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सोनहत/कोरिया@ 45 करोड़ की सड़क या मिट्टी बचाओ योजना?

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  • रामगढ़ कटवार–कोटाडोल मार्ग पर गुणवत्ता का बवाल
  • सड़क कम,समझौते ज्यादा! रामगढ़ कटवार–कोटाडोल निर्माण में भारी अनियमितता के आरोप
  • रामगढ़ कटवार–कोटाडोल सड़क निर्माण में गुणवत्ता पर उठे सवाल, ग्रामीण बोले सड़क कम, समझौते ज्यादा बिछ रहे हैं
  • PWD की सड़क या ठेकेदार का प्रयोगशाला प्रोजेक्ट? निर्माण गुणवत्ता पर ग्रामीणों का हमला
  • पहले नक्सलियों ने रोकी सड़क,अब घटिया निर्माण ने बढ़ाई चिंता
  • 45 करोड़ की सड़क निर्माण में रोलर चला रहा, बिल बढ़ा रहा लेकिन सड़क की नींव क्यों पड़ी कमजोर?
  • 45 करोड़ की सड़क में ‘कटिंग’ का खेल! किनारों से मिट्टी काटकर भराव का आरोप
  • वारंटी के भरोसे सड़क या टूटने की पहले से तैयारी? रामगढ़ कटवार मार्ग पर सवाल
  • सड़क निर्माण में बचत का बुलडोजर! ग्रामीण बोले पहली बारिश में खुल जाएगी पोल
  • घाट कटिंग में खानापूर्ति, बेस में लापरवाही सड़क निर्माण पर उठे गंभीर सवाल
  • कागजों में मजबूत, जमीन पर कमजोर? 45 करोड़ की सड़क पर ग्रामीणों का आरोप
  • सड़क निर्माण या कमीशन का कम्पेक्शन? भरतपुर–सोनहत में 45 करोड़ का प्रोजेक्ट कटघरे में


-राजन पाण्डेय-
सोनहत/कोरिया ,31 मई 2026(घटती-घटना)।
कभी इस इलाके में नक्सलियों के डर से सड़क नहीं बन पाई थी,तब सरकारें कहती थीं कि बंदूक विकास रोक रही है, अब हालात बदल गए हैं, नक्सली प्रभाव कम हुआ, सड़क निर्माण का रास्ता साफ हुआ,करोड़ों की स्वीकृति मिली,मशीनें पहुंचीं, डंपर गरजे, रोलर दौड़े और जनता ने सोचा कि अब शायद वर्षों की धूल,कीचड़ और उपेक्षा खत्म होगी,लेकिन सड़क निर्माण के शुरुआती दौर में ही जो तस्वीरें और आरोप सामने आने लगे हैं, उन्होंने ग्रामीणों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कहीं विकास के नाम पर फिर से कोई नया खेल तो नहीं खेला जा रहा।
भरतपुर-सोनहत विधानसभा क्षेत्र में लगभग 45 करोड़ रुपये की लागत से रामगढ़ कटवार से कोटाडोल तक करीब 27 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण कार्य शुरू हुआ है,यह सड़क सिर्फ डामर और मिट्टी का ढांचा नहीं है,बल्कि उन गांवों की उम्मीद है जो वर्षों तक अलगाव, खराब संपर्क और प्रशासनिक उपेक्षा का दंश झेलते रहे,लेकिन अब वही सड़क सवालों के गड्ढों में उतरती दिख रही है, ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क निर्माण में गुणवत्ता को शुरुआती स्तर पर ही समायोजित किया जा रहा है,यानी जहां मजबूत बेस बनना चाहिए था, वहां बचत का बेस तैयार किया जा रहा है,जहां तकनीकी मानकों का पालन होना चाहिए था,वहां चलता है वाला रोलर चल रहा है,और जहां सड़क के लिए मिट्टी आनी चाहिए थी,वहां सड़क किनारे की जमीन ही काटकर सड़क में डाल दी गई,गांव के एक बुजुर्ग ने तंज कसते हुए कहा पहले सड़क नक्सली नहीं बनने देते थे,अब सड़क को टिकाऊ बनने नहीं दिया जा रहा।
घाट कटिंग में भी समझौता मॉडल
सिद्ध बाबा स्थल सहित कई हिस्सों में घाट कटिंग और चौड़ीकरण को लेकर भी शिकायतें सामने आई हैं, पहाड़ी इलाकों में सड़क निर्माण बेहद संवेदनशील होता है, वहां कटिंग का सही कोण, जल निकासी और ढलान प्रबंधन जरूरी होता है, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि जहां पर्याप्त कटिंग होनी चाहिए थी, वहां खानापूर्ति कर दी गई, बरसात में यही लापरवाही सड़क बहने, मिट्टी धंसने और दुर्घटनाओं का कारण बन सकती है, एक बुजुर्ग ग्रामीण ने कहा लगता है सड़क इंजीनियर नहीं, बचत सलाहकार बना रहे हैं।
नेटवर्क नहीं,इसलिए निगरानी भी नहीं?
यह पूरा क्षेत्र दूरस्थ और कई जगह नेटवर्क विहीन माना जाता है,मोबाइल सिग्नल कमजोर है, इंटरनेट मुश्किल से चलता है और प्रशासनिक निगरानी भी सीमित रहती है,ग्रामीणों का आरोप है कि इसी स्थिति का फायदा उठाकर निर्माण कार्य में मनमानी की जा रही है,क्योंकि शहरों में सड़क टूटे तो अगले दिन वीडियो वायरल हो जाता है, मीडिया पहुंच जाती है,अधिकारी दौड़ पड़ते हैं,लेकिन जंगल और पहाड़ के बीच बसे गांवों की आवाज अक्सर फाइलों में दब जाती है,ग्रामीणों का कहना है कि यदि यही सड़क किसी बड़े शहर के पास बन रही होती तो अब तक कई जांच टीमें पहुंच चुकी होतीं,लेकिन यहां लोग शिकायत करते रह जाते हैं और काम अपनी रफ्तार से चलता रहता है।
पीडब्ल्यूडी की भूमिका पर सवाल
लोक निर्माण विभाग यानी पीडब्ल्यूडी को तकनीकी गुणवत्ता का प्रहरी माना जाता है,सड़क निर्माण में हर लेयर का परीक्षण,सामग्री की जांच और नियमित निरीक्षण विभागीय जिम्मेदारी होती है, ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या संबंधित अधिकारी निर्माण की निगरानी कर रहे हैं? यदि कर रहे हैं तो फिर इतने आरोप क्यों? और यदि नहीं कर रहे तो फिर करोड़ों की परियोजना आखिर किस भरोसे चल रही है? ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण स्थल पर तकनीकी परीक्षण की पारदर्शिता नहीं दिख रही,न तो कहीं गुणवत्ता रिपोर्ट सार्वजनिक है और न ही लोगों को यह जानकारी है कि किस स्तर पर कौन-सा परीक्षण किया गया,अब लोगों के बीच यह धारणा बनती जा रही है कि सड़क निर्माण में गुणवत्ता फाइलों में ज्यादा और जमीन पर कम दिखाई देती है।
विकास की सड़क या अगला मरम्मत प्रोजेक्ट?
रामगढ़ कटवार-कोटाडोल सड़क क्षेत्र के लिए जीवनरेखा साबित हो सकती है, इससे गांवों का संपर्क सुधरेगा, मरीजों को अस्पताल पहुंचने में सुविधा होगी,छात्रों को राहत मिलेगी,व्यापार बढ़ेगा और प्रशासनिक पहुंच मजबूत होगी,लेकिन यदि सड़क निर्माण के शुरुआती चरण में ही गुणवत्ता पर इतने गंभीर आरोप लग रहे हैं तो लोगों की चिंता भी जायज है,क्योंकि ग्रामीण इलाकों में सड़क सिर्फ रास्ता नहीं होती,वह जीवन की दिशा तय करती है, लोगों को डर है कि कहीं यह सड़क भी उन सड़कों की तरह ना बन जाए जो उद्घाटन के समय चमकती हैं और पहली बारिश के बाद अपनी असली कहानी सुनाने लगती हैं।
ग्रामीणों की मांग…जांच हो,सिर्फ भाषण नहीं…
क्षेत्रवासियों ने सड़क निर्माण की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है,लोगों का कहना है कि स्वतंत्र तकनीकी टीम से मिट्टी,बेस,कम्पेक्शन और निर्माण सामग्री की जांच कराई जाए,साथ ही सड़क निर्माण की प्रत्येक प्रक्रिया की निगरानी की जाए ताकि करोड़ों की राशि का सही उपयोग हो सके,ग्रामीण चाहते हैं कि सड़क ऐसी बने जो वर्षों तक टिके, ना कि ऐसी जिसे हर बारिश के बाद फिर से मरम्मत योजना में शामिल करना पड़े,क्योंकि जनता अब समझ चुकी है कि सड़क का असली उद्घाटन रिबन कटने से नहीं होता,बल्कि पहली बारिश के बाद होता है,और फिलहाल रामगढ़ कटवार-कोटाडोल सड़क को देखकर लोग यही कह रहे हैं डामर अभी बाकी है, लेकिन सवालों की परत अभी से मोटी बिछ चुकी है।
सड़क निर्माण का विज्ञान बनाम जुगाड़ तकनीक
सड़क निर्माण कोई बच्चों का मिट्टी का खेल नहीं होता, इसकी एक वैज्ञानिक प्रक्रिया होती है,पहले निर्धारित गहराई तक खुदाई होती है,फिर मिट्टी का सही कम्पेक्शन, उसके ऊपर जीएसबी यानी ग्रेन्युलर सब-बेस,फिर डब्लूएम्एम यानी वेट मिक्स मैकडम और अंत में डामर की परत बिछाई जाती है,हर लेयर का घनत्व,नमी और मजबूती तकनीकी परीक्षण से जांची जाती है,लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि यहां सड़क इंजीनियरिंग कम और जुगाड़ इंजीनियरिंग ज्यादा चल रही है,कई स्थानों पर बिना समुचित खुदाई किए मिट्टी डाल दी गई,कहीं मिट्टी भी पूरी नहीं डाली गई और सीधे रोलर चलाकर कम्पेक्शन दिखा दिया गया,तकनीकी नियम कहते हैं कि रोलर चलाने से पहले मिट्टी में पर्याप्त पानी डालना चाहिए ताकि वह सही तरीके से बैठ सके,लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि यहां सूखी मिट्टी पर ही रोलर दौड़ाया जा रहा है,यानी सड़क का बेस ऐसा तैयार हो रहा है जैसे किसी गरीब की जिंदगी ऊपर से ठीक दिखती है, लेकिन अंदर से खोखली।
मिट्टी बचाओ,बिल बढ़ाओ योजना?
देवसिल के आगे और मसर्रा से पहले कई जगहों पर सड़क किनारे की मिट्टी काटकर सड़क में भराव करने की बात सामने आई है,इससे सड़क के दोनों ओर गहरे गड्ढे बन गए हैं,ग्रामीणों का कहना है कि यह तरीका न केवल गुणवत्ता पर सवाल खड़ा करता है बल्कि आने वाले समय में दुर्घटनाओं का कारण भी बन सकता है, अब सवाल यह है कि यदि सड़क निर्माण के लिए पर्याप्त मिट्टी का प्रावधान है तो फिर किनारे की मिट्टी काटने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या यह लागत बचाने का तरीका है? या फिर “ऊपर से सब मैनेज है” वाली मानसिकता इतनी मजबूत हो चुकी है कि सड़क किनारे की जमीन भी अब सरकारी बिलों का हिस्सा बन गई है? ग्रामीणों का कहना है कि सड़क के दोनों ओर जो गड्ढे बने हैं,वे बरसात में और गहरे हो जाएंगे, कई जगह पेड़ों की जड़ों के आसपास की मिट्टी काट दी गई है, जिससे आगामी बारिश में पेड़ों के गिरने का खतरा बढ़ गया है,एक ग्रामीण ने कटाक्ष करते हुए कहा सड़क बने या ना बने,गड्ढे तो अभी से तैयार हो गए हैं।
रोलर चलाओ,गुणवत्ता दिखाओ…1
कोटाडोल से मसर्रा मार्ग के बीच लोगों ने आरोप लगाया कि कई हिस्सों में बिना पर्याप्त मिट्टी डाले ही रोलर चला दिया गया,केवल किनारों पर हल्की मिट्टी डालकर औपचारिकता निभा दी गई,अब यह दृश्य ग्रामीणों के लिए किसी सरकारी नाटक से कम नहीं, मशीनें चल रही हैं, धूल उड़ रही है, मजदूर काम कर रहे हैं,अधिकारी कभी-कभी निरीक्षण कर रहे हैं,लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सड़क वास्तव में मजबूत बन रही है? क्योंकि सड़क की मजबूती मशीनों के शोर से नहीं, उसकी नींव से तय होती है, तकनीकी विशेषज्ञ बताते हैं कि यदि बेस लेयर सही न हो तो ऊपर का डामर कुछ महीनों में ही टूटने लगता है,फिर सड़क में दरारें आती हैं, पानी भरता है और धीरे-धीरे पूरी सड़क गड्ढों में बदल जाती है, लेकिन यहां लगता है कि भविष्य की मरम्मत का रास्ता अभी से तैयार किया जा रहा है।
वारंटी…सुरक्षा कवच या भ्रष्टाचार का लाइसेंस?
निर्माण एजेंसियों का एक प्रिय वाक्य होता है सड़क पांच साल की वारंटी में है,यानी अगर सड़क टूटेगी तो ठेकेदार मरम्मत करेगा, सुनने में यह व्यवस्था जनता के हित की लगती है,लेकिन अब ग्रामीण इसी वारंटी पर सवाल उठा रहे हैं, लोग पूछ रहे हैं क्या वारंटी का मतलब यह है कि सड़क टूटना तय है? यदि सड़क सही गुणवत्ता से बनेगी तो पांच साल तक मरम्मत की जरूरत ही क्यों पड़े? क्या वारंटी अब एक ऐसा लाइसेंस बन चुकी है जिसके भरोसे निर्माण के समय गुणवत्ता में कटौती कर दी जाती है और बाद में मरम्मत के नाम पर फिर कमाई का रास्ता खुल जाता है? एक स्थानीय युवक ने व्यंग्य करते हुए कहा सड़क बनाओ ऐसे कि टूटे जरूर, तभी तो वारंटी का असली उपयोग होगा, यह सवाल इसलिए भी बड़ा हो जाता है क्योंकि सरकार ने पिछले वर्षों में एसओआर यानी शेड्यूल ऑफ रेट बढ़ाया है ताकि महंगाई के बीच ठेकेदारों को नुकसान न हो और वे बेहतर गुणवत्ता से काम कर सकें। लेकिन यदि बढ़े हुए रेट के बाद भी गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं,तो फिर जनता पूछ रही है कि आखिर पैसा जा कहां रहा है?

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