रोजगार बिन भटकत हावँव,कास महूँ बाबा बन जातेंव।
डिग्री-सिग्री म का राखे हे,बाबागिरी कर नाँव कमातेंव।
चेला होतिन मोरो अब्बड़,आश्रम खोल धाम लगातेंव।
बइठ के आसन गद्दी मँय हा,भक्तन मन ला ताली बजवातेंव।
कास महूँ बाबा बन जातेंव पाप-पुण्य के डर देखाके,
सरग-नरक के बात बतातेंव।
होतिस रोजे जय-जयकार,अंतर्यामी मँय कहलातेंव।।
कास महूँ बाबा बन जातेंव…सुना-सुनाके पोथी पुरान,
आनी-बानी स्वांग रचातेंव।
परतिन मोरो पँवरी सब झन,भूत-भविष्य मँय देखातेंव।।
कास महूँ बाबा बन जातेंव पूजा करतिन दिन-रात सब,
सबके बिगड़ी काज बनातेंव।
जात-धरम के जाल फाँस म,लोगन मन ल धीरे फँसातेंव।
कास महूँ बाबा बन जातेंव
ठाठ-बाट म जिनगी होतिस,
कार फेरारी चढ़के आतेंव।
एयरकंडीशन वाले घर मा,
ठेलहा होके मजा उड़ातेंव।।
कास महूँ बाबा बन जातेंव….
चलतिस मोरो घर गुजारा,
शिविर लगा दान-पुन पातेंव।
कोन अमीर अउ कोन गरीब,
सबो झन ला ठग-ठग खातेंव।।
कास महूँ बाबा बन जातेंव…
मुकेश उईके
चेपा,पाली
कोरबा,छत्तीसगढ़
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