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अम्बिकापुर@अस्पतालों की दवा मोनोपोली पर उठे गंभीर सवालः क्या मरीजों को अपनी पसंद की मेडिकल दुकान से दवा खरीदने का अधिकार नहीं?

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  • सरगुजा औषधि विक्रेता संघ ने ढ्ढरू्र को सौंपा ज्ञापन,कहा…सिंगल काउंटर व्यवस्था से मरीजों की स्वतंत्रता प्रभावित,जनहित में तत्काल हस्तक्षेप जरूरी


-न्यूज डेस्क-
अम्बिकापुर,31 मई 2026 (घटती-घटना)। जिले के कुछ निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम्स और उनसे संबद्ध फार्मेसियों में कथित रूप से संचालित ‘सिंगल काउंटर’ दवा व्यवस्था को लेकर सरगुजा औषधि विक्रेता संघ ने गंभीर चिंता जताई है। संघ ने इस व्यवस्था को न केवल दवा व्यापार में एकाधिकार की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाला बताया है, बल्कि इसे मरीजों के अधिकारों, स्वास्थ्य सेवाओं की पारदर्शिता और जनहित से जुड़ा संवेदनशील विषय भी बताया है। इसी मुद्दे को लेकर संघ ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन सरगुजा इकाई को विस्तृत पत्र सौंपते हुए तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। संघ के अध्यक्ष अमित अग्रवाल (मिंटू), सचिव अजय पाठक (बंटी) और कोषाध्यक्ष प्रकाश श्रीवास्तव द्वारा हस्ताक्षरित पत्र में कहा गया है कि जिले के कुछ अस्पतालों एवं उनसे संबद्ध मेडिकल स्टोर्स में ऐसी परिस्थितियां निर्मित हो रही हैं, जहां मरीजों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी एक विशेष फार्मेसी से ही दवा खरीदने के लिए प्रेरित अथवा बाध्य किया जा रहा है। इससे न केवल अन्य लाइसेंसधारी दवा विक्रेताओं के लिए असमान स्थिति उत्पन्न हो रही है, बल्कि मरीजों की स्वतंत्र पसंद और सुविधा भी प्रभावित हो रही है।
मरीज के अधिकार और
सुविधा का सवाल सबसे बड़ा

औषधि विक्रेता संघ का कहना है कि चिकित्सा व्यवस्था का मूल उद्देश्य मरीज को बेहतर उपचार और सुविधाजनक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है। लेकिन यदि किसी मरीज को डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवाएं केवल अस्पताल परिसर में संचालित किसी एक फार्मेसी से ही उपलब्ध हों, तो उसके सामने विकल्प समाप्त हो जाते हैं। वह न तो दवा की कीमत की तुलना कर सकता है और न ही अपनी सुविधा के अनुसार किसी अन्य मेडिकल स्टोर से दवा खरीद सकता है। संघ का मानना है कि मरीज
को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपने डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवा किसी भी वैध एवं लाइसेंसधारी मेडिकल स्टोर से खरीद सके। यदि यह अधिकार व्यवहारिक रूप से सीमित हो जाता है, तो यह मरीजों के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
नैतिकता, पारदर्शिता और
चिकित्सा व्यवस्था की विश्वसनीयता का मुद्दा

पत्र में कहा गया है कि चिकित्सा सेवा और औषधि व्यवसाय दोनों ही सेवा-प्रधान और समाज से सीधे जुड़े हुए क्षेत्र हैं। इसलिए इन क्षेत्रों में पारदर्शिता,निष्पक्षता और नैतिकता का विशेष महत्व है। यदि किसी भी स्तर पर दवा विक्रय में एकाधिकार जैसी स्थिति बनती है, तो इससे चिकित्सा व्यवस्था की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं। संघ ने यह भी कहा है कि स्वास्थ्य सेवाओं को केवल व्यावसायिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि मरीजों की सुविधा और जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
आईएमए से की गई तीन प्रमुख मांगें…

सरगुजा औषधि विक्रेता संघ ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन सरगुजा इकाई से मांग की है कि वह अपने सदस्य चिकित्सकों,अस्पतालों और नर्सिंग होम संचालकों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे कि किसी भी परिस्थिति में मरीजों को किसी एक विशेष फार्मेसी से दवा लेने के लिए बाध्य न किया जाए। संघ ने यह भी मांग की है कि अस्पतालों में लिखी जाने वाली दवाओं की सार्वजनिक उपलब्धता सुनिश्चित कराई जाए, मोनोपोली के रूप में उपलब्ध दवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर स्टॉकिस्ट नियुक्त किए जाएं तथा सभी लाइसेंसधारी मेडिकल स्टोर्स को उचित मार्जिन, एक्सपायरी एवं ब्रेकेज सेटलमेंट जैसी सुविधाओं के साथ समान अवसर उपलब्ध कराए जाएं।
जीवनरक्षक दवाओं की उपलब्धता को लेकर भी चिंता
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि कुछ मामलों में आवश्यक एवं जीवनरक्षक दवाओं की उपलब्धता सीमित काउंटरों तक सिमटने की शिकायतें सामने आई हैं। संघ का कहना है कि यदि किसी आपातकालीन परिस्थिति में संबंधित फार्मेसी में दवा उपलब्ध न हो, स्टॉक समाप्त हो जाए या किसी अन्य कारण से मरीज को तत्काल दवा न मिल सके, तो इससे गंभीर स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न हो सकता है। संघ का तर्क है कि जीवनरक्षक एवं अत्यावश्यक दवाएं जितने अधिक लाइसेंसधारी मेडिकल स्टोर्स पर उपलब्ध होंगी, मरीजों को उतनी ही राहत मिलेगी और आपातकालीन परिस्थितियों में उपचार में देरी की संभावना कम होगी।
दवा बाजार में बढ़ रही असमानता की आशंका
सरगुजा औषधि विक्रेता संघ ने अपने पत्र में कहा है कि कुछ दवा कंपनियों के उत्पादों की उपलब्धता सीमित चैनलों तक सिमटने से जिले के अनेक लाइसेंसधारी दवा विक्रेता उन दवाओं को अपने यहां उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं। इससे बाजार में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है और छोटे एवं मध्यम स्तर के मेडिकल स्टोर आर्थिक रूप से कमजोर पड़ सकते हैं। संघ का कहना है कि यदि कोई दवा चिकित्सकों द्वारा नियमित रूप से लिखी जा रही है, तो उसकी आपूर्ति और उपलब्धता सभी अधिकृत दवा विक्रेताओं के लिए समान रूप से सुनिश्चित की जानी चाहिए। इससे मरीजों को बेहतर विकल्प मिलेंगे और दवा वितरण व्यवस्था अधिक पारदर्शी बनेगी।
कार्रवाई नहीं हुई तो ड्रग कंट्रोल विभाग और प्रशासन तक पहुंचेगा मामला
संघ के अध्यक्ष अमित अग्रवाल, सचिव अजय पाठक और कोषाध्यक्ष प्रकाश श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया है कि यदि इस विषय पर शीघ्र प्रभावी पहल नहीं की जाती, तो संघ इस मुद्दे को ड्रग कंट्रोल विभाग, जिला प्रशासन तथा अन्य सक्षम वैधानिक प्राधिकरणों के समक्ष उठाने के लिए बाध्य होगा। संघ का कहना है कि यह केवल दवा व्यापार से जुड़ा विवाद नहीं है, बल्कि मरीजों के अधिकार,दवाओं की सुगम उपलब्धता,स्वास्थ्य सेवाओं की पारदर्शिता और जनहित से जुड़ा हुआ विषय है। ऐसे में इस मामले में ढ्ढरू्र, स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अब देखना होगा कि मरीजों के हित से जुड़े इस मुद्दे पर संबंधित संस्थाएं क्या कदम उठाती हैं और स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता तथा विकल्प की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए किस प्रकार की पहल की जाती है।
आईएमए से मांगे गए तीन प्रमुख कदम
संघ ने आईएमए सरगुजा से आग्रह किया है कि-

– सदस्य चिकित्सकों एवं अस्पताल प्रबंधन को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं कि मरीजों को किसी विशेष फार्मेसी से दवा लेने के लिए बाध्य न किया जाए।
– अस्पतालों में लिखी जाने वाली दवाओं की सार्वजनिक उपलब्धता सुनिश्चित कराई जाए।
– मोनोपोली वाली दवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर स्टॉकिस्ट नियुक्त कर सभी लाइसेंसधारी दवा विक्रेताओं तक उनकी पहुंच सुनिश्चित की जाए।


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