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कविता@वाह! तेरी लीला …

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कभी हंसाता है कभी रुलाता है।
क्या-क्या खेल खिलाता है।
कठपुतली कैसे-कैसे नचाता है।
कभी अमावस कभी पूर्णिमा
जैसे रंग दिखाता है।
कभी पथ भ्रष्ट करता है।
कभी खुद संभालता है।
कभी संघर्ष कराता है।
कभी सफल बनाता है।
जीवन मरण के चक्रव्यूह
मैं फंसा रंग दिखाता है।
दुनिया में हर आदमी
अपनी करनी का फल पाता है।
कितना भी पाखंड करे आदमी
तुझसे कभी छुप न पाता है।
हर किसी के लिए कोई झमेला है
जिसमें हर कोई अकेला है।
दुनिया की सब चिताएं छोड़
प्रभु का चिंतन करना है।
दुख आए सुख जाए जीवन में
सब सहना मजबूरी है।
जिंदगी के इस कठिन सफर में
प्रभु ही हमारे मार्गदर्शक हैं।
चिंता फिक्र नहीं किसी बात की हर वक्त आप हमारे रक्षक हैं।


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