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बैकुंठपुर/कोरिया@ बीमारी से बच गए तो सिस्टम से लड़ो!

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  • कोरिया जिला चिकित्सालय में ‘10 प्रतिशत चिकित्सा शुल्क’ का कथित खेल, स्वास्थ्य व्यवस्था
  • पर सबसे बड़ा सवाल
  • बीमारी से ज्यादा ‘प्रतिशत’ का दर्द! कोरिया जिला चिकित्सालय में मेडिकल बिलों पर 10 प्रतिशत
  • कमीशन का कथित खेल
  • इलाज के बाद शुरू होता है कमीशन उपचार? द्वितीय अभिमत के नाम पर कर्मचारियों से वसूली के आरोप
  • बीमार कर्मचारी भी नहीं बचे ‘कट’ संस्कृति से! जिला चिकित्सालय में मेडिकल प्रतिपूर्ति पर बड़ा खेल
  • मरीज की मजबूरी पर सिस्टम की कमाई! द्वितीय अभिमत बना कथित वसूली का जरिया
  • इलाज कराकर लौटे कर्मचारी,अब फाइल बचाने की जंग! जिला चिकित्सालय में कमीशनखोरी के आरोप
  • सरकारी कर्मचारी बोले…इलाज से ज्यादा महंगी पड़ रही प्रक्रिया! कोरिया जिला चिकित्सालय फिर विवादों में
  • द्वितीय अभिमत बना ‘द्वितीय कमाई’ का जरिया? इलाज के बाद शासकीय कर्मचारियों की जेब पर दूसरा ऑपरेशन!


-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/कोरिया,26 मई 2026 (घटती-घटना)।
सरगुजा संभाग के स्वास्थ्य मंत्री प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने के लिए लगातार अस्पतालों का निरीक्षण कर रहे हैं,कभी डॉक्टरों की उपस्थिति जांची जा रही है, कभी मरीजों से बातचीत की जा रही है, तो कभी दवा वितरण व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए जा रहे हैं, सरकार मंचों से बेहतर स्वास्थ्य सेवा और जनहित का भाषण दे रही है, लेकिन उसी सरगुजा संभाग के कोरिया जिला चिकित्सालय से जो तस्वीर निकलकर सामने आ रही है, उसने स्वास्थ्य व्यवस्था की नसों में दौड़ रहे कथित प्रतिशत तंत्र को उजागर कर दिया है, आरोप है कि यहां इलाज कराकर लौटे शासकीय कर्मचारियों से मेडिकल प्रतिपूर्ति के लिए आवश्यक द्वितीय अभिमत जारी करने के नाम पर खुलेआम 10 प्रतिशत कमीशन मांगा जा रहा है, यानी बीमारी से परेशान कर्मचारी को अब इलाज से ज्यादा फाइल की बीमारी डराने लगी है, व्यंग्य में कर्मचारी कह रहे हैं यहां इलाज मुफ्त नहीं, प्रतिशत आधारित हो चुका है।
सबसे बड़ा सवाल…क्या अब इलाज भी ‘प्रतिशत’ पर चलेगा?
कोरिया जिला चिकित्सालय पर लगे ये आरोप सिर्फ एक अस्पताल की कहानी नहीं हैं,यह उस व्यवस्था का आईना हैं जहां बीमारी, मजबूरी और सरकारी प्रक्रिया भी कथित कमाई का जरिया बनती जा रही है, एक तरफ स्वास्थ्य मंत्री अस्पतालों को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं,दूसरी तरफ उन्हीं के संभाग में कर्मचारी अपने ही अधिकार के लिए कथित कट देने को मजबूर बताए जा रहे हैं, अब देखना यह होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस मामले में गंभीर कार्रवाई करता है या फिर द्वितीय अभिमत का यह कथित खेल यूं ही चलता रहेगा और बीमार कर्मचारी इलाज से ज्यादा व्यवस्था से डरता रहेगा।
इलाज खत्म,अब शुरू होता है ‘फाइल उपचार’
सरकारी कर्मचारी जब खुद का या अपने परिवार के किसी सदस्य का इलाज कराकर लौटता है, तब तक वह मानसिक,शारीरिक और आर्थिक रूप से पहले ही टूट चुका होता है,किसी ने जमीन गिरवी रखी, किसी ने रिश्तेदारों से उधार लिया,तो किसी ने वर्षों की जमा पूंजी इलाज में लगा दी,लेकिन असली परीक्षा तब शुरू होती है जब वह चिकित्सा प्रतिपूर्ति का दावा लेकर सरकारी दफ्तरों की चौखट पर पहुंचता है,नियमों के अनुसार कई मामलों में कर्मचारी को जिला चिकित्सालय से द्वितीय अभिमत लेना पड़ता है,यही वह जगह है जहां कथित तौर पर प्रतिशत मॉडल सक्रिय हो जाता है,कर्मचारियों का आरोप है कि जैसे ही वे फाइल लेकर जिला चिकित्सालय पहुंचते हैं,उन्हें सीधे तौर पर समझा दिया जाता है 10 प्रतिशत दीजिएज् तभी फाइल आगे बढ़ेगी,यदि कर्मचारी सवाल पूछे तो कथित तौर पर उसे यह भी बताया जाता है कि कमीशन नहीं देने पर या तो द्वितीय अभिमत नहीं मिलेगा या फिर मेडिकल बिल की राशि कम कर दी जाएगी, यानी बीमारी से लड़कर लौटा कर्मचारी अब व्यवस्था की नई बीमारी से लड़ने को मजबूर है।
द्वितीय अभिमत या ‘द्वितीय कमाई केंद्र’?
सरकार ने द्वितीय अभिमत की व्यवस्था इसलिए बनाई थी ताकि चिकित्सा प्रतिपूर्ति में पारदर्शिता बनी रहे और फर्जी दावों पर रोक लग सके, लेकिन कर्मचारियों का आरोप है कि जिला चिकित्सालय में यही प्रक्रिया कथित तौर पर कमाई की स्थायी खिड़की में बदल चुकी है, कर्मचारियों का कहना है कि यहां फाइलें नियमों से कम और समझदारी से ज्यादा चलती हैं,व्यंग्य में एक कर्मचारी ने कहा यहां बीमारी का इलाज डॉक्टर करते हैं और फाइल का इलाज प्रतिशत करता है, कुछ कर्मचारी तो इसे द्वितीय अभिमत सेवा शुल्क तक कहने लगे हैं।
बीमार कर्मचारी की जेब पर दूसरा ऑपरेशन
इस पूरे मामले का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि कर्मचारी इलाज के बाद फिर कर्ज लेने को मजबूर हो रहा है इस बार दवा खरीदने के लिए नहीं,बल्कि अपने ही अधिकार की फाइल बचाने के लिए,कर्मचारियों का कहना है कि मेडिकल प्रतिपूर्ति की प्रक्रिया वैसे ही वर्षों तक लटकी रहती है,कई मामलों में भुगतान होने में सालों लग जाते हैं,ऐसे में कर्मचारी डर के कारण कथित कमीशन दे देता है ताकि कम से कम उम्मीद बनी रहे कि उसका पैसा वापस मिल सकेगा,यानी यहां कर्मचारी दो बार टूट रहा है पहली बार बीमारी से और दूसरी बार व्यवस्था से।
सब ऊपर तक सेट है,कथित दावा और बढ़ी गंभीरता
सबसे गंभीर आरोप यह है कि कथित कमीशन मांगने वाले कर्मचारी खुले तौर पर दावा करते हैं कि शिकायत करने से भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि सब ऊपर तक तय है,यदि यह आरोप सच हैं तो मामला सिर्फ व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक कार्यप्रणाली की सड़ चुकी मानसिकता का संकेत है, लोग तंज कस रहे हैं यहां फाइल की स्पीड इंटरनेट से नहीं,प्रतिशत से बढ़ती है।
सरगुजा संभाग में मंत्री सक्रिय,नीचे सिस्टम ‘सक्रिय कमाई’ में?
स्वास्थ्य मंत्री लगातार अस्पतालों का निरीक्षण कर रहे हैं,मरीजों को बेहतर सुविधा देने की बात हो रही है,लेकिन जिला स्तर पर सामने आ रही शिकायतें एक अलग ही कहानी बयां कर रही हैं,अब लोगों के बीच चर्चा है कि क्या कुछ अधिकारी-कर्मचारी स्वास्थ्य मंत्री की छवि खराब करने में लगे हैं? क्या उनकी सरल और सहज कार्यशैली को कमजोरी समझ लिया गया है? क्या नीचे बैठे जिम्मेदार लोग सुधार की कोशिशों को अंदर ही अंदर खोखला कर रहे हैं? क्योंकि यदि मंत्री सक्रिय हैं और फिर भी भ्रष्टाचार की शिकायतें सामने आ रही हैं,तो इसका मतलब कहीं न कहीं व्यवस्था पर पकड़ कमजोर है।
कैशलेस इलाज की घोषणा और जमीन पर ‘कैश दो’ मॉडल
सरकार ने बजट में कर्मचारियों के लिए कैशलेस चिकित्सा सुविधा लागू करने की बात कही थी ताकि इलाज के दौरान आर्थिक बोझ कम हो सके, लेकिन जमीनी स्थिति देखकर कर्मचारी व्यंग्य में कह रहे हैं यहां कैशलेस इलाज नहीं, कैश देकर इलाज वाली फाइल चलती है, एक कर्मचारी ने कटाक्ष करते हुए कहा अगर व्यवस्था नहीं बदली तो भविष्य में मृत्यु प्रमाण पत्र पर भी प्रतिशत तय हो जाएगा।
बीमार कर्मचारी भी बन गया ‘कमाई का अवसर’
कर्मचारियों का कहना है कि कोई भी कर्मचारी मेडिकल प्रतिपूर्ति के जरिए अमीर बनने नहीं आता,वह सिर्फ अपने इलाज में खर्च हुई राशि वापस चाहता है, जो उसका वैधानिक अधिकार है, लेकिन यदि उसी अधिकार पर कथित कमीशन की परत चढ़ जाए तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि संवेदनहीनता का सबसे कुरूप चेहरा है,यह मामला केवल पैसों का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का है जहां बीमार और परेशान व्यक्ति को भी कमाई का अवसर समझा जा रहा है।
जिला चिकित्सालय की छवि पर गंभीर सवाल
कोरिया जिला चिकित्सालय पहले भी कई विवादों को लेकर चर्चा में रहा है, लेकिन इस बार मामला इसलिए ज्यादा गंभीर माना जा रहा है क्योंकि इसमें सीधे तौर पर शासकीय कर्मचारियों के अधिकार और आर्थिक संकट का प्रश्न जुड़ा हुआ है,लोगों का कहना है कि अस्पताल वह जगह होती है जहां मरीज राहत की उम्मीद लेकर जाता है,लेकिन यदि वहीं उसे प्रतिशत और कमीशन का सामना करना पड़े तो व्यवस्था पर भरोसा कैसे बचेगा? एक स्थानीय नागरिक ने व्यंग्य में कहा यहां ढ्ढष्ट में मरीज कम और फाइलें ज्यादा भर्ती हैं।
कर्मचारियों में आक्रोश,जांच की मांग तेज
अब कर्मचारियों द्वारा पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है, उनकी मांग है कि द्वितीय अभिमत प्रक्रिया ऑनलाइन की जाए, फाइल ट्रैकिंग सिस्टम लागू हो,कथित वसूली की स्वतंत्र जांच हो,दोषियों पर कार्रवाई हो,मेडिकल प्रतिपूर्ति प्रक्रिया समयबद्ध बनाई जाए, शिकायतकर्ताओं की पहचान सुरक्षित रखी जाए, कर्मचारियों का कहना है कि यदि समय रहते इस कथित खेल पर रोक नहीं लगी तो सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा पूरी तरह खत्म हो जाएगा।


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