- तकनीकी सहायक या ठेकेदार? पंचायतों के बंटवारे और शिकायतों ने बढ़ाई मनरेगा की मुश्किलें
- मनरेगा में पंचायतों का ‘गणित’ या ‘सेटिंग’ का खेल? 120 पंचायतों के बंटवारे ने खड़े किए गंभीर सवाल
- किसी के पास 18 पंचायत,किसी के हिस्से सिर्फ 2...बैकुंठपुर जनपद में मनरेगा के कार्य विभाजन पर उठे सवाल
- मनरेगा में जिम्मेदारी का असमान बंटवारा! पंचायत आवंटन और तकनीकी सहायकों की भूमिका जांच के घेरे में
- मनरेगा में ‘मलाईदार’ पंचायतों का खेल? कार्य वितरण से लेकर ठेकेदारी के आरोपों तक कई सवाल
- क्या मनरेगा में नियम नहीं, ‘सेटिंग’ से बंटती हैं पंचायतें? बैकुंठपुर जनपद का कार्य विभाजन बना चर्चा का विषय इंजीनियर के पास सिर्फ दो पंचायत,
- तकनीकी सहायकों के पास 17-18…आखिर क्या है इस बंटवारे का आधार?
- ‘मनरेगा में पंचायतों का ‘गणित’ या ‘सेटिंग’ का खेल? किसी के पास 18 पंचायत, इंजीनियर के हिस्से सिर्फ 2…अब ठेकेदारी के आरोपों ने बढ़ाए सवाल ‘
-रवि सिंह-
कोरिया/बैकुंठपुर,10 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराना, आधारभूत संरचनाओं का निर्माण करना और पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाना है,इस योजना में तकनीकी सहायक और मनरेगा इंजीनियर की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि निर्माण कार्यों की तकनीकी गुणवत्ता, लागत,माप,मूल्यांकन और भुगतान की पूरी प्रक्रिया इन्हीं के प्रमाणन पर निर्भर करती है,लेकिन कोरिया जिले के बैकुंठपुर जनपद पंचायत में तकनीकी अधिकारियों के बीच पंचायतों के बंटवारे ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बैकुंठपुर जनपद पंचायत के अंतर्गत कुल 120 ग्राम पंचायतें आती हैं, इन पंचायतों के लिए 8 तकनीकी सहायक और एक मनरेगा इंजीनियर पदस्थ हैं, सामान्य रूप से यदि कार्यभार का समान वितरण किया जाए तो प्रत्येक अधिकारी के पास लगभग 13 पंचायतों की जिम्मेदारी होनी चाहिए, लेकिन वास्तविक स्थिति बिल्कुल अलग दिखाई देती है, किसी तकनीकी सहायक को 17 से 18 पंचायतों का कार्यभार दिया गया है तो किसी अधिकारी के हिस्से केवल दो पंचायतें आई हैं, यही असमानता अब पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला रही है।
एक ही व्यक्ति ठेकेदार भी और मूल्यांकनकर्ता भी?- यदि कोई तकनीकी सहायक किसी निर्माण कार्य में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आर्थिक हित रखता हो और वही व्यक्ति उस कार्य का मूल्यांकन भी करे,तो पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है,मनरेगा जैसी योजना में तकनीकी अधिकारी का दायित्व निष्पक्ष निरीक्षण करना होता है। यदि शिकायतें सही साबित होती हैं तो यह पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न होगा।
पंचायत व्यवस्था की मजबूरी या अवसर?- ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश निर्माण कार्य पंचायत एजेंसी के माध्यम से कराए जाते हैं, कई सरपंच आर्थिक रूप से बड़े निर्माण कार्य कराने की स्थिति में नहीं होते। ऐसे में आरोप लगते रहे हैं कि कुछ प्रभावशाली लोग सामग्री उपलब्ध कराने,मजदूर लगाने और निर्माण कार्य पूरा कराने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं, यदि तकनीकी अधिकारी स्वयं ऐसी प्रक्रिया का हिस्सा बन जाएं तो निगरानी और निष्पक्षता दोनों प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है। यही कारण है कि ऐसे मामलों में प्रशासनिक पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक मानी जाती है।
शिकायतें नई नहीं,लेकिन कार्रवाई क्यों नहीं?- स्थानीय स्तर पर यह चर्चा लंबे समय से होती रही है कि मनरेगा के कुछ कार्यों में तकनीकी अधिकारियों की भूमिका को लेकर शिकायतें उठती रही हैं, यदि शिकायतें निराधार थीं तो उन्हें खारिज कर शिकायतकर्ताओं के विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि शिकायतों में प्रथम दृष्टया तथ्य थे तो अब तक जांच पूरी क्यों नहीं हुई? यह प्रश्न केवल संबंधित अधिकारियों पर नहीं बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र पर खड़े हो रहे हैं।
ग्रामीणों में चर्चा—जितनी ज्यादा पंचायत, उतना ज्यादा प्रभाव- ग्रामीण क्षेत्रों में यह धारणा भी आम है कि जिस अधिकारी के पास जितनी अधिक पंचायतें होती हैं, उसका प्रभाव भी उतना अधिक माना जाता है, हालांकि यह केवल जनचर्चा है,लेकिन जब कार्य वितरण में इतना बड़ा अंतर दिखाई देता है तो संदेह स्वाभाविक रूप से पैदा होता है, ऐसे में जिला प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि पंचायतों के वितरण का आधार क्या था और किन मानकों पर यह जिम्मेदारियां तय की गईं।
मनरेगा की मंशा पर सवाल नहीं,संचालन पर सवाल– मनरेगा देश की सबसे महत्वपूर्ण ग्रामीण विकास योजनाओं में से एक है, इस योजना से लाखों मजदूरों को रोजगार मिलता है और गांवों में तालाब, सड़क, पुलिया, नाली,चेकडैम,जल संरक्षण एवं अन्य विकास कार्य होते हैं, लेकिन यदि तकनीकी व्यवस्था पर ही सवाल खड़े होने लगें तो सबसे अधिक नुकसान ग्रामीण जनता और मजदूरों को होता है,योजना पर नहीं,बल्कि उसके संचालन की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।
जनहित में जरूरी है पारदर्शिता-यह मामला केवल पंचायतों के बंटवारे का नहीं है, बल्कि करोड़ों रुपये की ग्रामीण विकास योजनाओं की पारदर्शिता और विश्वसनीयता का है, यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप हुआ है तो जिला पंचायत को पंचायत आवंटन का पूरा आधार सार्वजनिक करना चाहिए, यदि शिकायतों में तथ्य हैं तो निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, मनरेगा का पैसा सरकार का नहीं, जनता का है,इसलिए इसकी प्रत्येक पंचायत, प्रत्येक निर्माण और प्रत्येक तकनीकी स्वीकृति जनता के विश्वास के अनुरूप होनी चाहिए। जब तक प्रशासन स्वयं इन सवालों का स्पष्ट और तथ्यात्मक उत्तर नहीं देता,तब तक पंचायतों के इस असमान बंटवारे और तकनीकी सहायकों की भूमिका को लेकर उठ रहे संदेह समाप्त होना कठिन दिखाई देता है।
सबसे बड़ा सवाल—कार्य का बंटवारा या प्रभाव का बंटवारा?– जानकारी के अनुसार तकनीकी सहायक होरीलाल के पास सबसे अधिक 18 पंचायतों की जिम्मेदारी है, जबकि नितेश कुमार साहू के पास 17 पंचायतें हैं,दूसरी ओर,मनरेगा की इंजीनियर नेहा सिंह के पास मात्र दो पंचायतों का कार्यभार है,यहीं से सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है कि यदि इंजीनियर तकनीकी रूप से सबसे वरिष्ठ और प्रशिक्षित अधिकारी हैं, तो उनके पास केवल दो पंचायतें क्यों हैं? क्या बाकी तकनीकी सहायकों की क्षमता उनसे अधिक है? यदि नहीं,तो फिर पंचायतों का यह असंतुलित वितरण किस आधार पर किया गया? यदि प्रशासन के पास इसका कोई स्पष्ट मापदंड है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए,क्योंकि पारदर्शिता ही संदेह समाप्त कर सकती है।
तकनीकी सहायक आखिर करता क्या है?– आम लोगों को अक्सर लगता है कि तकनीकी सहायक केवल निर्माण कार्य देखने वाला कर्मचारी होता है,जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक व्यापक है,मनरेगा के तकनीकी सहायक की जिम्मेदारियों में कार्यस्थल का निरीक्षण,निर्माण कार्य का प्राक्कलन तैयार करना, डिजाइन एवं तकनीकी स्वीकृति देना,माप पुस्तिका (एमबी) तैयार करना, कार्य की गुणवत्ता सुनिश्चित करना, भुगतान के लिए तकनीकी प्रमाण-पत्र देना,निर्माण कार्यों का मूल्यांकन करना,मजदूरों एवं सामग्री से संबंधित अभिलेखों का परीक्षण करना तथा शासन को तकनीकी रिपोर्ट उपलब्ध कराना शामिल है, यानी करोड़ों रुपये के विकास कार्यों की तकनीकी जिम्मेदारी इन्हीं अधिकारियों के कंधों पर रहती है।
कम पंचायत वाले अधिकारी अयोग्य हैं या ज्यादा पंचायत वालों पर विशेष भरोसा?– यदि कार्यभार क्षमता के आधार पर बांटा गया है तो क्या बाकी अधिकारी कार्य करने में सक्षम नहीं हैं? यदि सभी समान रूप से योग्य हैं तो कार्य का संतुलित वितरण क्यों नहीं किया गया? इस प्रश्न का उत्तर केवल प्रशासन ही दे सकता है, क्योंकि कार्य वितरण में इतनी बड़ी असमानता सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं मानी जाती।
तकनीकी सहायक पर ठेकेदारी के आरोपों ने बढ़ाई गंभीरता– पूरा मामला केवल पंचायतों के असमान वितरण तक सीमित नहीं है, शिकायतों में यह भी आरोप लगाए गए हैं कि कुछ तकनीकी सहायक स्वयं उन्हीं पंचायतों में निर्माण कार्यों से जुड़े रहते हैं, जहां वे तकनीकी मूल्यांकन की जिम्मेदारी निभाते हैं,विशेष रूप से तकनीकी सहायक पंकज जायसवाल के संबंध में आरोप लगाए जा रहे हैं कि जिन पंचायतों की तकनीकी जिम्मेदारी उनके पास है, उन्हीं क्षेत्रों में वे कथित रूप से निर्माण कार्यों में भी सक्रिय रहते हैं। आरोप यह भी है कि सामग्री उपलब्ध कराने से लेकर कार्य पूर्ण कराने तक उनकी भूमिका रहती है, जबकि तकनीकी मूल्यांकन भी उन्हीं के द्वारा किया जाता है, यदि ऐसा है तो यह केवल प्रशासनिक प्रश्न नहीं बल्कि हितों के टकराव का गंभीर विषय बन जाता है, हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित अधिकारी का पक्ष सामने आना अभी शेष है।
अब प्रशासन के सामने कई अहम प्रश्न– अब जिला प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि 120 पंचायतों का वितरण किस नियम और किस प्रक्रिया के तहत किया गया,मनरेगा इंजीनियर को मात्र दो पंचायतें देने का औचित्य क्या है? कुछ तकनीकी सहायकों को 17 और 18 पंचायतें क्यों सौंपी गईं? क्या इस पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी? क्या तकनीकी सहायकों पर लगे आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी? यदि किसी अधिकारी ने अपने पद का दुरुपयोग किया है तो क्या उसके विरुद्ध कार्रवाई होगी?
बैकुंठपुर जनपद पंचायत (जिला कोरिया) – तकनीकी सहायक एवं पंचायत आवंटन सारणी
| क्रमांक | अधिकारी/कर्मचारी का नाम | पद | आवंटित पंचायतों की संख्या | टिप्पणी |
| 1 | होरीलाल | तकनीकी सहायक | 18 | सर्वाधिक पंचायत |
| 2 | नितेश कुमार साहू | तकनीकी सहायक | 17 | दूसरा सर्वाधिक कार्यभार |
| 3 | दीपक सिंह | तकनीकी सहायक | 13 | जानकारी अपेक्षित |
| 4 | क्षितिज सिंह | तकनीकी सहायक | 10 | जानकारी अपेक्षित |
| 5 | मनहरण सिंह | तकनीकी सहायक | 12 | जानकारी अपेक्षित |
| 6 | पंकज जायसवाल | तकनीकी सहायक | 13 | कार्यक्षेत्र को लेकर प्रश्न |
| 7 | सत्य प्रकाश साहू | तकनीकी सहायक | 14 | जानकारी अपेक्षित |
| 8 | वर्षा रवि | तकनीकी सहायक | 11 | जानकारी अपेक्षित |
| 9 | नेहा सिंह | मनरेगा इंजीनियर | 2 | सबसे कम पंचायत |
मुख्य तथ्य
| विवरण | संख्या |
| कुल ग्राम पंचायत | 120 |
| कुल तकनीकी सहायक | 8 |
| मनरेगा इंजीनियर | 1 |
| कुल तकनीकी अधिकारी | 9 |
| औसतन प्रत्येक अधिकारी के हिस्से आनी चाहिए थीं पंचायतें | लगभग 12 |
| सर्वाधिक पंचायत | 18 (होरीलाल) |
| दूसरा सर्वाधिक | 17 (नितेश कुमार साहू) |
| सबसे कम | 2 (इंजीनियर नेहा सिंह) |
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