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रायपुर@छत्तीसगढ़ में मकडि़यों की दो नई प्रजातियों का पहला राज्य रिकॉर्ड…ऋषिझरन जंगल में मिलीं दुर्लभ मकडि़यां

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रायपुर,04 नवम्बर 2026। छत्तीसगढ़ के जैव विविधता से समृद्ध जंगलों में मकडि़यों की दो महत्वपूर्ण प्रजातियों की उपस्थिति दर्ज की गई है। गरियाबंद जिले के देवभोग क्षेत्र स्थित ऋषिझरन जंगल में किए गए शोध के दौरान जाल बनाने वाली मकडि़यों की दो प्रजातियां स्टीटोडा सिंगुलटा (थोरेल,1890) और थेरिडुला गोनीगैस्टर (साइमन, 1873) मिली हैं। छत्तीसगढ़ राज्य में इन दोनों प्रजातियों और इनके संबंधित वंश का यह पहला आधिकारिक और वैज्ञानिक रिकॉर्ड है। इन मकडि़यों की खोज से जुड़ा आधिकारिक शोध अध्ययन अक्टूबर 2026 में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं द्वारा देवभोग क्षेत्र के जंगलों में किए गए फील्ड सर्वे के दौरान इन्हें एकत्र किया गया था। यह महत्वपूर्ण खोज छत्तीसगढ़ के स्थानीय प्राध्यापकों और वन्यजीव शोधकर्ताओं की एक संयुक्त टीम द्वारा की गई है।
शोध दल में डॉ. अविनाश आर. निचाट-असिस्टेंट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष (प्राणी शास्त्र विभाग),एम.वी.वी. शासकीय स्नातकोत्तर महा विद्यालय, भखारा,धमतरी,हितेश कुमार वारते शोधार्थी (लाइफ साइंस विभाग), श्री रावतपुरा सरकार यूनिवर्सिटी, रायपुर,माणिक चंद बंजारे अतिथि व्याख्याता (प्राणीशास्त्र विभाग), शासकीय नवीन कन्या महाविद्यालय खैरागढ़ एवं शासकीय नवीन महाविद्यालय आमदी (धमतरी) तथा यशवंत नायक शोधार्थी (प्राणीशास्त्र विभाग),शासकीय दूधाधारी बजरंग महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रायपुर शामिल थे।
यह अध्ययन मकडि़यों के वर्गीकरण एवं भौगोलिक वितरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। विशेष बात यह है कि इन दोनों प्रजातियों के साथ इनके संबंधित वंश स्टीटोडा और थेरिडुला का भी छत्तीसगढ़ में पहली बार रिकॉर्ड दर्ज किया गया है। शोध के दौरान दोनों प्रजातियों को गरियाबंद जिले के देवभोग स्थित ऋषिझरन वन क्षेत्र से हाथों द्वारा एकत्रित किया गया। यह वन क्षेत्र ओडिशा की सीमा के समीप स्थित है। इन दोनों मकडि़यों की शारीरिक बनावट भी इन्हें एक-दूसरे से अलग पहचान देती है। स्टीटोडा सिंगुलटा का उदर गहरे चॉकलेटी रंग का होता है, जिसके अगले हिस्से में पीले रंग की एक रेखा पाई जाती है। वहीं, थेरिडुला गोनीगैस्टर का उदर कालेपन लिए होता है, जिस पर पांच पीले रंग के विशिष्ट धब्बे दिखाई देते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, छत्तीसगढ़ में अब तक जाल बनाने वाली मकडि़यों की प्रजातियों का सीमित दस्तावेजीकरण हुआ है। ऐसे में इन दोनों प्रजातियों का रिकॉर्ड राज्य की जैव विविधता और मकडि़यों के भौगोलिक वितरण संबंधी वैज्ञानिक जानकारी को समृद्ध करेगा।


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