

- कोरिया के स्थायी स्टेनो राज से उठता बड़ा सवाल,फाइलों का लोकतंत्र या संरक्षण का साम्राज्य?
- शिकायतें दौड़ती रहीं,खबरें छपती रहीं…लेकिन कार्रवाई शायद रास्ता भूल गई!
- कलेक्टर बदले,सिस्टम नहीं! कोरिया के ‘स्थायी स्टेनो राज’ पर फिर उठे बड़े सवाल…
- नियम अलग…व्यवस्था अलग…कोरिया कलेक्ट्रेट में प्रतिनियुक्ति का ऐसा जलवा कि सवाल भी फाइलों में कैद!
- फाइलें बोल नहीं रहीं,सवाल बढ़ते जा रहे हैं,कोरिया के चर्चित स्टेनो प्रकरण पर प्रशासन की चुप्पी क्यों?
- कलेक्टर साहिबा नई,लेकिन सिस्टम पुराना! स्थायी स्टेनो राज पर जवाबदेही होगी या संरक्षण जारी रहेगा?
- हम नहीं बदलते…कलेक्टर बदलते रहते हैं! कोरिया कलेक्ट्रेट में ‘स्थायी स्टेनो मॉडल’ पर उठ रहे गंभीर सवाल…
- संरक्षण मॉडल बनाम जवाबदेही मॉडल,कोरिया कलेक्ट्रेट का चर्चित स्टेनो प्रकरण अब आयुक्त कार्यालय तक पहुंचा
- फाइलों में दबे सवाल,कुर्सी पर कायम प्रभाव स्थायी स्टेनो राज की परतें कब खोलेगा प्रशासन?
- कोरिया कलेक्ट्रेट में कौन चला रहा है असली सिस्टम? कलेक्टर बदलते रहे,लेकिन ‘स्थायी स्टेनो राज’ क्यों नहीं बदला?
-रवि सिंह-
कोरिया,10 जून 2026(घटती-घटना)। लोकतंत्र में सरकारें बदलती हैं,अधिकारी बदलते हैं, कलेक्टर बदलते हैं,आयुक्त बदलते हैं,बाबू बदलते हैं,फाइलों के रंग बदल जाते हैं,लेकिन कुछ व्यवस्थाएं ऐसी होती हैं जो किसी पुराने बरगद की तरह जड़ें जमा लेती हैं,समय गुजरता रहता है,शासन बदलता रहता है,नीतियां बदलती रहती हैं,मगर वे व्यवस्थाएं अपनी जगह अडिग खड़ी रहती हैं। कोरिया जिले में इन दिनों एक ऐसा ही सवाल प्रशासनिक गलियारों से निकलकर आम जनता के बीच चर्चा का विषय बन गया है,सवाल किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जिसे लोग अब व्यंग्य में संरक्षण मॉडल कहने लगे हैं,लोग पूछ रहे हैं कि क्या अब शासन का नया सिद्धांत यही है कि जिम्मेदारी बाद में देखी जाएगी और संरक्षण पहले दिया जाएगा? क्या अब नियमों की किताब केवल कमजोर कर्मचारियों के लिए बची है और प्रभावशाली लोगों के लिए अलग संविधान लागू हो चुका है? इन सवालों की वजह है कोरिया कलेक्ट्रेट में वर्षों से चर्चा में बना तथाकथित स्थायी स्टेनो प्रकरण,जो अब केवल कलेक्ट्रेट तक सीमित नहीं रहा बल्कि संभागीय आयुक्त कार्यालय की चुप्पी पर भी सवाल खड़े कर रहा है।
जब खबरें थक गईं,लेकिन व्यवस्था नहीं जागी…
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य व्यवस्था को आईना दिखाना होता है,कोरिया में यह आईना पिछले कई महीनों से लगातार एक ही तस्वीर दिखा रहा है, नियुक्ति पर सवाल,पदोन्नति पर सवाल,प्रतिनियुक्ति पर सवाल,सर्विस बुक पर सवाल,आरटीआई पर सवाल,शिकायतों पर सवाल,लेकिन हैरानी की बात यह है कि सवालों की संख्या बढ़ती गई और जवाबों की संख्या घटती गई,स्थिति ऐसी हो गई है मानो खबरें अखबार में नहीं बल्कि किसी सरकारी फाइल के खाली पन्नों पर छप रही हों,जिन्हें पढ़ने की किसी को जल्दी ही नहीं है,जनता पूछ रही है कि यदि आरोप गलत हैं तो उनका खंडन क्यों नहीं किया जा रहा? और यदि आरोपों में दम है तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? लेकिन जवाब देने की जगह सन्नाटा पसरा हुआ है, ऐसा सन्नाटा, जिसमें केवल फाइलों के पन्ने पलटने की आवाज सुनाई देती है,निर्णय लेने की नहीं।
छह महीने में पदोन्नति,सरकारी सेवा या प्रशासनिक रॉकेट विज्ञान?
सरकारी नौकरी करने वाले लाखों कर्मचारी इस खबर को पढ़कर शायद अपने माथे पर हाथ रख लें,दस्तावेज बताते हैं कि संबंधित कर्मचारी की नियुक्ति 7 अप्रैल 1986 को स्टेनो टाइपिस्ट के पद पर हुई और महज छह महीने बाद 27 अक्टूबर 1986 को स्टेनोग्राफर बना दिए गए,अब यह सूचना उन कर्मचारियों को न बताइए जो 10-15 वर्षों से पदोन्नति की प्रतीक्षा कर रहे हैं,वरना वे इसे प्रशासनिक चमत्कार घोषित कर सकते हैं,सरकारी कार्यालयों में सामान्यतः पदोन्नति की प्रक्रिया इतनी लंबी होती है कि कई बार कर्मचारी रिटायरमेंट के बाद भी उसका इंतजार करते रहते हैं, लेकिन यहां यदि वास्तव में छह महीने में पद परिवर्तन हुआ है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई थी? क्या उस समय नियम कुछ और थे? क्या कोई विशेष प्रावधान था? या फिर यह ऐसा प्रशासनिक करिश्मा था जिसकी जानकारी बाकी कर्मचारियों को कभी नहीं मिल सकी? जांच इसलिए जरूरी है क्योंकि जवाब जितना देर से मिलेगा,संदेह उतना गहरा होगा।
मत्स्य निगम विभाग का कर्मचारी,राजस्व विभाग का प्रभाव!
पूरे प्रकरण का सबसे दिलचस्प अध्याय प्रतिनियुक्ति का है,जानकारी के अनुसार संबंधित कर्मचारी मूलतः मत्स्य विभाग से जुड़े बताए जाते हैं, लेकिन वर्षों से राजस्व विभाग और कलेक्ट्रेट में प्रभावशाली भूमिका निभाते रहे हैं,अब सवाल यह नहीं है कि प्रतिनियुक्ति हुई या नहीं,सवाल यह है कि प्रतिनियुक्ति कितने समय के लिए हुई थी? क्या उसका नवीनीकरण होता रहा? यदि हुआ तो किस आधार पर? और यदि नहीं हुआ तो फिर यह व्यवस्था आखिर चली कैसे? सरकारी तंत्र में प्रतिनियुक्ति आम बात है,लेकिन जब प्रतिनियुक्ति दशकों तक चलने लगे तो लोग उसे प्रतिनियुक्ति नहीं, स्थायी साम्राज्य मानने लगते हैं,यही कारण है कि कलेक्ट्रेट के गलियारों में लोग अब मजाक में कहने लगे हैं कि सरकारें अस्थायी हो सकती हैं,लेकिन कुछ प्रतिनियुक्तियां स्थायी होती हैं।
सर्विस बुक : प्रशासन की गुमशुदा डायरी?
किसी भी सरकारी कर्मचारी की सर्विस बुक उसकी आधिकारिक जीवनी होती है,उसमें नियुक्ति से लेकर पदोन्नति,वेतनवृद्धि,अवकाश,स्थानांतरण और सेवा संबंधी हर महत्वपूर्ण जानकारी दर्ज रहती है,लेकिन जब किसी कर्मचारी की सर्विस बुक को लेकर ही रहस्य पैदा हो जाए तो मामला गंभीर हो जाता है,कोरिया में आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि संबंधित कर्मचारी की सर्विस बुक आखिर है कहां? मत्स्य विभाग में? राजस्व विभाग में? किसी रिकॉर्ड रूम में? या फिर वह भी उन फाइलों के साथ गुमशुदा है जिनकी चर्चा वर्षों से होती रही है? यह सवाल केवल दस्तावेज का नहीं बल्कि पारदर्शिता का है, यदि रिकॉर्ड उपलब्ध हैं तो उन्हें सामने रखने में परेशानी क्या है?
अब आयुक्त कार्यालय भी कटघरे में…
पहले सवाल कलेक्ट्रेट तक सीमित थे,लेकिन अब सवाल संभागीय आयुक्त कार्यालय तक पहुंच गए हैं,कारण साफ है,जब जिला स्तर पर जवाब नहीं मिलता तो लोग उच्च स्तर की ओर देखते हैं,यदि वहां भी चुप्पी दिखाई दे तो लोगों को लगता है कि शायद मामला सामान्य नहीं है,आयुक्त कार्यालय प्रशासनिक निगरानी का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है,ऐसे में यदि लगातार सवाल उठ रहे हों और कोई स्पष्ट स्थिति सामने न आए तो स्वाभाविक रूप से संदेह बढ़ता है,यही कारण है कि अब लोगों की नजरें संभागीय स्तर पर टिकी हुई हैं।
आरटीआई बनाम फाइलों का किला…
सूचना का अधिकार कानून इसलिए बनाया गया था ताकि जनता को सरकारी सूचनाएं आसानी से मिल सकें,लेकिन यदि सूचना मांगने के बाद भी स्पष्ट जानकारी न मिले तो जनता के मन में शंका पैदा होना स्वाभाविक है,सूत्रों के अनुसार इस मामले में कई बार आरटीआई के तहत जानकारी मांगी गई, लेकिन अपेक्षित सूचनाएं नहीं मिल सकीं,यह स्थिति लोगों को और अधिक सोचने पर मजबूर कर रही है,क्योंकि जब सूचना मांगने वाला जवाब न पाए तो उसे लगता है कि कहीं न कहीं कोई ऐसी दीवार है जिसे पार करना आसान नहीं,और जब दीवारें ज्यादा ऊंची हो जाती हैं तो लोग उन्हें संरक्षण का किला मानने लगते हैं।
शिकायतों का अंतिम संस्कार कहां होता है?
यह प्रश्न आज कोरिया जिले में सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है, वर्षों में हुई शिकायतों का क्या हुआ? वे किस अधिकारी तक पहुंचीं? उनकी जांच हुई या नहीं? उनका निष्कर्ष क्या रहा? इन सवालों के जवाब स्पष्ट रूप से सामने नहीं आए हैं,इसी वजह से कर्मचारियों के बीच व्यंग्य चल पड़ा है कि कुछ शिकायतें जांच अधिकारी तक पहुंचती हैं और कुछ शिकायतें सीधे इतिहास विभाग में भेज दी जाती हैं, कई कर्मचारी मजाक में कहते हैं कि यदि शिकायत किसी सामान्य कर्मचारी के खिलाफ हो तो नोटिस डाक से पहले पहुंच जाता है, लेकिन यदि मामला प्रभावशाली व्यक्ति से जुड़ा हो तो फाइल पहले सोचती है,फिर रुकती है और फिर लंबी नींद में चली जाती है।
हर नए कलेक्टर से नई शुरुआत,लेकिन वही पुराना प्रभाव?
प्रशासनिक गलियारों में एक और चर्चा लंबे समय से सुनाई देती रही है, कहा जाता है कि जिले में आने वाले लगभग हर नए कलेक्टर के साथ संबंधित कर्मचारी ने बेहतर कार्य संबंध स्थापित किए, हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है,लेकिन कर्मचारियों के बीच यह धारणा लगातार बनी हुई है, यही वजह है कि अब लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर वह कौन-सी कार्यकुशलता है जो दशकों तक प्रभाव बनाए रखने में सफल रही? क्या यह केवल अनुभव का परिणाम है? या फिर सिस्टम को समझने और संचालित करने की विशेष कला? जो भी हो,इस चर्चा ने पूरे प्रशासनिक ढांचे पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
संरक्षण मॉडलः लोकतंत्र का नया प्रयोग?
यदि जनता की नजर से देखा जाए तो आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है, क्या शासन का केंद्र अब जवाबदेही है या संरक्षण? क्या नियम सबके लिए समान हैं? क्या प्रभावशाली और सामान्य कर्मचारी के लिए एक जैसी प्रक्रिया लागू होती है? यदि हां, तो फिर कार्रवाई में यह अंतर क्यों दिखाई देता है? यदि नहीं,तो फिर व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है, किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास होता है, और जब लोगों को लगने लगे कि नियमों का उपयोग चयनात्मक तरीके से हो रहा है, तब विश्वास कमजोर होने लगता है।
जवाबदेही की घड़ी कब बजेगी?
पूरा मामला आखिरकार कुछ सीधे सवालों पर आकर रुक जाता है,क्या नियुक्ति और पदोन्नति की प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच होगी? क्या प्रतिनियुक्ति के दस्तावेज सार्वजनिक होंगे? क्या सर्विस बुक की स्थिति स्पष्ट की जाएगी? क्या आरटीआई से जुड़े सवालों का समाधान होगा? क्या वर्षों की शिकायतों का सत्यापन किया जाएगा? और सबसे महत्वपूर्ण— क्या प्रशासन यह साबित करेगा कि उसके लिए जिम्मेदारी मॉडल अभी भी जीवित है? या फिर जनता यह मान ले कि संरक्षण मॉडल ही नया प्रशासनिक दर्शन बन चुका है? फिलहाल कोरिया की फाइलें खामोश हैं, अधिकारी मौन हैं और सवाल लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि फाइलें चाहे जितनी देर तक बंद रहें, एक दिन खुलती जरूर हैं, और जब वे खुलती हैं तो केवल कागज नहीं बोलते, पूरी व्यवस्था की कहानी सामने आ जाती है,आज कोरिया में चर्चा किसी एक स्टेनो की नहीं है। चर्चा उस तंत्र की है जिसमें लोग यह जानना चाहते हैं कि शासन की असली ताकत नियम हैं या रिश्ते,जवाबदेही है या संरक्षण,और जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलता,तब तक यह प्रकरण प्रशासनिक गलियारों में गूंजता रहेगा—एक ऐसे सवाल की तरह,जिसका जवाब फाइलों में कहीं दबा हुआ बताया जाता है।
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