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सूरजपुर@ बसदेई PHC में इलाज से ज्यादा ‘इगो’ का इलाज जरूरी!

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  • RMA बड़ा या MBBS? सवाल उठे तो पत्रकार पर 50 लाख का नोटिस
  • अस्पताल की बदहाली पर खबर छपी,सिस्टम को अपनी कुर्सी की चिंता हो गई….
  • मरीज रेफर होते रहे,लेकिन नोटिस सेवा सुपरफास्ट निकली!
  • बसदेई PHC में स्वास्थ्य व्यवस्था वेंटिलेटर पर…लेकिन मानहानि नोटिस हाईस्पीड पर…
  • खबर अस्पताल पर थी,लेकिन दर्द प्रभारी की प्रतिष्ठा को हो गया…
  • जांच होनी थी अस्पताल की…शुरू हो गई पत्रकार की घेराबंदी…
  • ड्यूटी रोस्टर कागजों में फिट,व्यवस्था सवालों में हिट…
  • ग्रामीण अस्पताल में अव्यवस्था उजागर हुई तो पत्रकार बना‘आरोपी’
  • अस्पताल चला कौन रहा है? बसदेई PHC में यही सबसे बड़ा सवाल
  • खबर ने नस दबा दी क्या? बसदेई PHC विवाद में बढ़ी बेचैनी
  • जनहित की खबर या ‘गुनाह’? बसदेई PHC मामले में बड़ा विवाद
  • इलाज भगवान भरोसे,लेकिन नोटिस व्यवस्था पूरी तरह आधुनिक!
  • खबर छपी तो स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं सुधरी,लेकिन 50 लाख का नोटिस एक्सप्रेस जरूर दौड़ पड़ा…


-ओंकार पाण्डेय –
सूरजपुर,28 मई 2026 (घटती-घटना)।
सूरजपुर जिले का बसदेई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र इन दिनों किसी अस्पताल से ज्यादा प्रशासनिक रहस्य कथा का केंद्र बन गया है, यहां मरीजों को दवा से पहले रेफर मिलने की शिकायतें पुरानी हैं,डॉक्टरों की उपलब्धता पर सवाल पुराने हैं, ड्यूटी रोस्टर और जमीन की हकीकत के बीच फर्क पुराने हैं,लेकिन जैसे ही इन मुद्दों पर अखबार में खबर छपी,पूरा सिस्टम अचानक सक्रिय हो गया,फर्क सिर्फ इतना था कि सक्रियता अस्पताल सुधारने के लिए नहीं,बल्कि खबर लिखने वाले पत्रकार को 50 लाख का मानहानि नोटिस भेजने के लिए दिखाई दी, अब ग्रामीणों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही घूम रहा है बसदेई पीएचसी में आखिर बड़ा कौन है? मरीज की समस्या, एमबीबीएस डॉक्टर,या फिर कुर्सी का रुतबा?
अस्पताल में इलाज कम, पद की राजनीति ज्यादा?
दैनिक घटती-घटना में प्रकाशित खबरों ने बसदेई पीएचसी की उस अंदरूनी स्थिति को सामने लाने की कोशिश की, जिसे ग्रामीण लंबे समय से महसूस कर रहे थे,खबरों में सवाल उठाया गया कि एमबीबीएस डॉक्टर होने के बावजूद प्रभावहीन क्यों दिखाई दे रहे हैं? अस्पताल संचालन में आरएमए प्रभारी का दबदबा क्यों चर्चा में है? रात की स्वास्थ्य सेवाएं सवालों के घेरे में क्यों हैं? लेकिन खबरों का जवाब स्वास्थ्य विभाग की जांच टीम ने नहीं दिया,जवाब आया कानूनी नोटिस के रूप में, वह भी सीधे 50 लाख रुपये की मानहानि के साथ,अब लोग व्यंग्य में कह रहे हैं अस्पताल में ऑक्सीजन सिलेंडर देर से पहुंचे या न पहुंचे,लेकिन नोटिस की सप्लाई समय पर हो रही है।
अस्पताल वेंटिलेटर पर,लेकिन ‘इमेज मैनेजमेंट’ फिट- बसदेई पीएचसी को लेकर जो तस्वीरें और रिपोर्टें सामने आईं,उन्होंने ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की चिंताजनक स्थिति को उजागर किया। लेकिन सुधार की जगह अब पूरा फोकस‘छवि बचाओ अभियान’पर जाता दिखाई दे रहा है, ऐसा लगने लगा है कि कई सरकारी दफ्तरों में अब नई कार्यशैली विकसित हो चुकी है समस्या ठीक हो या न हो, खबर बाहर नहीं जानी चाहिए, लेकिन सवाल यह है कि खबर रोक देने से क्या अस्पताल ठीक हो जाएगा? क्या नोटिस से मरीजों को इलाज मिलने लगेगा? क्या कानूनी भाषा से डॉक्टरों की उपस्थिति बढ़ जाएगी?
50 लाख का नोटिस डर दिखाने की नई सरकारी दवा?
सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि यदि खबरें गलत थीं,तो उनका तथ्यात्मक खंडन क्यों नहीं जारी किया गया? ड्यूटी रजिस्टर सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए? जांच रिपोर्ट सामने क्यों नहीं रखी गई? सीधा 50 लाख का नोटिस आखिर किस मानसिकता को दर्शाता है? क्या यह संदेश देने की कोशिश थी कि भविष्य में कोई पत्रकार अस्पताल की व्यवस्था पर सवाल उठाने से पहले अपनी आर्थिक स्थिति भी जांच ले? स्थानीय पत्रकारों के बीच अब यह चर्चा तेज है कि क्या ग्रामीण पत्रकारिता अब जोखिम भरा निवेश बनती जा रही है।
क्या प्रभारी खुद को विभाग से भी ऊपर समझने लगे हैं?
मामले ने एक और गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है, संबंधित प्रभारी स्वयं शासकीय कर्मचारी हैं,ऐसे में यदि अस्पताल की व्यवस्था सवालों में है, तो जवाबदेही भी उनसे पूछी जाएगी,लेकिन यहां ऐसा लगा मानो जिम्मेदारी स्वीकारने के बजाय कानूनी दबाव को हथियार बनाया गया,लोग अब पूछ रहे हैं क्या संबंधित प्रभारी ने अपने अधिवक्ता को यह बताया कि वे खुद सरकारी व्यवस्था का हिस्सा हैं? क्या उन्होंने यह बताया कि खबरें निजी जीवन पर नहीं, बल्कि अस्पताल संचालन पर थीं? या फिर पूरा प्रयास सिर्फ इतना था कि खबरों का दबाव किसी तरह कम हो जाए?
आरएमए प्रभारी बने तो सवाल उठना स्वाभाविक था…
जब किसी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में एक आरएमए को प्रभारी बनाया जाता है,तो प्रशासनिक स्तर पर सवाल उठना स्वाभाविक है, लोग पूछेंगे ही कि मेडिकल ऑफिसर यानी एमबीबीएस डॉक्टर की भूमिका क्या रह जाएगी? क्या एमबीबीएस डॉक्टर आरएमए प्रभारी के अधीन काम करेंगे? या फिर केवल नाम के लिए पदस्थ रहेंगे? यही सवाल खबरों में सामने आए थे,लेकिन ऐसा प्रतीत हुआ कि सवालों को व्यवस्था सुधार के अवसर की तरह लेने के बजाय उन्हें ‘प्रतिष्ठा पर हमला’ मान लिया गया, विडंबना यह रही कि जिन खबरों में अस्पताल की व्यवस्था पर चर्चा थी,उन्हें इस तरह पेश किया गया मानो किसी निजी साम्राज्य को गिराने की साजिश चल रही हो।
प्रभारी को खबर से दर्द हुआ, मरीजों की शिकायतों से नहीं?
ग्रामीणों का कहना है कि अस्पताल की व्यवस्थाओं को लेकर शिकायतें नई नहीं हैं,कई बार रात में डॉक्टर उपलब्ध नहीं होने, मरीजों को रेफर करने और स्वास्थ्य सेवाओं में कमी की चर्चा होती रही है, लेकिन उन शिकायतों पर जितनी तेजी से कार्रवाई नहीं हुई, उससे कहीं ज्यादा तेजी से पत्रकार को नोटिस भेजने की प्रक्रिया पूरी हो गई,यानी मरीज इंतजार करते रहे,लेकिन नोटिस ने कभी देरी नहीं की, अब गांव में लोग मजाक में बोल रहे हैं बसदेई PHC में दो चीजें सबसे फास्ट हैं रेफर और लीगल नोटिस।
पत्रकारिता अब सरकारी प्रशस्ति गान बने?
लोकतंत्र में पत्रकार का काम सिर्फ रिबन कटिंग और सम्मान समारोह छापना नहीं होता,पत्रकारिता का असली काम वही है जो असुविधाजनक सवाल पूछे,यदि अस्पताल में अव्यवस्था है, तो सवाल होगा,यदि मरीज परेशान हैं, तो खबर बनेगी,यदि एमबीबीएस डॉक्टर प्रभावहीन बताए जा रहे हैं,तो बहस होगी,लेकिन अब ऐसा वातावरण बनाया जा रहा है कि सवाल पूछो और सीधे ‘मानहानि पैकेज’ प्राप्त करो।
अब जनता पूछ रही है…
क्या बसदेई पीएचसी की निष्पक्ष जांच होगी?
क्या ड्यूटी रोस्टर और वास्तविक उपस्थिति की समीक्षा होगी?
क्या MBBS डॉक्टर और RMA प्रभारी की भूमिका स्पष्ट होगी?
क्या ग्रामीणों की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाएगा?
या पूरा मामला सिर्फ पत्रकार बनाम नोटिस बनकर रह जाएगा?

कुर्सी बड़ी या जिम्मेदारी?
इस पूरे विवाद ने एक बात साफ कर दी है व्यवस्था में कई बार कुर्सी की संवेदनशीलता मरीजों की तकलीफ से ज्यादा तेज हो जाती है,खबर छपते ही जो बेचैनी दिखाई दी,उसने यह संकेत जरूर दिया कि मामला सिर्फ एक रिपोर्ट का नहीं था,कहीं न कहीं खबरों ने उस व्यवस्था को छू लिया था जिसे अब तक सुरक्षित माना जा रहा था।
अंत में…
बसदेई पीएचसी विवाद अब केवल एक अस्पताल की कहानी नहीं रह गया है,यह उस मानसिकता की कहानी बन गया है जहां सवाल पूछने वालों से ज्यादा डर सवाल छपने से लगता है,पत्रकार ने सवाल पूछा,व्यवस्था जवाब दे सकती थी,जांच कर सकती थी,सुधार कर सकती थी, लेकिन जवाब में 50 लाख का नोटिस आया,अब जनता यही कह रही है लगता है खबर सिर्फ अखबार में नहीं छपी…सीधे व्यवस्था की नस पर लग गई।
कानूनी डिस्क्लेमर
यह समाचार उपलब्ध दस्तावेजों,प्रकाशित रिपोर्टों,स्थानीय चर्चाओं और संबंधित पक्षों के आरोप-प्रत्यारोप पर आधारित व्यंग्यात्मक एवं विश्लेषणात्मक प्रस्तुति है,इसमें व्यक्त विचार सार्वजनिक विमर्श और जनहित के संदर्भ में प्रस्तुत किए गए हैं,समाचार का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष की मानहानि करना नहीं है,सभी आरोपों की स्वतंत्र न्यायिक पुष्टि शेष है,यदि किसी पक्ष को तथ्यात्मक आपत्ति हो,तो उनका अधिकृत पक्ष/स्पष्टीकरण प्रकाशित किया जा सकता है।


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