
- रिसाव,टूटी नहरें और सोता विभाग,आखिर कब टूटेगी “निराला सिस्टम” की नींद…
- खाड़ा जलाशय में फिर रिसाव, टूटी नहरें और सोता विभाग! 2020 की तबाही से भी नहीं सीखा सिंचाई तंत्र
- रिसाव जारी है, नहरें टूटी हैं…लेकिन ‘निराला सिस्टम’ की नींद अभी बाकी है!
- करोड़ों खर्च, फिर भी रिस रहा खाड़ा जलाशय! कागजों में मरम्मत, जमीन पर खतरे की घंटी
- 2020 में टूटा,2021 में बना, 2026 में फिर रिसने लगा! खाड़ा जलाशय या भ्रष्टाचार का स्थायी स्मारक?
- बरसात सिर पर,जलाशय में रिसाव बरकरार! क्या फिर किसी हादसे का इंतजार कर रहा विभाग?
- खाड़ा जलाशय का रिसाव और ‘निराला सिस्टम’ का कमाल! नहर टूटी तो टूटने दो, बांध रिसा तो रिसने दो… टेंडर फिर आ जाएगा!
-रवि सिंह-
कोरिया,13 जून 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले के बैकुंठपुर क्षेत्र का खाड़ा जलाशय इन दिनों फिर चर्चा में है,चर्चा इसलिए नहीं कि यहां सिंचाई व्यवस्था आदर्श बन गई है, किसानों को भरपूर पानी मिल रहा है या विभाग ने कोई उत्कृष्ट कार्य कर दिया है,चर्चा इसलिए है क्योंकि जलाशय एक बार फिर रिस रहा है,नहरें टूट रही हैं और जिम्मेदार विभाग ऐसे व्यवहार कर रहा है मानो सब कुछ सामान्य हो, कहा जाता है कि इतिहास से सीख लेनी चाहिए,लेकिन खाड़ा जलाशय का इतिहास देखकर लगता है कि यहां इतिहास से सीख लेने की बजाय उसे दोहराने का अभ्यास किया जा रहा है,वर्ष 2020 में यही जलाशय टूट चुका है,उस समय भी रिसाव की शिकायतें थीं,ग्रामीणों ने बताया था, किसानों ने चिंता जताई थी, लेकिन सिस्टम ने शायद सोचा होगा कि जब तक बांध पूरी तरह नहीं टूटता, तब तक समस्या को समस्या क्यों माना जाए? फिर एक दिन वही हुआ जिसका डर था,23 सितंबर 2020 की सुबह लगभग साढ़े छह बजे जलाशय ने जवाब दे दिया, पानी का दबाव बढ़ा और बांध का हिस्सा टूट गया, खेत तबाह हुए,फसलें बर्बाद हुईं,किसानों की मेहनत बह गई और प्रशासनिक बैठकों का दौर शुरू हो गया, उस समय कहा गया कि अब सबक लिया जाएगा, मजबूत निर्माण होगा, भविष्य में ऐसी नौबत नहीं आएगी, लेकिन लगता है कि सबक जलाशय ने लिया, विभाग ने नहीं।
2020 में टूटा, 2021 में बना, 2026 में फिर रिसने लगा!
यदि किसी मकान की छत बनते ही पांच साल में टपकने लगे तो लोग मिस्त्री पर सवाल उठाते हैं, यदि कोई सड़क छह महीने में उखड़ जाए तो लोग ठेकेदार पर सवाल उठाते हैं, लेकिन यदि करोड़ों रुपये खर्च करके बनाया गया जलाशय पांच साल के भीतर उसी जगह से फिर रिसने लगे जहां पहले टूट चुका था, तब सवाल पूछना भी कुछ लोगों को अपराध लगने लगता है, खाड़ा जलाशय का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है, जिस स्थान पर वर्ष 2020 में बांध टूटा था, वहीं फिर रिसाव दिखाई दे रहा है, अब सवाल यह है कि आखिर पांच साल में ऐसा क्या हो गया? क्या मिट्टी ने विद्रोह कर दिया? क्या पानी ने नियम बदल दिए? या फिर निर्माण की गुणवत्ता केवल फाइलों में मजबूत थी? यदि निर्माण मानकों के अनुरूप हुआ था तो पांच साल में रिसाव क्यों? और यदि निर्माण मानकों के अनुरूप नहीं हुआ था तो जिम्मेदार कौन? इन सवालों का जवाब शायद उन्हीं फाइलों में होगा जिन पर धूल की परतें आज भी सुरक्षित रखी गई होंगी।
जहां बांध टूटा था,वहीं फिर रिसाव क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस स्थान पर 2020 में जलाशय टूटा था, वहीं दोबारा रिसाव कैसे शुरू हो गया? यदि पुनर्निर्माण गुणवत्तापूर्ण तरीके से हुआ था तो मात्र पांच वर्ष के भीतर फिर से वही समस्या क्यों सामने आ रही है? क्या निर्माण कार्य में मानकों की अनदेखी हुई थी? क्या मरम्मत केवल कागजों में मजबूत दिखाई गई थी? या फिर रखरखाव के नाम पर होने वाले खर्च का वास्तविक उपयोग कभी हुआ ही नहीं? इन सवालों का जवाब विभाग को देना चाहिए,क्योंकि यह केवल सरकारी धन का मामला नहीं है, बल्कि हजारों किसानों की सुरक्षा और आजीविका का प्रश्न भी है।
नहरें टूटी हैं,जिम्मेदार चुप हैं…
खाड़ा जलाशय से निकलने वाली कई नहरों की हालत भी चिंताजनक बताई जा रही है,जगह-जगह टूट-फूट दिखाई देती है,कई हिस्सों में मरम्मत की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है,लेकिन विभागीय स्तर पर कोई गंभीर पहल नजर नहीं आती,विडंबना यह है कि हर वर्ष नहरों और जलाशयों के रखरखाव के लिए बड़ी राशि स्वीकृत होती है, टेंडर निकलते हैं,भुगतान होते हैं,कार्य पूर्ण होने के प्रमाण पत्र भी बन जाते हैं,लेकिन जब किसान और ग्रामीण वास्तविक स्थिति देखते हैं तो उन्हें समझ नहीं आता कि आखिर पैसा गया कहां? यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी नहरें टूटी रहें और जलाशय में रिसाव बना रहे तो फिर इन खर्चों का औचित्य क्या है?
क्या विभाग केवल कागजों में जागता है?
सिंचाई विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर वर्षों से सवाल उठते रहे हैं, हर वर्ष मानसून से पहले निरीक्षण,मरम्मत और सुरक्षा तैयारियों की बात कही जाती है,बैठकें होती हैं,रिपोर्ट तैयार होती हैं,लेकिन जब जमीन पर जाकर देखा जाता है तो कई स्थानों पर हालात पहले जैसे ही दिखाई देते हैं, ऐसा लगता है कि विभाग की सक्रियता फाइलों तक सीमित है,कागजों में सब कुछ दुरुस्त होता है, लेकिन वास्तविकता में समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं,खाड़ा जलाशय का वर्तमान रिसाव इसी व्यवस्था की पोल खोलता नजर आता है, यदि 2020 जैसी घटना के बाद भी विभाग सबक नहीं ले पाया तो फिर यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि जिम्मेदारी से बचने का प्रयास माना जाएगा।
कमीशन का खेल या संरक्षण का काम?
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी आम है कि जलाशयों और नहरों के रखरखाव के नाम पर हर वर्ष बड़ी राशि खर्च होती है, टेंडर प्रक्रिया से लेकर निर्माण कार्य तक कई स्तरों पर पैसा बहता है,लेकिन जब परिणाम सामने आते हैं तो जनता को गुणवत्ता दिखाई नहीं देती,यही कारण है कि लोगों के बीच यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि कहीं न कहीं रखरखाव से ज्यादा प्राथमिकता भुगतान और कमीशन को दी जा रही है, यदि ऐसा नहीं है तो विभाग को पारदर्शी तरीके से बताना चाहिए कि पिछले पांच वर्षों में खाड़ा जलाशय और उससे जुड़ी नहरों के रखरखाव पर कितना खर्च हुआ, कौन-कौन से कार्य कराए गए और उनकी गुणवत्ता की जांच किस एजेंसी ने की।
किसानों की चिंता बढ़ी…
जलाशय केवल एक संरचना नहीं है,यह हजारों किसानों की सिंचाई का आधार है, यदि बांध सुरक्षित नहीं रहेगा तो सबसे पहले नुकसान किसानों को होगा, वर्ष 2020 में इसका उदाहरण देखा जा चुका है,आज फिर रिसाव की खबरें सामने आने के बाद किसानों के मन में आशंका पैदा होना स्वाभाविक है, यदि समय रहते सुधार कार्य नहीं हुए और बरसात के दौरान जलस्तर बढ़ गया तो स्थिति गंभीर हो सकती है,प्रशासन और विभाग को यह समझना होगा कि जलाशय की सुरक्षा केवल तकनीकी विषय नहीं बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा का मुद्दा भी है।
अब जवाबदेही तय होनी चाहिए…
खाड़ा जलाशय में सामने आ रही समस्याएं केवल मरम्मत का विषय नहीं हैं,यह जवाबदेही तय करने का अवसर भी है, यदि 2020 में टूटे बांध का पुनर्निर्माण हुआ था तो उसकी गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए,जहां वर्तमान में रिसाव हो रहा है वहां तत्काल तकनीकी निरीक्षण कराया जाना चाहिए,नहरों की वास्तविक स्थिति का सर्वे कराया जाना चाहिए और बरसात से पहले सभी आवश्यक सुधार कार्य पूरे किए जाने चाहिए,साथ ही पिछले वर्षों में हुए रखरखाव खर्च का सामाजिक और तकनीकी ऑडिट भी आवश्यक है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि जनता का पैसा वास्तव में संरक्षण में लगा या केवल कागजी उपलब्धियों में खर्च हो गया।
कहीं फिर इतिहास दोहराने की तैयारी तो नहीं?
खाड़ा जलाशय आज एक बार फिर चेतावनी दे रहा है, नहरें टूटी हैं, रिसाव जारी है,बरसात आ चुकी है,किसान चिंतित हैं,लेकिन विभागीय व्यवस्था अब भी सुस्त दिखाई दे रही है,यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में वही कहानी दोहराई जा सकती है जिसे वर्ष 2020 में पूरा क्षेत्र भुगत चुका है,और तब फिर बैठकें होंगी, फिर जांच होगी,फिर रिपोर्ट बनेगी, फिर करोड़ों के नए प्रस्ताव आएंगे,और शायद फिर कोई कहेगा—इस बार ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी,लेकिन सवाल यही है कि आखिर यह दोबारा कब खत्म होगा? क्योंकि खाड़ा जलाशय में फिलहाल सिर्फ पानी नहीं रिस रहा, बल्कि सरकारी दावों की विश्वसनीयता भी धीरे-धीरे बहती हुई दिखाई दे रही है।
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