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बैकुंठपुर/कोरिया@साक्ष्यों के अभाव में संजय अग्रवाल दोषमुक्त विशेष न्यायालय ने सभी आरोपों से किया बरी

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  • आरोप गंभीर,लेकिन सबूत कमजोर,सात साल बाद संजय अग्रवाल को मिली बड़ी राहत
  • अभियोजन आरोप साबित नहीं कर सका,विशेष न्यायालय ने संजय अग्रवाल को दी राहत
  • गवाहों के विरोधाभासी बयान और कमजोर साक्ष्य पड़े भारी,विशेष न्यायालय ने आरोपी को किया बरी
  • विशेष न्यायाधीश आशीष पाठक का निर्णय अभियोजन संदेह से परे आरोप सिद्ध नहीं कर सका
  • विशेष लोक अभियोजक महेश कुमार शर्मा और बचाव पक्ष के अधिवक्ता आशीष गुप्ता ने रखे अपने-अपने पक्ष

-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/कोरिया,05 जुलाई 2026 (घटती-घटना)।
लगभग सात वर्षों तक चले बहुचर्चित अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से जुड़े आपराधिक मामले में विशेष न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी संजय अग्रवाल को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। विशेष न्यायाधीश आशीष पाठक की अदालत ने 30 जून 2026 को 35 पृष्ठों का विस्तृत निर्णय सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष भारतीय दंड संहिता एवं एससी/एसटी एक्ट के तहत लगाए गए आरोपों को कानूनन आवश्यक मानक ‘संदेह से परे’ सिद्ध करने में असफल रहा, इसी आधार पर आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
2018 की घटना, 2021 में एफआईआर और 2026 में आया फैसला
मामले की शुरुआत 13 दिसंबर 2018 की कथित घटना से हुई थी, प्रार्थी विष्णु सिंह ने 28 जनवरी 2021 को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण थाना बैकुंठपुर में शिकायत दर्ज कराई थी,शिकायत में आरोप लगाया गया कि भूमि विवाद को लेकर आरोपी संजय अग्रवाल लगातार दबाव बना रहा था तथा पहले से दर्ज अपराध क्रमांक 131/2017 वापस लेने के लिए धमका रहा था, शिकायत के अनुसार 13 दिसंबर 2018 को थाना पटना क्षेत्र के खाड़ा तिराहा के पास आरोपी अपने साथ 7-8 अन्य लोगों के साथ पहुंचा,रास्ता रोककर मारपीट की, जातिसूचक गालियां दीं तथा जान से मारने की धमकी देते हुए आठ लाख रुपये की रंगदारी मांगी। शिकायत के आधार पर एससी/एसटी एक्ट एवं भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत अपराध दर्ज किया गया।
11 गवाह, 19 दस्तावेज और मोबाइल रिकॉर्ड भी बने सुनवाई का हिस्सा
अभियोजन ने अपने पक्ष में कुल 11 गवाहों के बयान न्यायालय में दर्ज कराए, इनमें प्रार्थी विष्णु सिंह, कथित प्रत्यक्षदर्शी,पटवारी,मोबाइल कंपनी के अधिकारी,प्रशासनिक अधिकारी,पुलिस अधिकारी तथा विवेचक शामिल थे,इसके अलावा अभियोजन ने 19 दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए, जिनमें एफआईआर,शिकायत पत्र, जाति प्रमाण पत्र, स्थल निरीक्षण नक्शा,मोबाइल नंबरों के कस्टमर एप्लीकेशन फॉर्म,कॉल डिटेल, व्हाट्सएप संदेश,धारा 65-बी का प्रमाण पत्र, जब्ती पंचनामा एवं अन्य दस्तावेज शामिल रहे, बचाव पक्ष ने किसी गवाह को प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि अभियोजन के साक्ष्यों पर ही सवाल उठाए।
इन गंभीर धाराओं में चला मुकदमा
आरोपी संजय अग्रवाल के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 341 (रास्ता रोकना), 147 (बलवा), 150, 294 (अश्लील गाली-गलौज), 323 (मारपीट), 384 एवं 386 (जबरन वसूली/रंगदारी), 506 (भाग-बी) (आपराधिक धमकी) तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(ह्म्), 3(1)(ह्य) एवं 3(2)(1ड्ड) के तहत आरोप लगाए गए थे। न्यायालय ने 10 जुलाई 2023 को आरोप तय किए, जिसके बाद नियमित सुनवाई प्रारंभ हुई।
दोनों पक्षों के वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने रखे विस्तृत तर्क
राज्य शासन की ओर से विशेष लोक अभियोजक महेश कुमार शर्मा ने न्यायालय में अभियोजन का पक्ष रखा,उन्होंने तर्क दिया कि प्रार्थी,प्रत्यक्षदर्शियों,दस्तावेजी साक्ष्यों,मोबाइल रिकॉर्ड, व्हाट्सएप संदेशों एवं अन्य साक्ष्यों से आरोपी के विरुद्ध आरोप सिद्ध होते हैं और उसे दंडित किया जाना चाहिए, वहीं आरोपी संजय अग्रवाल की ओर से अधिवक्ता आशीष गुप्ता ने बचाव पक्ष की पैरवी करते हुए न्यायालय के समक्ष तर्क रखा कि पूरा मामला भूमि विवाद से जुड़ा है, शिकायत में विलंब हुआ, गवाहों के बयान परस्पर विरोधाभासी हैं तथा अभियोजन द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज आरोपों को प्रमाणित नहीं करते, बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा है, इसलिए आरोपी को दोषमुक्त किया जाना चाहिए।
न्यायालय ने तय किए सात महत्वपूर्ण प्रश्न,इनमें यह देखा गया कि…
क्या वास्तव में आरोपी ने रास्ता रोककर मारपीट की?
क्या बलवा और हिंसा हुई?
क्या सार्वजनिक स्थान पर जातिसूचक गालियां दी गईं?
क्या आठ लाख रुपये की रंगदारी मांगी गई?
क्या जान से मारने की धमकी दी गई?
क्या एससी/एसटी एक्ट के प्रावधान लागू होते हैं?
क्या अभियोजन इन सभी आरोपों को संदेह से परे सिद्ध कर पाया?

साक्ष्यों की गहन समीक्षा के बाद अदालत ने माना की अभियोजन कमजोर रहा…
35 पृष्ठों के निर्णय में न्यायालय ने प्रत्येक गवाह, दस्तावेज और परिस्थितिजन्य साक्ष्य का विस्तार से विश्लेषण किया, अदालत ने पाया कि गवाहों के बयानों में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं, घटना के संबंध में प्रस्तुत मौखिक साक्ष्य, दस्तावेजी प्रमाण तथा घटनाक्रम में अपेक्षित सामंजस्य नहीं पाया गया, न्यायालय ने यह भी कहा कि अभियोजन यह प्रमाणित नहीं कर सका कि कथित रंगदारी,जातिसूचक अपमान,मारपीट और धमकी के आरोप कानून की दृष्टि से संदेह से परे सिद्ध होते हैं, आपराधिक मामलों में केवल आरोप या संदेह के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती, बल्कि प्रत्येक आरोप का ठोस एवं विश्वसनीय साक्ष्यों से प्रमाणित होना आवश्यक है।
भूमि विवाद भी रहा मामले का प्रमुख आधार-
निर्णय में न्यायालय ने इस तथ्य का भी उल्लेख किया कि दोनों पक्षों के बीच पहले से भूमि विवाद एवं अन्य न्यायालयीन प्रकरण लंबित थे, बचाव पक्ष ने इसी आधार पर यह तर्क दिया कि शिकायत पूर्व विवाद की पृष्ठभूमि में की गई है, न्यायालय ने इस पहलू पर भी विचार करते हुए संपूर्ण साक्ष्यों का मूल्यांकन किया और अंतिम निष्कर्ष निकाला।
न्यायालय का अंतिम आदेश- विशेष न्यायाधीश आशीष पाठक ने अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को कानून द्वारा अपेक्षित स्तर तक सिद्ध नहीं करते, इसलिए आरोपी संजय अग्रवाल को भारतीय दंड संहिता एवं अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की सभी आरोपित धाराओं से दोषमुक्त किया जाता है। साथ ही आदेश में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 428 के अनुसार न्यायिक अभिरक्षा की अवधि का समायोजन भी दर्ज किया गया है।
सात वर्षों तक चली न्यायिक प्रक्रिया
13 दिसंबर 2018 – कथित घटना।
28 जनवरी 2021 – एससी/एसटी थाना बैकुंठपुर में एफआईआर दर्ज।
08 फरवरी 2021 – आरोपी की गिरफ्तारी।
05 अप्रैल 2021 – जमानत।
22 नवंबर 2021 – चालान न्यायालय में प्रस्तुत।
10 जुलाई 2023 – आरोप तय।
04 अक्टूबर 2023 – गवाहों के बयान प्रारंभ।
29 जून 2026 – निर्णय सुरक्षित।
30 जून 2026 – विशेष न्यायालय ने आरोपी को दोषमुक्त किया।

महत्वपूर्ण कानूनी तथ्य
इस निर्णय का अर्थ यह नहीं है कि न्यायालय ने घटना के होने या न होने पर अंतिम टिप्पणी की है, न्यायालय का निष्कर्ष यह है कि अभियोजन उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी का अपराध ‘संदेह से परे’ सिद्ध नहीं कर सका, इसलिए आपराधिक कानून के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया गया। यही इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी आधार है।


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