रायपुर,04 नवम्बर 2026। मर्जर से पहले शिक्षा कर्मी के रूप में दी गई सर्विस को पेंशन की गणना में शामिल करने की मांग को लेकर छत्तीसगढ़ के शिक्षक अब सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। शिक्षकों ने पुरानी सर्विस को पेंशन के लिए मान्य करने की मांग करते हुए याचिका दायर की है। इसमें रामलाल डड़सेना एवं अन्य विरुद्ध छत्तीसगढ़ शासन का मामला शामिल है। शिक्षकों का तर्क है कि उन्होंने मर्जर से पहले कई साल तक सरकारी नियंत्रण में सर्विस दी है। ऐसे में उस अवधि को पेंशन की गणना से बाहर नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट आशुतोष गढ़े ने बताया कि याचिका में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों के साथ पंजाब, हिमाचल प्रदेश, गुजरात और मध्यप्रदेश के हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला दिया गया है। दीपावली के बाद मामले में सुनवाई होने की संभावना है।
हाईकोर्ट ने 120 दिन में पॉलिसी बनाने कहा था…
शिक्षकों के मुताबिक, इस मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शासन को मर्जर से पहले की सर्विस को पेंशन के लिए मान्य करने के संबंध में पॉलिसी बनाने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि मर्जर से पहले की लंबी सर्विस को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शासन को सर्विस की निरंतरता, काम की प्रकृति और प्रशासनिक नियंत्रण जैसे पहलुओं पर विचार कर 120 दिनों के भीतर कारण सहित फैसला लेने कहा गया था। शिक्षकों का आरोप है कि शासन ने इस निर्देश के बाद भी कोई नई पॉलिसी नहीं बनाई।
1 जुलाई 2018 को हुआ था मर्जर
प्रदेश में शिक्षा कर्मियों को 1 जुलाई 2018 से सरकारी शिक्षक के रूप में मर्ज किया गया था। शिक्षकों का कहना है कि इससे पहले भी उन्होंने कई वर्षों तक लगातार सर्विस दी है। इसके बावजूद पेंशन की पात्रता तय करते समय केवल मर्जर के बाद की सर्विस को गिनना उनके साथ भेदभाव है। उनका तर्क है कि यदि 10 साल की सर्विस की गणना केवल मर्जर की तारीख से की जाएगी तो कई शिक्षक 2028 के बाद ही पेंशन के पात्र हो पाएंगे, जबकि वे इससे पहले ही लंबे समय तक सर्विस दे चुके हैं।
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