- झुमका में देश की आन-बान-शान पूछती रही…मुझे देखने कब आओगे साहब?
- मैकल की अनुगूंज या जिम्मेदारियों की गूंज? झुमका का तिरंगा मांग रहा जवाब…
- साहब! एक नजर इधर भी… जश्ने-जुबां में डूबे प्रशासन को झुमका के तिरंगे ने आईना दिखाया
- मैकल की अनुगूंज में खोए साहब,तिरंगे ने लिख दी प्रशासन की असली कहानी
- साहित्य के मंच पर सम्मान,झुमका में तिरंगे का अपमान
- जश्ने-जुबां में व्यस्त साहब,झुमका में फटा तिरंगा करता रहा इंतजार
- उपन्यास लिखते रहे अधिकारी,तिरंगा सुनाता रहा बदहाली की कहानी
- विकास के दावों की पोल खोल गया झुमका का फटा तिरंगा…
- मंच पर तालियां बटोरते रहे साहब,देश की शान होती रही तार-तार…
- झुमका में तिरंगा बदहाल, जिम्मेदारों को दिखा सिर्फ अपना कमाल…
- खुद की किताब अमेजन पहुंची, मगर तिरंगे तक न पहुंच सकी जिम्मेदारी
- जश्न साहित्य का चलता रहा,झुमका में राष्ट्र सम्मान सिसकता रहा
- फटा तिरंगा पूछ रहा सवाल, विकास हुआ या सिर्फ हुआ बवाल?
- साहब लिखते रहे विकास की कहानी, तिरंगा दिखाता रहा जमीनी सच्चाई
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/कोरिया,01 जून 2026(घटती-घटना)। कोरिया जिले में इन दिनों एक अजीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है, एक तरफ जिला पंचायत के मुखिया साहित्यिक मंचों पर सम्मानित हो रहे हैं,अपनी लेखनी की उपलब्धियों का उत्सव मना रहे हैं, सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं,आलोचकों को जवाब देने में तत्पर हैं और मैकल की अनुगूंज जैसी रचनाओं के माध्यम से संवेदनाओं का संसार रच रहे हैं, दूसरी ओर उसी जिले का एक प्रमुख पर्यटन स्थल झुमका अपने भीतर छिपी बदहाली की कहानी बयां कर रहा है, जहां करोड़ों रुपये के विकास कार्यों के बीच देश की आन-बान-शान तिरंगा उपेक्षा का शिकार होकर खड़ा दिखाई दे रहा है, यह कहानी केवल एक तिरंगे की नहीं है, यह उस प्रशासनिक मानसिकता की कहानी है जिसमें तस्वीरें चमकती हैं लेकिन व्यवस्था धुंधली हो जाती है,भाषण गूंजते हैं लेकिन जिम्मेदारियां मौन हो जाती हैं।
जब साहित्यकार जाग गया,लेकिन प्रशासक सो गया…
सरकारी सेवा में साहित्य प्रेम होना बुरी बात नहीं है,एक अधिकारी का संवेदनशील होना भी स्वागत योग्य है, लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब साहित्यिक संवेदनशीलता प्रशासनिक संवेदनशीलता पर भारी पड़ने लगे,कोरिया जिले में पिछले तीन वर्षों से अधिक समय से पदस्थ जिला पंचायत के मुखिया ने अपने कार्यकाल में साहित्यिक पहचान भी अर्जित की,पुस्तकें लिखीं, मंचों पर सम्मान पाए और एक लेखक के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई, लेकिन अब सवाल यह उठने लगा है कि जिस व्यक्ति की नजर शब्दों के दर्द को पहचान सकती है, वह झुमका में खड़े तिरंगे का दर्द क्यों नहीं देख पाया? क्या साहित्य केवल किताबों के पन्नों तक सीमित रह गया है? क्या संवेदनशीलता केवल मंचों पर तालियां बटोरने तक सीमित हो गई है?
अब निर्णय प्रशासन को करना है…
जनता ने अपनी बात कह दी है, तस्वीरें सामने आ चुकी हैं, सवाल उठ चुके हैं, अब जिम्मेदारों के सामने दो रास्ते हैं,पहला रास्ता वही पुराना है सफाई देना, बयान जारी करना और आलोचकों को दोषी ठहराना,दूसरा रास्ता है की झुमका की वास्तविक स्थिति का निरीक्षण करना, तिरंगे को सम्मानजनक स्थिति में लाना,निर्माण कार्यों की समीक्षा कराना और जनता को बताना कि आखिर करोड़ों रुपये का उपयोग किस तरह हुआ, यदि प्रशासन दूसरा रास्ता चुनता है तो विश्वास बचेगा,यदि पहला रास्ता चुना गया तो तिरंगा आने वाले दिनों में भी यही याद दिलाता रहेगा कि विकास के दावे चाहे जितने ऊंचे हों, उनकी असली परीक्षा जमीन पर होती है, और फिलहाल झुमका में खड़ा तिरंगा यही कहता दिखाई देता है कि मैकल की अनुगूंज लिखने से पहले प्रशासन को अपने कर्तव्यों की अनुगूंज भी सुननी चाहिए,क्योंकि राष्ट्रध्वज की खामोशी कभी-कभी सबसे बड़ा आरोप बन जाती है।
झुमका:विकास का मॉडल या प्रयोगशाला?
झुमका पर्यटन क्षेत्र कोरिया जिले की पहचान माना जाता है,इसे विकसित करने के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से भारी राशि खर्च की गई, ओपन थियेटर बना, सौंदर्यीकरण हुआ, पार्किंग बनाई गई और कई निर्माण कार्य कराए गए,कागजों में यह सब देखकर लगता है कि मानो झुमका किसी अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल में बदल गया हो,लेकिन धरातल पर तस्वीर कुछ और ही नजर आती है,ओपन थियेटर बनने के बाद उसकी गुणवत्ता पर सवाल उठे, उद्घाटन के कुछ समय बाद ही उसमें सुधार और मरम्मत की जरूरत महसूस होने लगी, पार्किंग व्यवस्था विवादों में घिर गई,स्थानीय लोगों और संचालकों की नाराजगी सामने आई। कई बार ऐसा लगा जैसे विकास कार्य जनता की सुविधा से ज्यादा फोटो सेशन के लिए किए गए हों, यदि कोई निष्पक्ष पर्यवेक्षक इन परियोजनाओं का मूल्यांकन करे तो संभव है कि वह पूछ बैठे—यह विकास है या विकास का ट्रायल वर्जन?
तिरंगा पूछ रहा है…क्या मैं सिर्फ उद्घाटन के दिन के लिए था?
झुमका में स्थापित विशाल तिरंगा कभी गौरव का प्रतीक माना गया था, यह उस भावना का प्रतीक था जिसके लिए लाखों लोगों ने बलिदान दिया,लेकिन आज वही तिरंगा अपनी दुर्दशा के कारण चर्चा का विषय बन गया, विडंबना देखिए कि जिस प्रशासन के पास साहित्यिक कार्यक्रमों में शामिल होने का समय है,सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देने का समय है,सम्मान समारोहों में उपस्थित रहने का समय है,उसके पास अपने ही पर्यटन स्थल में लगे राष्ट्रीय ध्वज की स्थिति देखने का समय नहीं है,तिरंगा यदि बोल सकता तो शायद यही कहता है साहब, आपने ओपन थियेटर देख लिया,मंच देख लिया,सम्मान देख लिया, किताब देख ली… कभी मुझे भी देख लेते।
खनिज न्यास निधि,विकास की गंगा या सुविधाओं की निजी नहर?
कोरिया जिले में लंबे समय से खनिज न्यास निधि को लेकर सवाल उठते रहे हैं, यह निधि मूल रूप से खनिज प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए बनाई गई थी ताकि वहां रहने वाले लोगों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें, लेकिन आलोचकों का आरोप है कि इस निधि का उपयोग कई बार ऐसे कार्यों में हुआ जिनकी प्राथमिकता जनता की जरूरतों से अधिक दिखावे से जुड़ी दिखाई दी, यदि इन कार्यों की गहन जांच हो तो संभव है कि कई ऐसे तथ्य सामने आएं जो विकास की चमकदार तस्वीरों के पीछे छिपे सच को उजागर कर दें,जनता का सवाल सीधा है—यदि करोड़ों रुपये खर्च हुए तो उनके परिणाम स्थायी क्यों नहीं दिखते?
आलोचना से असहज प्रशासन
लोकतंत्र में आलोचना कोई अपराध नहीं होती, बल्कि यह व्यवस्था को बेहतर बनाने का माध्यम होती है, लेकिन जिले में कई बार यह देखने को मिला कि आलोचनाओं का जवाब कार्यों से देने के बजाय भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से दिया गया,सोशल मीडिया पर चेतावनी जैसी भाषा का उपयोग भी चर्चा का विषय बना, सवाल यह है कि यदि सब कुछ सही है तो आलोचना से डर कैसा? एक मजबूत प्रशासक आलोचना का जवाब तथ्यों से देता है, कमजोर प्रशासक आलोचना को व्यक्तिगत हमला समझ बैठता है।
तीन साल का कार्यकाल और बढ़ते सवाल
जिले में अब यह चर्चा भी आम होती जा रही है कि आखिर तीन वर्षों से अधिक के कार्यकाल में वास्तविक उपलब्धियां क्या हैं? यदि उपलब्धियां हैं तो जनता उनमें गर्व क्यों महसूस नहीं कर रही? यदि विकास हुआ है तो उसका असर गांवों और आम लोगों के जीवन में स्पष्ट रूप से क्यों नहीं दिखाई देता? यदि पर्यटन क्षेत्र विकसित हुए हैं तो वहां बार-बार गुणवत्ता और रखरखाव को लेकर शिकायतें क्यों सामने आती हैं? इन सवालों का जवाब किसी प्रेस विज्ञप्ति में नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और पारदर्शी समीक्षा में छिपा है।
जश्ने-जुबां में तालियां,झुमका में खामोशी
हाल ही में आयोजित साहित्यिक कार्यक्रमों में प्रशासनिक मुखिया की सक्रियता चर्चा का विषय रही, सम्मान, मंच और साहित्यिक संवादों के बीच उनकी उपस्थिति ने उन्हें एक लेखक के रूप में स्थापित किया,लेकिन उसी दौरान झुमका में खड़ा तिरंगा शायद किसी और ही कार्यक्रम का हिस्सा था—उपेक्षा महोत्सव का, एक तरफ तालियां बज रही थीं, दूसरी तरफ राष्ट्रीय सम्मान का प्रतीक चुपचाप मौसम की मार झेल रहा था,यह दृश्य प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
जनता पूछ रही है…विकास का चेहरा कौन सा है?
जनता अब सरकारी विज्ञापनों और वास्तविकताओं की तुलना करने लगी है,एक तस्वीर में चमकदार परियोजनाएं दिखाई देती हैं, दूसरी तस्वीर में मरम्मत मांगते निर्माण कार्य,विवादों में घिरी व्यवस्थाएं और उपेक्षित तिरंगा दिखाई देता है, इन दोनों तस्वीरों में से असली तस्वीर कौन सी है? यही सवाल अब जिले की जनता पूछ रही है।
तिरंगे ने खोल दी विकास की फाइल
कई बार वर्षों की बहस और सैकड़ों शिकायतें भी वह प्रभाव नहीं छोड़ पातीं जो एक दृश्य छोड़ देता है, झुमका में तिरंगे की बदहाली ऐसा ही दृश्य बन गई है, इसने उन सभी सवालों को फिर से जीवित कर दिया है जिन्हें समय-समय पर दबाने की कोशिश की गई,यह केवल झंडे की कहानी नहीं है,यह रखरखाव की कहानी है, यह जवाबदेही की कहानी है। यह प्राथमिकताओं की कहानी है।
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