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सूरजपुर @हत्या के सनसनीखेज मामले में न्यायालय का बड़ा फैसला

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मुख्य आरोपी को आजीवन कारावास, साक्ष्य मिटाने में सहयोग करने वाले को 3 वर्ष की कठोर सजा, पारिवारिक विवाद में युवक की हत्या कर शव को बोरे में भरकर बांध में फेंका था,लगभग पांच साल बाद आया फैसला…
-संवाददाता-
सूरजपुर,10 जून 2026 (घटती-घटना)।
बहुचर्चित सुरेन्द्र यादव हत्याकांड में माननीय प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश सूरजपुर ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपी को आजीवन कारावास तथा साक्ष्य छिपाने में सहयोग करने वाले सहआरोपी को तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है,न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों,गवाहों के बयान और विवेचना के दौरान संकलित तथ्यों के आधार पर दोनों आरोपियों को दोषसिद्ध माना,यह मामला वर्ष 2021 का है, जिसने उस समय पूरे क्षेत्र में सनसनी फैला दी थी,एक युवक का शव बांगों बांध के डुबान क्षेत्र में संदिग्ध परिस्थितियों में मिलने के बाद शुरू हुई जांच ने एक ऐसी कहानी उजागर की थी,जिसमें रिश्तों का भरोसा, क्रोध और अपराध की साजिश एक साथ सामने आई। 11 सितम्बर 2021 को ग्राम बलदेवनगर निवासी मनोज उरांव ने थाना प्रेमनगर में सूचना दी कि बांगों बांध के डुबान क्षेत्र छोटे छुरी में पानी के ऊपर किसी व्यक्ति का पैर दिखाई दे रहा है, सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और पानी में फंसे शव को बाहर निकाला गया,शव के गले में रस्सी बंधी हुई थी,जिससे प्रथम दृष्टया मामला संदिग्ध प्रतीत हुआ,पुलिस ने पंचनामा कार्रवाई के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा और मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी।
शव की पहचान ने जांच को नई दिशा दी…
विवेचना के दौरान पुलिस ने मृतक की पहचान सुरेन्द्र यादव पिता हीरासाय यादव, उम्र 22 वर्ष,निवासी हनुमानगढ़,थाना रामानुजनगर के रूप में की,पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चिकित्सकों ने मृत्यु का कारण हत्यात्मक बताया, रिपोर्ट प्राप्त होते ही थाना प्रेमनगर में अज्ञात आरोपी के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 और 201 के तहत अपराध दर्ज कर विस्तृत जांच शुरू की गई।
दीदी-जीजा के घर जाने के बाद हुआ था लापता…
जांच में सामने आया कि 5 सितम्बर 2021 को सुरेन्द्र यादव अपनी बहन और जीजा के घर अम्बिकापुर गया था,वहां से वह अपने जीजा सुखसाय उर्फ गंवटिया बरगाह के साथ उसके पुत्र को लेने विध्यांचल गया था, अगले दिन सुखसाय अपने पुत्र के साथ वापस लौट आया,लेकिन सुरेन्द्र उसके साथ नहीं था,जब परिवार के लोगों ने सुरेन्द्र के बारे में पूछा तो आरोपी ने बताया कि वह प्रेमनगर में उतरकर अपने घर चला गया है,यहीं से पुलिस का शक गहराया और पूछताछ का दायरा बढ़ाया गया।
मेडिकल दस्तावेज फाड़ने को लेकर हुआ विवाद…
पुलिस पूछताछ में जो तथ्य सामने आए,वे चौंकाने वाले थे,विवेचना के अनुसार विध्यांचल स्थित मकान में 5 सितम्बर की रात सुरेन्द्र यादव और आरोपी सुखसाय के बीच मृतक के पिता के मेडिकल दस्तावेज फाड़ देने की बात को लेकर विवाद हुआ,विवाद इतना बढ़ गया कि आरोपी ने गुस्से में लकड़ी की पराठी उठाकर सुरेन्द्र के सिर पर हमला कर दिया,गंभीर चोट लगने के बाद आरोपी ने रस्सी से गला दबाकर उसकी हत्या कर दी।
हत्या के बाद रची गई साक्ष्य मिटाने की साजिश…
हत्या के बाद आरोपी ने अपराध को छिपाने के लिए एक सुनियोजित साजिश रची, पुलिस जांच में सामने आया कि मृतक के शव को बोरे में भरकर साइकिल में रखा गया,इसके बाद आरोपी सुखसाय ने अपने पिता महावीर बरगाह की मदद से शव और साइकिल को छोटे छुरी बांध के डुबान क्षेत्र में ले जाकर पत्थर बांधकर पानी में फेंक दिया ताकि शव की पहचान न हो सके और अपराध के साक्ष्य नष्ट हो जाएं,लेकिन अपराध कितना भी योजनाबद्ध क्यों न हो,परिस्थितिजन्य साक्ष्य और पुलिस की जांच ने आखिरकार पूरे मामले का खुलासा कर दिया।
पुलिस विवेचना बनी मामले की सबसे मजबूत कड़ी…
मामले के विवेचक उपनिरीक्षक निर्मल राजवाड़े ने घटनास्थल निरीक्षण, परिस्थितिजन्य साक्ष्य, गवाहों के बयान और अन्य तकनीकी तथ्यों को संकलित करते हुए मजबूत आरोप पत्र तैयार किया,पुलिस द्वारा जुटाए गए साक्ष्यों के आधार पर दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया गया।
अभियोजन पक्ष ने रखे मजबूत तर्क…
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से विशेष लोक अभियोजक रमेश सिंह कुशवाहा ने न्यायालय के समक्ष साक्ष्य और गवाह प्रस्तुत किए,अभियोजन ने यह साबित करने का प्रयास किया कि आरोपी सुखसाय ने जानबूझकर सुरेन्द्र यादव की हत्या की और बाद में अपने पिता महावीर की सहायता से साक्ष्य मिटाने का प्रयास किया,न्यायालय ने अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहों को विश्वसनीय मानते हुए आरोपियों को दोषी पाया।
न्यायालय ने सुनाई कठोर सजा
प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश मानवेन्द्र सिंह की अदालत ने 5 जून 2026 को अपना फैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपी सुखसाय उर्फ गंवटिया को हत्या का दोषी करार दिया,न्यायालय ने आरोपी को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई,साथ ही धारा 201/34 के तहत साक्ष्य मिटाने के अपराध में तीन वर्ष के सश्रम कारावास और 200 रुपये के अर्थदण्ड से दंडित किया,वहीं सहआरोपी महावीर बरगाह को धारा 201/34 के तहत तीन वर्ष के सश्रम कारावास तथा 100 रुपये के अर्थदण्ड की सजा सुनाई गई।
न्याय का संदेश…
इस फैसले को क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय माना जा रहा है, न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि हत्या जैसे जघन्य अपराध और उसके बाद साक्ष्य छिपाने की कोशिश करने वालों को कानून किसी भी स्थिति में राहत नहीं देता,करीब पांच वर्ष तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद आए इस निर्णय ने मृतक के परिजनों को न्याय दिलाने के साथ-साथ समाज को यह संदेश भी दिया है कि अपराध चाहे जितनी चतुराई से छिपाने का प्रयास किया जाए,कानून की पकड़ से बच पाना आसान नहीं होता।


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