- कार्यकारिणी सदस्य कैलाश यादव पर FIR के बाद पूर्व अध्यक्ष इरशाद अली ने उठाए सवाल
- डिजिटल साक्ष्यों पर IT Act की धाराएं नहीं लगाने की मांग
-गोविन्द शर्मा-
बिलासपुर,23 अगस्त 2026 । बिलासपुर प्रेस क्लब से जुड़े विवाद ने अब पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रेस क्लब के कार्यकारिणी सदस्य कैलाश यादव के खिलाफ दर्ज FIR के बाद पूर्व अध्यक्ष इरशाद अली ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए डिजिटल माध्यम से की गई कथित अभद्रता के मामले में सूचना प्रौद्योगिकी कानून की उपयुक्त धाराएं लगाए जाने की मांग की है। वहीं पूरे घटनाक्रम को लेकर पुलिस के कथित दो अलग-अलग मापदंडों पर भी सवाल उठ रहे हैं।
व्हाट्सऐप ग्रुप की कथित टिप्पणी से शुरू हुआ विवाद
बताया जा रहा है कि विवाद बिलासपुर प्रेस क्लब के अधिकृत व्हाट्सऐप ग्रुप में कथित तौर पर की गई अभद्र टिप्पणी को लेकर शुरू हुआ। पूर्व अध्यक्ष इरशाद अली का आरोप है कि कार्यकारिणी सदस्य कैलाश यादव ने ग्रुप में उनके खिलाफ अशोभनीय भाषा, अमर्यादित टिप्पणियां और कथित धमकी भरे संदेश पोस्ट किए।
पूर्व अध्यक्ष की ओर से इस संबंध में सिविल लाइन थाने में लिखित शिकायत के साथ चैट और स्क्रीनशॉट जैसे डिजिटल साक्ष्य प्रस्तुत किए जाने का दावा किया गया है। शिकायतकर्ता का कहना है कि मामला डिजिटल माध्यम से जुड़ा होने के बावजूद पुलिस ने IT Act की धाराओं के बजाय अन्य धाराओं में कार्रवाई की।
जवाबी शिकायत और काउंटर FIR ने बढ़ाया विवाद
मामला उस समय और गरमा गया जब कार्यकारिणी सदस्य कैलाश यादव की ओर से भी पूर्व अध्यक्ष के खिलाफ शिकायत की गई। शिकायत के आधार पर पुलिस ने इरशाद अली के खिलाफ FIR दर्ज कर दी।
पूर्व अध्यक्ष का आरोप है कि जवाबी शिकायत में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच किए बिना पुलिस ने तेजी से FIR दर्ज कर दी, जबकि उनकी शिकायत के साथ उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों की जांच और संबंधित कानूनी प्रावधानों के इस्तेमाल में कथित तौर पर उतनी तत्परता नहीं दिखाई गई।
पुलिस की भूमिका पर उठे ये सवाल
पूरे मामले को लेकर शिकायतकर्ता ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कई सवाल उठाए हैं—
- डिजिटल चैट और स्क्रीनशॉट उपलब्ध होने के बावजूद IT Act की उपयुक्त धाराओं पर विचार क्यों नहीं किया गया?
- जवाबी शिकायत पर स्वतंत्र जांच से पहले FIR दर्ज करने की इतनी जल्दी क्यों दिखाई गई?
- क्या दोनों शिकायतों की जांच में समान मापदंड अपनाए गए?
- क्या डिजिटल साक्ष्यों की तकनीकी जांच कराई गई?
- कार्रवाई में किसी बाहरी दबाव की भूमिका रही या नहीं?
‘आम शिकायतों में जांच, यहां इतनी जल्दबाजी क्यों?’
पूर्व अध्यक्ष का कहना है कि आम नागरिकों की शिकायतों में पुलिस अक्सर प्राथमिक जांच, साक्ष्य और सत्यापन की प्रक्रिया का हवाला देती है। ऐसे में इस मामले में कथित रूप से तत्काल काउंटर FIR दर्ज किए जाने को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। उनका आरोप है कि एक ही विवाद से जुड़ी दोनों शिकायतों की कार्रवाई में अलग-अलग रवैया अपनाया गया।
हालांकि पुलिस की ओर से इन आरोपों पर विस्तृत आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है। इसलिए यह भी महत्वपूर्ण होगा कि जांच में डिजिटल साक्ष्यों, चैट की प्रामाणिकता और दोनों पक्षों द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि किस तरह की जाती है।
विवाद अब पुलिस जांच और प्रेस क्लब की साख से जुड़ा
प्रेस क्लब जैसे पत्रकारों के संगठन से जुड़े पदाधिकारियों के बीच विवाद और उसके बाद FIR दर्ज होने से मामला केवल व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रह गया है। अब निगाहें पुलिस जांच पर हैं कि दोनों पक्षों के आरोपों की निष्पक्ष, समान और साक्ष्य आधारित जांच होती है या नहीं। फिलहाल इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यही है…क्या कानून का तराजू दोनों शिकायतों के लिए बराबर रहेगा, या कार्रवाई की गति और धाराओं के चयन को लेकर उठे सवाल आगे भी बने रहेंगे?
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