर्मचारी अब व्यंग्य में कहते हैं यहां शिकायतें भी फाइल बनकर आती हैं और फिर फाइलों में ही दफन हो जाती हैं।
भागवत कथा और छुट्टी…क्या जांच से बचने का रास्ता?
प्रशासनिक गलियारों में अब एक और चर्चा तेजी से फैल रही है,बताया जा रहा है कि पूरे मामले में विवाद बढ़ने और खबरें सामने आने के बाद संबंधित स्टेनो फिलहाल छुट्टी पर हैं और भागवत कथा में व्यस्त बताए जा रहे हैं,अब कर्मचारी तंज कसते हुए कहते हैं जब प्रशासनिक सवाल बढ़ जाएं,तब आध्यात्म सबसे सुरक्षित विभाग बन जाता है,कुछ लोग इसे सामान्य धार्मिक आयोजन बता रहे हैं,लेकिन कई कर्मचारी इसे संभावित जांच और बढ़ते विवाद से जोड़कर देख रहे हैं।
संभाग आयुक्त से कार्रवाई की मांग तेज
लगातार उठते सवालों और प्रशासनिक चर्चाओं के बीच अब लोगों की नजर संभाग आयुक्त कार्यालय पर टिक गई है, कर्मचारी और स्थानीय लोग मांग कर रहे हैं कि पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच और समीक्षा हो।


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