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एमसीबी @ सुशासन के मंच पर मेज पर पसरे पैर..

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  • .दर्द पैरों में था या सत्ता के अहंकार में?
  • सुशासन के मंच पर सत्ता का विश्राम! जनता नीचे बैठी रही…मंत्री जी मेज पर पैर पसारते रहे…
  • मोरगा के सुशासन तिहार में मंत्री जी के अंदाज ने खड़े किए सवाल,जनता समस्या लेकर पहुंची थी और चर्चा पैर की मुद्रा पर अटक गई…
  • जनता सुनाने आई थी दर्द,मंत्री जी दूर करते रहे अपना दर्द!
  • सुशासन तिहार में शिष्टाचार हुआ लाचार,मंच पर मेज बनी ‘फुटरेस्ट’
  • मोरगा में सुशासन का नया मॉडल! समस्याएं नीचे,पैर ऊपर
  • जनता की फरियाद और मंत्री जी का आराम,
  • एक तस्वीर ने खड़े किए कई सवाल
  • सत्ता का सुकून या शिष्टाचार का पतन?
  • सुशासन शिविर में मेज पर पसरे पैर चर्चा में
  • मंच पर मंत्री जी का ‘आराम आसन’, लोकतांत्रिक मर्यादा पर उठे सवाल
  • मोरगा के सुशासन तिहार में मंत्री की मुद्रा बनी चर्चा का विषय
  • विपक्ष ने बताया सत्ता का अहंकार तो समर्थकों ने कहा थकान का असर


-रवि सिंह-
एमसीबी 09 जून 2026 (घटती-घटना)।
एमसीबी जिले के मोरगा में आयोजित सुशासन तिहार का उद्देश्य बड़ा पवित्र था, सरकार जनता के द्वार पहुंच रही थी, अधिकारी समस्याएं सुन रहे थे, जनप्रतिनिधि विकास का लेखा-जोखा दे रहे थे और मंच से यह संदेश दिया जा रहा था कि सरकार जनता के प्रति जवाबदेह है,लेकिन कार्यक्रम समाप्त होने के बाद लोगों को न तो योजनाओं की घोषणाएं ज्यादा याद रहीं और न ही विकास के दावे,चर्चा जिस बात की सबसे ज्यादा हुई, वह थी मंच पर रखी मेज और उस पर टिके मंत्री जी के पैर। प्रदेश के वरिष्ठ मंत्री और जिले के प्रभारी मंत्री रामविचार नेताम कार्यक्रम में पहुंचे थे, मंच पर कलेक्टर, विधायक,भाजपा पदाधिकारी और प्रशासनिक अधिकारी मौजूद थे, नीचे भीषण गर्मी में जनता बैठी थी, जो अपनी समस्याओं के समाधान की उम्मीद लेकर आई थी,लेकिन इसी बीच मंत्री जी ने सामने रखी मेज को शायद कुछ समय के लिए विश्रामगृह समझ लिया और अपने पैर उस पर टिका दिए, अब यह दृश्य कैमरे में कैद हो गया और फिर वही हुआ जो ऐसे मामलों में होता है। तस्वीर ने सवाल खड़े कर दिए और सवालों ने राजनीति को गर्म कर दिया।
जनता धूप में…सत्ता छांव में…
लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत बात यह है कि जनता और जनप्रतिनिधि के बीच संवाद बना रहे,लेकिन जब जनता तपती धूप में बैठी हो और मंच पर आराम का दृश्य दिखाई दे,तो तस्वीर अपने आप तुलना पैदा कर देती है,नीचे बैठे कई ग्रामीण अपनी शिकायतों के निराकरण की प्रतीक्षा कर रहे थे। कोई राजस्व विवाद लेकर आया था,कोई पेंशन की समस्या लेकर, कोई आवास योजना का आवेदन लिए बैठा था,लेकिन मंच से जो तस्वीर बाहर आई,उसने कार्यक्रम की मूल भावना को पीछे धकेल दिया,यही राजनीति की विडंबना है,कई बार वर्षों का काम एक तस्वीर के पीछे छिप जाता है और कई बार एक तस्वीर वर्षों तक पीछा नहीं छोड़ती।
सुशासन तिहार या आराम तिहार?
जनता सोच रही थी कि मंच पर बैठे लोग उनकी समस्याओं पर विचार कर रहे होंगे,कोई सड़क की बात करेगा,कोई बिजली की,कोई पानी की और कोई रोजगार की,लेकिन तस्वीर देखकर कुछ लोगों ने मजाक में कहना शुरू कर दिया कि लगता है कार्यक्रम का नाम ‘सुशासन तिहार’ कम और ‘विश्राम तिहार’ ज्यादा था,वैसे मंत्री जी की उम्र और अनुभव दोनों का सम्मान किया जाना चाहिए,लंबी यात्रा और लगातार कार्यक्रमों के कारण थकान होना स्वाभाविक है,लेकिन राजनीति में समस्या थकान नहीं,उसका सार्वजनिक प्रदर्शन बन जाता है,क्योंकि लोकतंत्र में हर तस्वीर एक संदेश देती है और कभी-कभी संदेश भाषणों से ज्यादा प्रभावशाली हो जाता है।
मेज आखिर होती क्या है?
आम आदमी के घर में मेज पर कभी किताब रखी जाती है,कभी भोजन और कभी जरूरी कागजात,सरकारी कार्यक्रमों में यही मेज जिम्मेदारी,निर्णय और प्रशासनिक गरिमा का प्रतीक मानी जाती है,लेकिन मोरगा के मंच पर उस दिन मेज शायद एक नए प्रयोग से गुजर रही थी,वह फाइलों की जगह कुछ देर के लिए ‘पैर राहत केंद्र’ बन गई,ग्रामीणों के बीच इस दृश्य को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं,किसी ने कहा मंत्री जी थक गए होंगे, किसी ने कहा पैर में दर्द होगा, तो किसी ने व्यंग्य करते हुए कहा कि शायद जनता की समस्याएं इतनी लंबी थीं कि उन्हें सुनने से पहले आराम जरूरी था।
कलेक्टर और अधिकारी भी रहे मौन
इस पूरे घटनाक्रम का एक दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि मंच पर मौजूद किसी भी अधिकारी या जनप्रतिनिधि को यह दृश्य असहज नहीं लगा,कलेक्टर सहित सभी अधिकारी अपने स्थान पर बैठे रहे और कार्यक्रम चलता रहा, अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह सब इतना सामान्य था कि किसी ने ध्यान नहीं दिया, या फिर सत्ता के मंच पर शिष्टाचार भी प्रोटोकॉल की फाइलों में कहीं दब गया है? प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि यदि कोई कनिष्ठ कर्मचारी किसी औपचारिक बैठक में ऐसी मुद्रा में बैठ जाए तो शायद उसे तत्काल अनुशासन और मर्यादा का पाठ पढ़ा दिया जाए, लेकिन जब मंच पर मंत्री हों तो फिर सब कुछ सामान्य मान लिया जाता है।
विपक्ष को मिला तैयार मुद्दा
राजनीति में विपक्ष अवसर नहीं खोजता, अवसर खुद उसके पास चलकर आ जाता है,इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ,पूर्व विधायक गुलाब कमरों ने इसे सत्ता के अहंकार से जोड़ते हुए सरकार पर हमला बोला, विपक्ष का कहना है कि यह दृश्य जनता के प्रति असम्मान का प्रतीक है,वहीं सत्ता पक्ष के समर्थक इसे अनावश्यक विवाद बता रहे हैं, सच चाहे जो भी हो, लेकिन तस्वीर ने राजनीतिक बहस जरूर छेड़ दी है।
पैर का दर्द या व्यवस्था का संकेत?
सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि मंत्री जी ने मेज पर पैर क्यों रखा, बड़ा प्रश्न यह है कि जनता इस दृश्य को किस रूप में देखती है, यदि जनता इसे एक थके हुए वरिष्ठ नेता का मानवीय व्यवहार मानती है तो विवाद स्वतः समाप्त हो जाएगा,लेकिन यदि जनता इसे सत्ता के बढ़ते आत्मविश्वास या अहंकार का प्रतीक मानती है,तो यह तस्वीर लंबे समय तक चर्चा में बनी रह सकती है,राजनीति में धारणा ही वास्तविकता बन जाती है और नेताओं की सबसे बड़ी चुनौती भी यही होती है।
सुशासन की असली परीक्षा
सुशासन केवल योजनाओं, घोषणाओं और शिविरों से नहीं बनता,सुशासन का आधार व्यवहार,संवेदनशीलता और जनता के प्रति सम्मान है, जनता यह नहीं देखती कि मंच पर कौन कितना बड़ा नेता है, बल्कि यह देखती है कि उसके साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है,मोरगा के सुशासन तिहार की यह तस्वीर अब एक प्रतीक बन चुकी है,कोई इसे थकान कह रहा है,कोई असावधानी और कोई अहंकार, लेकिन इतना तय है कि जिस कार्यक्रम का उद्देश्य जनता की समस्याओं को केंद्र में लाना था,वहां चर्चा का केंद्र जनता नहीं बल्कि मेज पर रखे गए पैर बन गए,और लोकतंत्र में इससे बड़ा व्यंग्य शायद क्या होगा कि जनता अपनी समस्या लेकर पहुंची थी, लेकिन सुर्खियां मंत्री जी के ‘आराम’ को मिल गईं।


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