- ACB की दबिश,कार्यालय से जब्त किए दस्तावेज,
- 12 फर्म और कई अधिकारी जांच के घेरे में
- राजीव गांधी शिक्षा मिशन में 2011-12 की खरीदी पर फिर उठे सवाल,
- हार्ड कॉपी से लेकर डिजिटल रिकॉर्ड तक खंगाले गए…
-संवाददाता-
अम्बिकापुर,24 जून 2026 (घटती-घटना)। सरगुजा जिले के बहुचर्चित और करोड़ों रुपए के फर्नीचर घोटाले की जांच एक बार फिर तेज हो गई है। लगभग 14 वर्ष पुराने इस मामले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने बुधवार को राजीव गांधी शिक्षा मिशन (वर्तमान समग्र शिक्षा) के जिला परियोजना कार्यालय में दबिश देकर महत्वपूर्ण दस्तावेजों की जांच शुरू कर दी। एसीबी की इस कार्रवाई के बाद शिक्षा विभाग और मिशन कार्यालय में हड़कंप की स्थिति निर्मित हो गई। सूत्रों के अनुसार वर्ष 2011-12 में स्कूलों के लिए फर्नीचर खरीदी के नाम पर बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं की शिकायतें सामने आई थीं। जांच के दौरान विभागीय अधिकारियों और सप्लायर फर्मों की मिलीभगत से शासकीय राशि के दुरुपयोग के आरोप लगे थे। इसी मामले में पहले अपराध दर्ज किया गया था और अब जांच एजेंसी साक्ष्यों को और मजबूत करने में जुटी हुई है।
क्या है पूरा फर्नीचर घोटाला?
वर्ष 2011-12 में राजीव गांधी शिक्षा मिशन के माध्यम से जिले के विभिन्न स्कूलों में फर्नीचर उपलब्ध कराने के लिए करोड़ों रुपए की खरीदी की गई थी। आरोप है कि खरीदी प्रक्रिया में निर्धारित नियमों और वित्तीय प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। कई मामलों में बाजार मूल्य से अधिक दरों पर सामग्री खरीदे जाने, निविदा प्रक्रिया में अनियमितता बरतने तथा चयनित फर्मों को लाभ पहुंचाने के आरोप सामने आए थे। जांच में यह भी सामने आया था कि कुछ फर्मों को अनुचित तरीके से लाभ पहुंचाया गया, जबकि खरीदी संबंधी कई दस्तावेजों में गंभीर विसंगतियां पाई गई थीं। मामले के उजागर होने के बाद इसकी जांच शुरू हुई और कई अधिकारियों तथा सप्लायरों की भूमिका संदेह के घेरे में आ गई।
दस्तावेज नहीं मिलने पर कार्यालय पहुंची जांच टीम
जानकारी के मुताबिक एसीबी लंबे समय से मामले से जुड़े मूल दस्तावेजों और अभिलेखों की मांग कर रही थी,लेकिन आवश्यक रिकॉर्ड समय पर उपलब्ध नहीं कराए जा रहे थे। इसके बाद जांच एजेंसी की टीम सीधे जिला परियोजना कार्यालय पहुंची और वहां मौजूद फाइलों,क्रय प्रक्रिया से संबंधित दस्तावेजों,भुगतान रजिस्टर,बिल-वाउचर, निविदा रिकॉर्ड और अन्य अभिलेखों की गहन जांच शुरू की। टीम ने कार्यालय में रखे कंप्यूटर सिस्टम,डिजिटल डेटा,स्टोरेज डिवाइस और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड भी खंगाले। कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और डिजिटल साक्ष्य जब्त किए जाने की जानकारी सामने आई है। एसीबी अधिकारी अब इन दस्तावेजों का परीक्षण कर यह पता लगाने का प्रयास करेंगे कि खरीदी प्रक्रिया में किस स्तर पर नियमों का उल्लंघन किया गया।
डिजिटल साक्ष्यों पर विशेष फोकस…
इस बार की जांच में एसीबी केवल कागजी दस्तावेजों तक सीमित नहीं है। जांच एजेंसी डिजिटल रिकॉर्ड, कंप्यूटर डेटा,ई-मेल संचार,भुगतान से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज और अन्य तकनीकी साक्ष्यों की भी पड़ताल कर रही है। अधिकारियों का मानना है कि इतने पुराने मामले में डिजिटल रिकॉर्ड कई महत्वपूर्ण तथ्य उजागर कर सकते हैं।
12 फर्म और कई अधिकारी जांच के घेरे में…
जांच एजेंसियों के रिकॉर्ड के अनुसार इस मामले में विभागीय क्रय समिति से जुड़े तत्कालीन 6 से 7 अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई थी। वहीं करीब 12 सप्लायर फर्मों के संचालकों के नाम भी जांच में सामने आए थे। एफआईआर में विभागीय अधिकारियों, कर्मचारियों और संबंधित फर्म संचालकों के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी) और 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत अपराध दर्ज किया गया था। इसके अलावा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1) एवं 13(2) के तहत भी प्रकरण दर्ज कर जांच शुरू की गई थी।
कार्रवाई से बढ़ी अधिकारियों की चिंता
एसीबी की अचानक कार्रवाई के बाद मिशन कार्यालय के कर्मचारियों और पूर्व में पदस्थ रहे अधिकारियों के बीच चर्चा का माहौल है। जांच एजेंसी द्वारा जब्त किए गए दस्तावेजों की जांच पूरी होने के बाद कई नए तथ्य सामने आने की संभावना जताई जा रही है। सूत्रों का कहना है कि यदि दस्तावेजों और डिजिटल साक्ष्यों में आरोपों की पुष्टि होती है तो मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई तेज हो सकती है। वहीं जांच के दायरे में आने वाले अधिकारियों, कर्मचारियों और फर्म संचालकों की जवाबदेही भी तय की जा सकती है।
एसीबी के सामने है कई चुनौती?
एसीबी अब जब्त दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड का परीक्षण करेगी। इसके बाद संबंधित व्यक्तियों से पूछताछ, दस्तावेजों का मिलान और वित्तीय लेन-देन की समीक्षा की जाएगी। जांच एजेंसी की अगली रिपोर्ट इस बहुचर्चित घोटाले में आगे की कार्रवाई की दिशा तय होगा। करीब डेढ़ दशक पुराने इस मामले में एसीबी की ताजा कार्रवाई ने एक बार फिर उन सवालों को जीवित कर दिया है कि आखिर शिक्षा व्यवस्था के नाम पर खर्च किए गए करोड़ों रुपए का उपयोग नियमों के अनुरूप हुआ था या नहीं। अब सबकी नजर जांच के अगले चरण और संभावित कार्रवाई पर टिकी हुई है।
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