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सूरजपुर@ घोटाले, एफआईआर और वही जिम्मेदारी, शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र पर उठे बड़े सवाल

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  • नामजद आरोपी ही संभाल रहे खरीदी केंद्र — सूरजपुर में धान माफिया पर फिर बहस तेज
  • कर्मचारी जेल गए, बड़े नाम गायब? शिवप्रसादनगर के घोटालों ने खोली सिस्टम की परतें
  • बीमा से पशुपालन ऋण तक करोड़ों का खेल — एफआईआर में कुछ नाम, चर्चा में कुछ और
  • पुलिस से बचे, इनकम टैक्स के घेरे में? शिवप्रसादनगर घोटाले पर नए सवाल
  • शासन बदनाम, माफिया आराम? धान खरीदी केंद्र की जिम्मेदारी पर विवाद
  • एफआईआर के पन्नों से गायब नाम — सूरजपुर के घोटालों पर बड़ा सवाल
  • शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र के घोटाले पर बड़ा सवाल — एफआईआर में कर्मचारी, चर्चा में करोड़ों के लेन-देन और ‘धान माफिया’ का नाम
  • फसल बीमा से पशुपालन ऋण तक अनियमितताओं के आरोप, साधना कुशवाहा और मन्नू लाल पर दर्ज अपराध के बावजूद जिम्मेदारी जारी — आयकर कार्रवाई की भी चर्चा
  • सूरजपुर का सबसे चर्चित खरीदी केंद्र क्यों बना विवादों का केंद्र?

-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,08 फरवरी 2026(घटती-घटना)।
जिले का शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र पिछले कुछ वर्षों से लगातार विवादों में रहा है, फसल बीमा भुगतान से लेकर पशुपालन ऋण वितरण तक कई मामलों में करोड़ों रुपये की अनियमितता के आरोप सामने आए, हर बार एफआईआर दर्ज हुई, कर्मचारी आरोपी बने, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठता रहा कि कथित बड़े नाम जांच के दायरे में क्यों नहीं दिखाई देते, शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र से जुड़े मामलों ने प्रशासनिक जवाबदेही और जांच की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, एफआईआर में नामजद कर्मचारियों की जिम्मेदारी जारी रहने और कथित बड़े नेटवर्क की चर्चाओं के बीच अब सबकी नजर इस बात पर है कि जांच एजेंसियां आगे क्या कदम उठाती हैं।
फसल बीमा मामला — तीन नामजद, अन्य नामों की चर्चा- वर्ष 2021 में फसल बीमा भुगतान को लेकर विवाद सामने आया, आरोप था कि कुछ किसानों को मिलने वाली राशि लाभार्थियों तक नहीं पहुंची और कथित तौर पर अन्य खातों में चली गई, इस मामले में पुलिस ने जगदीश कुशवाहा, सूबेदार सिंह, सुनील यादव को आरोपी बनाया, हालांकि स्थानीय चर्चाओं में हदीस और जियाउल हक जैसे नामों का भी उल्लेख किया जाता रहा, लेकिन आधिकारिक एफआईआर में इनका नाम शामिल नहीं हुआ, पुलिस का कहना रहा कि कार्रवाई उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर की गई।
पशुपालन ऋण घोटाला — 1.88 करोड़ का आरोप- साल 2023 में सामने आए पशुपालन ऋण मामले में लगभग 1 करोड़ 88 लाख रुपये से अधिक की अनियमितता का आरोप लगा, जांच प्रतिवेदन के बाद अजीत सिंह, साधना कुशवाहा, मन्नू लाल के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई, आरोप है कि 71 हितग्राहियों के नाम पर ऋण स्वीकृत हुआ, लेकिन जमीन पर पशुपालन गतिविधि नहीं दिखी, मामला अभी जांच और न्यायिक प्रक्रिया में बताया जा रहा है।
नामजद होने के बावजूद खरीदी केंद्र की जिम्मेदारी- स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज है कि पशुपालन ऋण मामले में नामजद रहे साधना कुशवाहा और मन्नू लाल को ही शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र की जिम्मेदारी दी गई है, किसानों और क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि इससे पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं, प्रशासनिक सूत्रों का तर्क है कि जब तक अदालत से दोष सिद्ध नहीं होता, तब तक जिम्मेदारी से हटाना जरूरी नहीं होता।
पुलिस केस से बाहर, आयकर कार्रवाई की चर्चा- सूत्रों और दस्तावेजों के हवाले से यह भी दावा किया जा रहा है कि कथित तौर पर हदीस, चिरागुद्दीन, जियाउल और सादिक से जुड़े खातों में करोड़ों रुपये का लेन-देन हुआ, बताया जा रहा है कि करीब 50 करोड़ रुपये तक की राशि विभिन्न खातों में पहुंची और आयकर विभाग द्वारा कार्रवाई की गई, स्थानीय स्तर पर 13.5 करोड़ रुपये की रिकवरी और अन्य लोगों पर बकाया राशि की चर्चा है, हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि सार्वजनिक रूप से नहीं की गई है।
कर्मचारी आरोपी, ‘धान माफिया’ चर्चा में — आखिर क्यों?- जिले में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि हर बड़े आर्थिक अपराध में छोटे स्तर के कर्मचारी ही आरोपी क्यों बनते हैं, आलोचकों का कहना है कि योजनाओं का पैसा बिना बड़े नेटवर्क के इधर-उधर नहीं जा सकता, जबकि प्रशासन का तर्क है कि कानून केवल प्रमाणित साक्ष्यों के आधार पर ही आगे बढ़ता है।
किसानों की योजनाएं और भरोसे का संकट- फसल बीमा और पशुपालन ऋण जैसी योजनाएं किसानों को आर्थिक सुरक्षा देने के लिए बनाई गई हैं, लेकिन जब अनियमितता के आरोप सामने आते हैं तो किसानों का भरोसा कमजोर पड़ता है और शासन की छवि पर भी असर पड़ता है, शिवप्रसादनगर केंद्र को लेकर भी यही सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस बार जांच असली जिम्मेदारों तक पहुंचेगी।
शाखा प्रबंधक के बयान में आए अन्य नाम- स्थानीय चर्चाओं के अनुसार तत्कालीन शाखा प्रबंधक जगदीश कुशवाहा ने कथित तौर पर लिखित में कुछ खातों का उल्लेख किया था और राशि वापस लाने की बात कही थी, इनमें हदीस और जियाउल हक जैसे नामों की चर्चा भी हुई, लेकिन आधिकारिक एफआईआर में इन व्यक्तियों को आरोपी नहीं बनाया गया, पुलिस का कहना रहा कि कार्रवाई केवल उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही की गई।
जेल गए कर्मचारी, लेकिन सवाल बरकरार- इस मामले में कार्रवाई होने के बाद कुछ कर्मचारियों को जेल भी जाना पड़ा और नौकरी पर असर पड़ा। वहीं स्थानीय लोगों का आरोप है कि कथित बड़े नेटवर्क पर कार्रवाई नहीं होने से सवाल खड़े होते हैं, हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जांच एजेंसियों द्वारा सार्वजनिक रूप से नहीं की गई है।
जांच और पारदर्शिता पर उठे सवाल- शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र से जुड़े इस मामले ने यह बहस छेड़ दी है कि क्या आर्थिक अपराधों में सभी जिम्मेदारों तक जांच समान रूप से पहुंचती है। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि किसी भी व्यक्ति को आरोपी बनाने के लिए ठोस साक्ष्य जरूरी होते हैं, जबकि आलोचकों का आरोप है कि प्रभावशाली लोगों के नाम अक्सर जांच के दौरान पीछे रह जाते हैं।


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