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कोरिया@बैकुंठपुर यूको बैंक में लोन,लेन-देन और ‘सेटलमेंट मॉडल’ का ऐसा खेल कि थाने तक पहुंचकर भी मामला मैनेज भी हो गया

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  • पहले लोन बांटो,फिर एनओसी देकर मामला दबाओ…
  • बैकुंठपुर यूको बैंक में ‘मैनेजमेंट मॉडल’ पर सवाल…
  • मुद्रा लोन या मैनेजमेंट स्कीम? बैकुंठपुर यूको बैंक
  • में युवाओं के नाम पर खेल और फिर सेटलमेंट
  • थाने पहुंचा यूको बैंक लोन विवाद,फिर शिकायत
  • वापस,क्या पैसा लौटाओ और बच जाओ मॉडल चल रहा है?
  • युवाओं के नाम पर लोन,दूसरों के हाथ में पैसा…
  • बैकुंठपुर यूको बैंक विवाद ने खोली सिस्टम की पोल…
  • लोन घोटाला या समझौता उद्योग? बैकुंठपुर
  • यूको बैंक में एनओसी के पीछे छिपे बड़े सवाल
  • मुद्रा लोन से ‘मैनेज लोन’ तक…यूको बैंक बैकुंठपुर
  • में छुट्टी,ट्रांसफर और सेटलमेंट की कहानी…
  • पहले कर्जदार बनाओ,फिर शिकायत वापस करवाओ…यूको बैंक विवाद में उठे गंभीर सवाल
  • लोन, लेन-देन और लीपापोती…बैकुंठपुर यूको बैंक विवाद में आखिर जिम्मेदार कौन?
  • शिकायतें हुईं,खबरें छपीं…फिर
  • अचानक लोन बंद और एनओसी वितरण शुरू
  • मैनेजर,भाई और कथित एजेंट
  • नेटवर्क की चर्चाओं से गर्म हुआ मामला
  • थाने तक पहुंचा विवाद,लेकिन कार्रवाई से
  • ज्यादा ‘सेटलमेंट’ पर जोर
  • छुट्टी,ट्रांसफर और चुप्पी…क्या सिस्टम
  • फिर जिम्मेदारी से बच निकला?


-रवि सिंह-
कोरिया 30 मई 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले के बैकुंठपुर में स्थित यूको बैंक की शाखा इन दिनों बैंकिंग कम और व्यंग्य का राष्ट्रीय प्रशिक्षण केंद्र ज्यादा दिखाई देने लगी है,यहां कथित तौर पर युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के नाम पर मुद्रा लोन बांटे गए, लेकिन अब जो परतें खुल रही हैं, उससे लगने लगा है कि यह मुद्रा योजना कम और पहले लोन निकालो, फिर मामला संभालो योजना ज्यादा थी,कहते हैं बैंक भरोसे पर चलते हैं, लेकिन बैकुंठपुर का यह मामला अब इस सवाल पर टिक गया है कि आखिर भरोसा किस पर किया जाए बैंक पर, सिस्टम पर, पुलिस पर या उस एनओसी पर जो शिकायत वापस लेने के बाद हाथ में थमा दी जाती है? पूरा मामला अब जिले में उसी तरह चर्चा का विषय बन चुका है जैसे गांव की चौपाल में पुरानी चोरी की कहानी फर्क बस इतना है कि यहां कथित चोरी में ताला नहीं टूटा, सीधे युवाओं के भविष्य टूटते दिखाई दिए।
रोजगार का सपना दिखा,कर्ज का बोझ मिला
बताया जा रहा है कि कई युवाओं को स्वरोजगार और व्यवसाय शुरू करने के नाम पर भारी-भरकम मुद्रा लोन स्वीकृत किए गए,इनमें ऐसे युवा भी शामिल बताए जा रहे हैं जिनकी नियमित आय तक नहीं थी,कोई दिहाड़ी पर काम करता था,कोई छोटा-मोटा रोजगार करता था,कोई खुद यह नहीं समझ पा रहा था कि बैंक आखिर उसे इतना ‘विश्वास’ कैसे दे रहा है,जिन युवाओं की रोजाना आमदनी 400-500 रुपये से ज्यादा नहीं थी,उनके नाम पर लाखों रुपये तक का लोन स्वीकृत हो गया,अब लोग तंज कस रहे हैं कि शायद बैकुंठपुर शाखा में कोई ऐसी मशीन लगी थी जो बेरोजगार युवाओं को ‘भविष्य का उद्योगपति’ घोषित कर देती थी, बैंकिंग नियम कहते हैं कि लोन देने से पहले ग्राहक की आय, व्यवसाय, पुनर्भुगतान क्षमता, दस्तावेज और जोखिम का मूल्यांकन जरूरी होता है, लेकिन यहां जो आरोप सामने आए, वे बताते हैं कि शायद नियमों को छुट्टी पर भेजकर सिर्फ फाइलों को दौड़ाया गया।
मैनेजर,भाई और एजेंट….
बैंकिंग या पारिवारिक साझेदारी?

पूरा विवाद लगातार तत्कालीन शाखा प्रबंधक आनंद, उनके भाई विशाल और कथित एजेंट पियूष के इर्द-गिर्द घूमता रहा, आरोप यह हैं कि युवाओं को लोन दिलाने के नाम पर पूरा नेटवर्क काम कर रहा था,स्थानीय चर्चाओं में यह तक कहा जाने लगा कि बैंक शाखा किसी सरकारी संस्था से ज्यादा ‘फैमिली एंटरप्राइज’ बन गई थी,जहां ग्राहक कम और ‘मैनेजमेंट’ ज्यादा दिखाई देता था, हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक किसी जांच एजेंसी ने नहीं की है,लेकिन शिकायतकर्ताओं के दावों ने पूरे मामले को बेहद गंभीर बना दिया, कई युवाओं ने आरोप लगाया कि उन्हें यह तक स्पष्ट जानकारी नहीं थी कि उनके नाम पर कितनी राशि निकाली गई, पैसा कहां गया और किसने इस्तेमाल किया,सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि कुछ खातों में मोबाइल नंबर और ई-मेल आईडी तक कथित तौर पर बदल दिए गए थे,यानी जिस खाते का मालिक युवा था,उस खाते की सूचना किसी और के मोबाइल पर जा रही थी,अब लोग पूछ रहे हैं अगर ग्राहक को अपने खाते की जानकारी ही न मिले,तो फिर बैंकिंग हो रही थी या रिमोट कंट्रोल ऑपरेशन?
मामला मीडिया में आया तो
अचानक ‘सिस्टम जागा’

चार महीने तक जिन युवाओं की कोई सुनवाई नहीं हुई, जिनके नाम पर लोन चलता रहा,जिनके ऊपर रिकवरी का खतरा मंडराता रहा वही मामले अचानक तब तेज़ी से सुलझने लगे जब खबरें मीडिया में आने लगीं और शिकायतें थाने तक पहुंच गईं,यानी बैंकिंग सिस्टम को ग्राहक की परेशानी से नहीं, खबर छपने से फर्क पड़ा, सूत्रों के अनुसार,शिकायतें बढ़ने के बाद कई लोन खातों में अचानक रकम जमा हुई, कुछ युवाओं को एनओसी दी गई और थाने में की गई शिकायतें वापस लेने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई, अब जिले में लोग यही कह रहे हैं यहां न्याय नहीं, ‘सेटलमेंट’ हुआ है।
पहले चोरी करो, फिर सामान लौटाओ’ मॉडल?
पूरे मामले का सबसे बड़ा व्यंग्य यही बन गया है कि यदि किसी कथित गड़बड़ी में पैसा वापस जमा हो जाए और शिकायतकर्ता को एनओसी मिल जाए, तो क्या पूरा मामला खत्म माना जाएगा? यदि यही नियम है,तो फिर कानून की किताबों में नया अध्याय जोड़ देना चाहिए धाराः पहले पैसा घुमाओ, पकड़े जाओ तो वापस कर दो,लोग पूछ रहे हैं कि अगर शुरुआत से सब कुछ वैध था,तो फिर अचानक इतनी हड़बड़ी में लोन बंद क्यों किए गए? शिकायतें वापस लेने की जरूरत क्यों पड़ी? और अगर गलती हुई थी, तो फिर सिर्फ पैसा लौटाना ही पर्याप्त कार्रवाई कैसे हो सकती है? यह सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि मामला सिर्फ रकम का नहीं, युवाओं के भविष्य का है, किसी भी व्यक्ति के नाम पर गलत तरीके से लोन चलना उसके सिबिल स्कोर, बैंकिंग इतिहास और भविष्य की आर्थिक संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है।
महिला अधिकारी से नजदीकियों की चर्चा और बढ़ते सवाल-मामले में स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी तेज रही कि तत्कालीन प्रबंधक की बैंक के उच्च अधिकारियों तक मजबूत पहुंच थी, यहां तक कि एक वरिष्ठ महिला अधिकारी के साथ करीबी संबंधों की बातें भी चर्चाओं में सामने आईं, हालांकि इन दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लोगों का कहना है कि यदि इतने गंभीर आरोपों के बाद भी कार्रवाई धीमी रही,तो सवाल उठना स्वाभाविक है,अब बैंक के गलियारों में लोग मजाक में कह रहे हैं यहां फाइलें नियम से नहीं,रिश्तों से चलती हैं।
सबसे बड़ा नुकसान किसका हुआ?
इस पूरे विवाद में सबसे ज्यादा नुकसान उन युवाओं का हुआ जो रोजगार और आत्मनिर्भरता का सपना लेकर बैंक पहुंचे थे,उन्हें शायद लगा होगा कि सरकार की योजना उनके जीवन को बदल देगी। लेकिन अब कई युवा अपने नाम पर चढ़े कर्ज,खराब होते सिबिल स्कोर और सामाजिक बदनामी के डर में जी रहे हैं, किसी भी गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार के लिए बैंक का नोटिस सिर्फ कागज नहीं होता, वह मानसिक दबाव, सामाजिक तनाव और आर्थिक असुरक्षा का प्रतीक बन जाता है,लेकिन यहां सिस्टम की संवेदनहीनता देखिए जिन युवाओं को सुरक्षा मिलनी चाहिए थी, वही खुद सफाई देते घूम रहे हैं।
बैंक की साख पर लगा सबसे बड़ा दाग
इस पूरे विवाद ने यूको बैंक की स्थानीय साख को गहरी चोट पहुंचाई है,बैंकिंग व्यवस्था भरोसे पर चलती है, लेकिन जब ग्राहक को यह डर होने लगे कि उसके नाम पर क्या हो रहा है,उसे खुद पता नहीं तब समस्या सिर्फ एक शाखा की नहीं रह जाती, अब लोगों के बीच यह चर्चा होने लगी है कि यदि आरोप सही साबित हुए,तो यह सिर्फ व्यक्तिगत गलती नहीं बल्कि पूरे निगरानी तंत्र की विफलता होगी,और यदि आरोप गलत हैं,तो बैंक को यह बताना होगा कि फिर शिकायतें वापस क्यों हुईं,एनओसी क्यों बांटी गईं और इतनी हड़बड़ी में खातों को ‘सुधारने’ की जरूरत क्यों पड़ी।
आखिर न्याय होगा या सब ‘सेटल’ हो जाएगा?
फिलहाल पूरे जिले में एक ही सवाल घूम रहा है क्या यह मामला सचमुच खत्म हो गया है या सिर्फ दबा दिया गया है? क्योंकि शिकायत वापस हो सकती है, लेकिन सवाल वापस नहीं होते, एनओसी बांटी जा सकती है, लेकिन जिम्मेदारी नहीं मिटती, पैसा लौटाया जा सकता है, लेकिन सिस्टम की विश्वसनीयता वापस लाना इतना आसान नहीं होता, बैकुंठपुर का यह मामला अब सिर्फ बैंकिंग विवाद नहीं रह गया है। यह उस व्यवस्था का आईना बन गया है जहां गरीब युवा कर्ज में फंसता है, अधिकारी छुट्टी पर चले जाते हैं, शिकायतें वापस हो जाती हैं और सिस्टम चैन की सांस लेने लगता है, लेकिन जनता अब भी पूछ रही है अगर सब कुछ सही था, तो फिर इतना कुछ गलत क्यों दिखाई दिया?
थाने तक पहुंचा मामला,लेकिन कार्रवाई कहां गई?
इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प और चिंताजनक हिस्सा पुलिस की भूमिका को लेकर उठ रहे सवाल हैं,जब शिकायत थाने पहुंची, तब कथित तौर पर समाधान प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन अब शिकायत वापस लेने के बाद मामला ठंडा पड़ता दिखाई दे रहा है,यानी जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि यदि कोई मामला मैनेज हो जाए,तो कानूनी कार्रवाई भी फाइलों में सो सकती है,स्थानीय लोग अब तंज कस रहे हैं कि बैकुंठपुर में थाना भी शायद समझौता केंद्र बन चुका है, जहां गंभीर आर्थिक शिकायतें भी बातचीत और सेटलमेंट के बाद शांत हो जाती हैं,सबसे बड़ा सवाल यही है क्या किसी संभावित बैंकिंग अनियमितता में सिर्फ शिकायत वापसी ही पर्याप्त है? क्या पुलिस को स्वतंत्र जांच नहीं करनी चाहिए थी? क्या बैंक प्रबंधन की जवाबदेही तय नहीं होनी चाहिए?
छुट्टी,ट्रांसफर और सिस्टम की पुरानी स्कि्रप्ट

मामले में एक और दिलचस्प मोड़ तब आया जब तत्कालीन शाखा प्रबंधक आनंद लंबी छुट्टी पर चले गए और फिर उनका स्थानांतरण रायपुर हो गया,तब यह चर्चा पूरे जिले में चल रही है कि क्या यह सिर्फ संयोग था या फिर भारतीय सिस्टम की वही पुरानी पटकथा मामला गर्म हो तो छुट्टी ले लो,फिर ट्रांसफर हो जाओ,लोगों का कहना है कि जैसे ही कोई विवाद बड़ा होता है,अधिकारी मेडिकल कारणों,छुट्टी या ट्रांसफर की ढाल लेकर धीरे-धीरे मामले से दूरी बना लेते हैं,फिर जांच फाइलों में घूमती रहती है और जनता दूसरी खबरों में उलझ जाती है।
रिकवरी टीम आई या दबाव टीम?
सूत्रों के मुताबिक बैंक मुख्यालय से एक अधिकारी शाखा पहुंचा था, लेकिन शिकायतकर्ताओं का दावा है कि वह जांच से ज्यादा रिकवरी पर ध्यान देता दिखाई दिया,युवाओं का कहना है कि जब वे खुद को पीडि़त बता रहे थे,तब उनसे ही वसूली की बात की जा रही थी,यह वही स्थिति है जहां सिस्टम पीडि़त और आरोपी के बीच फर्क करना भूल जाता है, बैंक शायद यह तय नहीं कर पा रहा था कि सामने बैठा युवा ग्राहक है,गवाह है या फिर वही व्यक्ति जिससे हर हाल में पैसा निकलवाना है।


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