
- मेहनत मजदूरों के नाम! सोरंगा नर्सरी में उद्यान विभाग पर भाई-भतीजावाद के गंभीर आरोप
- सरकारी आम पर पारिवारिक कब्जा? उद्यान अधीक्षक पर भाई को फायदा पहुंचाने का आरोप
- फल सरकारी, मजदूर सरकारी मुनाफा किसका? सोरंगा नर्सरी में टेंडर प्रक्रिया पर उठे सवाल
- उद्यान विभाग में ‘फैमिली पैक’ टेंडर! भाई को ठेका, कर्मचारियों से तुड़ाई कराने का आरोप
- सोरंगा नर्सरी में भाई-भतीजावाद का ‘फलदार’ खेल? स्थानीय लोगों में भारी नाराजगी
- आम के पेड़ पर खास रिश्तों की बहार! उद्यान अधीक्षक की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल
- टेंडर प्रक्रिया या पारिवारिक व्यवस्था? सरकारी नर्सरी में अनियमितता के आरोप
- भाई को टेंडर,मजदूरों पर बोझ! सोरंगा नर्सरी में नियमों की तुड़ाई का आरोप
- सरकारी पेड़, निजी फायदा? उद्यान विभाग की नीलामी प्रक्रिया पर विवाद
- नर्सरी में फलों से ज्यादा ‘रिश्ते’ पक रहे हैं! कोरिया उद्यान विभाग पर भ्रष्टाचार के आरोप
- सरकारी बाग में परिवारवाद की फसल? सोरंगा नर्सरी की शिकायतों ने खोली विभाग की पोल
–रवि सिंह-
बैकुंठपुर/कोरिया,26 मई 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले के उद्यान विभाग से जुड़ी सोरंगा नर्सरी इन दिनों किसी सरकारी नर्सरी से ज्यादा पारिवारिक फल उत्पादन केंद्र जैसी चर्चा में है, आरोप है कि उद्यान अधीक्षक ने नर्सरी के फलदार वृक्षों की नीलामी में नियमों को किनारे रखकर अपने ही भाई को टेंडर दे दिया। अब सवाल यह उठ रहा है कि यह सरकारी प्रक्रिया थी या घर-घर में विकास योजना? जानकारी के अनुसार नर्सरी में लगे फलदार वृक्षों के फलों की नीलामी की गई थी, लेकिन शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरती गई और अंततः टेंडर अधीक्षक के भाई के नाम पर पहुंच गया, यानी सरकारी आम के पेड़ पर भी रिश्तेदारी का झूला डाल दिया गया।
जांच हुई तो खुल सकते हैं कई ‘फलदार’ राज
सूत्रों का दावा है कि यदि सोरंगा नर्सरी की पूरी जांच हो जाए तो कई और अनियमितताएं सामने आ सकती हैं,इसमें टेंडर प्रक्रिया,मजदूरों के उपयोग, फल बिक्री और विभागीय रिकॉर्ड तक की जांच की मांग उठ रही है, स्थानीय लोगों का कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
नाम भाई का…मेहनत मजदूरों की!
मामले में सबसे गंभीर आरोप यह है कि फलों की सुरक्षा,देखरेख और तुड़ाई का काम भी नर्सरी के सरकारी मजदूरों से कराया जा रहा है, यानी टेंडर निजी व्यक्ति के नाम पर और मेहनत सरकारी कर्मचारियों की! यदि यह आरोप सही है तो बड़ा सवाल खड़ा होता है कि आखिर टेंडर लेने वाले की जिम्मेदारी कौन निभा रहा है? क्या सरकारी मजदूर अब निजी ठेकेदारों के घरेलू सहायक बन चुके हैं? या फिर विभाग में भाई-भतीजा श्रम समन्वय योजना चलाई जा रही है? स्थानीय लोग व्यंग्य में कह रहे हैं फल सरकारी,पेड़ सरकारी,मजदूर सरकारी…बस मुनाफा निजी!
सबसे बड़ा सवाल…क्या सरकारी पेड़ों पर सिर्फ रिश्तेदारों का हक?
सोरंगा नर्सरी विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है क्या सरकारी संपत्ति और संसाधन अब सिर्फ प्रभावशाली लोगों के फायदे का जरिया बनते जा रहे हैं? जहां आम जनता नियमों में उलझी रहती है, वहीं कुछ लोगों के लिए वही नियम पेड़ से टूटते पके आम की तरह आसान हो जाते हैं, अब देखना यह होगा कि विभाग इस मामले में जांच करता है या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों के बगीचे में दबकर रह जाएगा।
नियमों की शाखाओं पर रिश्तेदारी के फल?
जानकार बताते हैं कि किसी भी सरकारी नीलामी प्रक्रिया में पारदर्शिता और हितों के टकराव से बचना बेहद जरूरी होता है,यदि विभागीय अधिकारी के रिश्तेदार को टेंडर मिलता है तो प्रक्रिया पर स्वतः सवाल खड़े हो जाते हैं, अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या टेंडर प्रक्रिया सार्वजनिक और निष्पक्ष थी? कितने लोगों ने आवेदन किया था? क्या नियमों के अनुसार प्रतिस्पर्धी बोली हुई? क्या वरिष्ठ अधिकारियों को रिश्तेदारी की जानकारी दी गई थी? क्या अधीक्षक ने खुद को प्रक्रिया से अलग किया था? यदि नहीं, तो मामला सिर्फ अनियमितता नहीं बल्कि पद के दुरुपयोग की श्रेणी में भी देखा जा सकता है।
सोरंगा नर्सरी या ‘परिवारिक फ्रुट कॉर्पोरेशन’?
स्थानीय लोगों का कहना है कि सोरंगा नर्सरी में मनमानी की शिकायतें पहले भी सामने आती रही हैं,लेकिन इस बार मामला इसलिए ज्यादा गंभीर माना जा रहा है क्योंकि जानकारी खुद मजदूरों के माध्यम से बाहर आई है, नाम न छापने की शर्त पर कुछ मजदूरों ने बताया कि फलों की तुड़ाई और रखरखाव का काम उन्हीं से कराया जा रहा है, यानी सरकारी मजदूरी से निजी टेंडर का फायदा पहुंचाने का आरोप सीधे-सीधे विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा कर रहा है, ग्रामीणों में चर्चा है कि यदि गहराई से जांच हो तो नर्सरी में और भी कई अनियमितताएं सामने आ सकती हैं।
‘आम’ जनता पूछ रही आखिर लाभ किसका?
सरकारी नर्सरी का उद्देश्य आम जनता और विभागीय आय को बढ़ाना होता है,लेकिन यहां स्थिति ऐसी बताई जा रही है कि लाभ का पेड़ कुछ खास लोगों की तरफ झुकता दिखाई दे रहा है, स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि टेंडर प्रक्रिया निष्पक्ष होती तो कई स्थानीय लोग भी भाग ले सकते थे। लेकिन आरोप है कि पूरी प्रक्रिया पहले से सेट थी,लोग तंज कस रहे हैं यहां आम से ज्यादा खास रिश्ते पक रहे हैं।
मजदूरों में नाराजगी,स्थानीय लोगों में आक्रोश
सूत्रों के अनुसार नर्सरी में काम करने वाले कुछ मजदूर भी अंदरखाने नाराज बताए जा रहे हैं,उनका कहना है कि उनसे ऐसा काम कराया जा रहा है जो निजी ठेकेदार की जिम्मेदारी होनी चाहिए, स्थानीय लोगों का भी आरोप है कि यदि सरकारी संसाधनों का उपयोग निजी लाभ के लिए हो रहा है तो यह सीधे-सीधे सरकारी धन और श्रम का दुरुपयोग है, लोग पूछ रहे हैं कि क्या विभागीय अधिकारियों को यह सब दिखाई नहीं दे रहा? क्या उच्च अधिकारी जांच करेंगे? या फिर मामला फलों की तरह पककर फाइलों में सड़ जाएगा?
भ्रष्टाचार की जड़ें क्या नर्सरी तक पहुंच गईं?
कोरिया जिले में यह मामला अब सिर्फ फलों की नीलामी तक सीमित नहीं रह गया है,यह सरकारी विभागों में बढ़ती रिश्तेदारी संस्कृति और कथित संरक्षणवाद पर भी सवाल खड़ा कर रहा है,व्यंग्य में स्थानीय लोग कह रहे हैं अब सरकारी विभागों में टेंडर नहीं निकलते,परिवार विस्तार योजनाएं निकलती हैं,यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह सिर्फ विभागीय अनियमितता नहीं बल्कि प्रशासनिक नैतिकता पर भी गंभीर प्रश्न होगा।
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