डिग्री संदिग्ध, नियुक्ति पक्की, पदोन्नति एक्सप्रेस — और नियम फाइलों में बेहोश पड़े रहे!
- फूड सेफ्टी विभाग में फर्जी डिग्री का खेल…नौकरी भी मिली,प्रमोशन भी…
- डिग्री पर सवाल,फिर भी सरकारी माल! खाद विभाग में नियुक्ति और पदोन्नति का बड़ा खेल
- फर्जी योग्यता पर सरकारी कुर्सी? खाद एवं औषधि प्रशासन में उठे गंभीर सवाल
- नियम लाइन में खड़े रहे,जुगाड़ कुर्सी पर बैठ गया! ‘
- खाद्य विभाग में ‘डिग्री सेफ्टी’ फेल! संदिग्ध डिग्री से नौकरी और प्रमोशन का आरोप
- दवा जांचने वाला विभाग खुद जांच के घेरे में! नियुक्तियों पर उठे बड़े सवाल
- वरिष्ठों का हक छीन प्रमोशन एक्सप्रेस! खाद एवं औषधि प्रशासन में फाइलों का खेल ‘
- फूड सेफ्टी भवन में फर्जीवाड़े का स्वाद? नियुक्तियों से पदोन्नति तक सवाल ही सवाल
- सिस्टम की लैब में तैयार हुआ प्रमोशन फार्मूला! योग्यता नहीं,जुगाड़ बना असली दवा
- हाईकोर्ट के फैसलों के बाद भी संदिग्ध डिग्री वालों की नियुक्ति पर उठे सवाल
- स्थापना शाखा की भूमिका पर चर्चाएं तेज,वरिष्ठ कर्मचारियों में नाराजगी
- वैध अभ्यर्थी इंतजार करते रहे,विवादित डिग्री वाले अफसर बनते गए
न्यूज डेस्क
रायपुर,26 मई 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ का खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग इन दिनों किसी सरकारी नियामक संस्था से कम और किसी ऐसे प्रयोगशाला से ज्यादा दिखाई देने लगा है, जहाँ दवाइयों व खाद्य पदार्थ की नहीं बल्कि नियमों की ‘टेस्टिंग’ होती है,फर्क बस इतना है कि यहाँ नकली दवा पकड़ी जाए या न जाए,लेकिन कथित रूप से संदिग्ध डिग्री वाले अफसर आराम से सरकारी कुर्सी पर बैठ जाते हैं, फिर पदोन्नति भी पा लेते हैं,और वर्षों से सेवा कर रहे कर्मचारी देखते रह जाते हैं,अब विभाग के भीतर और बाहर एक ही सवाल गूंज रहा है क्या इस विभाग में सब कुछ फर्जी, जुगाड़ और संरक्षण के सहारे ही चलता है? मामले के केंद्र में दो नाम चर्चा में हैं सर्वेश कुमार और सिद्धार्थ पांडे,आरोप यह है कि वर्ष 2015 में हुई उनकी नियुक्ति ऐसी डिग्रियों के आधार पर हुई,जिनकी वैधता पर पहले से सवाल उठ चुके थे,लेकिन सरकारी व्यवस्था का कमाल देखिए जहाँ आम अभ्यर्थी का एक हस्ताक्षर गलत होने पर आवेदन निरस्त हो जाता है,वहीं यहाँ कथित तौर पर डिग्री की वैधता ही सवालों में रही और फिर भी नियुक्ति हो गई, और कहानी यहीं खत्म नहीं हुई,कथित रूप से बाद में इन्हें पदोन्नति भी मिल गई, यानी सिस्टम ने सिर्फ नौकरी नहीं दी,बल्कि विशेष संरक्षण योजना भी लागू कर दी,उधर विभाग के कई वरिष्ठ कर्मचारी अपनी वरिष्ठता सूची लेकर ऐसे बैठे रह गए जैसे रेलवे स्टेशन पर बिना प्लेटफॉर्म के ट्रेन का इंतजार कर रहे हों।
जब हाईकोर्ट बोल चुका
था, तब विभाग क्यों सोता रहा?
सूत्रों से मिले दस्तावेज़ों में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला मौजूद है,जिसमें डिस्टेंस एजुकेशन और राज्य के बाहर संचालित स्टडी सेंटरों से प्राप्त डिग्रियों की वैधता पर गंभीर टिप्पणी की गई थी,कोर्ट ने साफ कहा था कि विश्वविद्यालय बिना वैधानिक अनुमति राज्य की सीमाओं से बाहर अध्ययन केंद्र संचालित नहीं कर सकते,फैसले में यह भी उल्लेख है कि कई विश्वविद्यालयों की डिग्रियाँ नियमों के अनुरूप नहीं मानी जा सकतीं यदि वे निर्धारित अधिकार क्षेत्र के बाहर संचालित हों,अब बड़ा सवाल यह है कि जब ऐसे मामलों पर न्यायालय पहले ही स्पष्ट टिप्पणी कर चुका था,तब खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग ने नियुक्ति के समय दस्तावेजों की जांच किस आधार पर की? क्या दस्तावेज़ देखे ही नहीं गए? या देखे गए लेकिन ‘देखकर भी अनदेखा’ कर दिया गया? सरकारी भाषा में इसे प्रशासनिक प्रक्रिया कहा जाता है, पर जनता की भाषा में सेटिंग है।
विभाग में चर्चा है की
यहाँ फाइल नहीं,कृपा चलती है…
खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग के भीतर इन दिनों कई पुराने मामलों की चर्चा फिर से शुरू हो गई है, कर्मचारी पुराने नियुक्ति आदेश, वरिष्ठता सूची और पदोन्नति रिकॉर्ड खंगाल रहे हैं, एक अधिकारी ने व्यंग्य में कहा यह विभाग अब खाद्य एवं औषधि प्रशासन कम और ‘कैरियर मैनेजमेंट एजेंसी’ ज्यादा लगता है, दूसरे कर्मचारी ने हँसते हुए कहा यहाँ नियम वही लागू होता है, जिसके पीछे कोई बड़ा लागू कराने वाला हो।
फर्जीवाड़े का असर केवल
विभाग तक सीमित नहीं…
यह मामला केवल प्रशासनिक अनियमितता नहीं है,इसका सीधा असर उन युवाओं पर पड़ता है जिन्होंने वैध विश्वविद्यालयों से पढ़ाई की, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की और वर्षों मेहनत की, जब ऐसे मामलों में कथित रूप से नियमों को दरकिनार किया जाता है, तो पूरी भर्ती व्यवस्था पर अविश्वास पैदा होता है, युवाओं के मन में यह सवाल खड़ा होता है क्या मेहनत जरूरी है? या सिर्फ सही संपर्क?
अंतिम सवाल…
यदि डिग्रियाँ वैध थीं तो विभाग सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं करता? यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ,तो वरिष्ठ कर्मचारियों की आपत्तियों का जवाब क्यों नहीं दिया गया? और यदि कहीं अनियमितता हुई, तो कार्रवाई किस पर होगी? सिर्फ नियुक्त व्यक्ति पर या उन अधिकारियों पर भी जिन्होंने वर्षों तक फाइलों पर ‘सब ठीक है’ लिखकर हस्ताक्षर किए?
फूड सेफ्टी विभाग में ‘डिग्री सेफ्टी’ गायब!
यह वही विभाग है जो बाजार में बिक रही दवाइयों व खाद्य पदार्थ की गुणवत्ता जांचता है,एक्सपायरी डेट,लाइसेंस,रासायनिक परीक्षण,सैंपलिंग सब कुछ बड़े नियम से होता है, लेकिन अब कर्मचारी व्यंग्य में पूछ रहे हैं दवाइयों व खाद्य पदार्थ की जांच करने वाले विभाग ने खुद अपने अधिकारियों की डिग्री की जांच की थी या नहीं? एक कर्मचारी ने तंज कसते हुए कहा यहाँ टैबलेट की सील टूट जाए तो जांच बैठ जाती है,लेकिन डिग्री की वैधता टूट जाए तो प्रमोशन मिल जाता है।
स्थापना शाखा-विभाग का असली ‘पावर हाउस’?
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा विभाग की स्थापना शाखा की हो रही है,आरोप यह है कि वर्षों से कुछ स्थायी चेहरे फाइलों की दिशा तय करते रहे। कौन पात्र है, कौन अपात्र, किसकी वरिष्ठता आगे बढ़ेगी,किसकी फाइल दबेगी सब कुछ कथित तौर पर ‘विशेष प्रशासनिक प्रतिभा’ से तय होता रहा,सरकारी दफ्तरों में अक्सर कहा जाता है मंत्री बदलते रहते हैं,लेकिन असली सरकार फाइल संभालने वाले लोग चलाते हैं,यही वजह है कि विभाग के भीतर अब यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि नियुक्ति और पदोन्नति की प्रक्रिया में नियमों से ज्यादा ‘नेटवर्क’ प्रभावी था।
राजपत्र में नियम,व्यवहार में रिश्ते?
पहले दस्तावेज़ में खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग की भर्ती और पात्रता संबंधी सूचनाएँ दर्ज हैं,कागजों में सब कुछ व्यवस्थित दिखाई देता है पात्रता,आरक्षण, योग्यता, चयन प्रक्रिया,लेकिन सवाल यह है कि क्या वास्तविक प्रक्रिया भी उतनी ही पारदर्शी थी? यही भारतीय नौकरशाही का सबसे बड़ा व्यंग्य है,फाइल में नियम ऐसे चमकते हैं जैसे नई किताब का कवर,लेकिन व्यवहार में वही नियम इतने कमजोर हो जाते हैं कि ‘सिफारिश’ का एक फोन आते ही दम तोड़ देते हैं।
क्या केवल दो लोग जिम्मेदार हैं?
यह पूरा मामला केवल दो अधिकारियों तक सीमित नहीं दिखाई देता,असली प्रश्न यह है कि यदि नियुक्ति गलत थी तो सत्यापन किसने किया? चयन समिति ने क्या जांचा? सेवा पुस्तिका किसने अनुमोदित की? पदोन्नति समिति ने वरिष्ठता और पात्रता का परीक्षण क्यों नहीं किया? यदि किसी की डिग्री विवादित थी तो जिम्मेदारी केवल नियुक्त व्यक्ति की नहीं बल्कि उस पूरे सिस्टम की बनती है जिसने उसे वैध घोषित किया।
वरिष्ठ कर्मचारी बने
दर्शक, जूनियर बने अफसर
सरकारी सेवा में वरिष्ठता केवल अनुभव नहीं होती, वह कर्मचारी की वर्षों की मेहनत और प्रतीक्षा का परिणाम होती है,लेकिन आरोप है कि विवादित नियुक्तियों के बाद पदोन्नति में भी ऐसे लोगों को प्राथमिकता दी गई जिन्होंने कथित तौर पर नियमों की सीढ़ी नहीं बल्कि ‘संपर्क की लिफ्ट’ पकड़ी, इससे विभाग के कई कर्मचारियों में भारी नाराजगी बताई जा रही है,एक वरिष्ठ कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा हमने वर्षों जंगल,गांव और फील्ड में काम किया, और कुछ लोग सीधे डिग्री लेकर आए,फिर कुर्सी और प्रमोशन भी ले गए।
सरकारी जांच-भारतीय प्रशासन का सबसे लंबा धारावाहिक
अब चर्चा है कि मामले की शिकायत उच्च स्तर तक पहुंच सकती है,यदि ऐसा हुआ तो संभव है कि विभागीय जांच समिति बने,लेकिन जनता को सरकारी जांच की गति अच्छी तरह पता है,पहले शिकायत आती है,फिर समिति बनती है,फिर फाइल घूमती है,फिर अधिकारी बदलते हैं,फिर रिकॉर्ड मांगे जाते हैं,फिर मामला ‘विचाराधीन’ हो जाता है,और अंत में सच उसी अलमारी में बंद हो जाता है जहाँ पुराने पंखे और टूटी कुर्सियाँ रखी रहती हैं।
सबसे बड़ा खतरा
जनता का भरोसा टूटना
किसी भी नियामक विभाग की ताकत उसका अधिकार नहीं बल्कि उसकी विश्वसनीयता होती है,यदि जनता को यह लगने लगे कि जिस विभाग को कानून लागू करना है,वहीं नियमों का मजाक बन रहा है,तो पूरा सिस्टम अविश्वास के संकट में चला जाता है, और यही इस मामले का सबसे गंभीर पक्ष है।
अंत में…
छत्तीसगढ़ का खाद एवं औषधि प्रशासन विभाग आज एक ऐसे आईने के सामने खड़ा है जहाँ जनता पूछ रही है, जो विभाग नकली दवा पकड़ने का दावा करता है, क्या वह नकली योग्यता पहचानने में असफल रहा? या फिर पहचानकर भी चुप रहा? क्योंकि यह मामला केवल दो नियुक्तियों का नहीं है, यह उस व्यवस्था का चेहरा है जहाँ योग्यता लाइन में खड़ी रहती है और जुगाड़ सीधे कुर्सी पर बैठ जाता है।
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