एनडीपीएस कोर्ट का बड़ा फैसला, कहा— युवाओं को नशे में झोंकने वालों पर नहीं बरती जाएगी नरमी
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/कोरिया, 24 मई 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले में नशे के खिलाफ चल रही लड़ाई में विशेष न्यायालय (एनडीपीएस एक्ट) ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने नशीले इंजेक्शन के अवैध कारोबारियों के बीच हलचल मचा दी है,बैकुंठपुर स्थित विशेष न्यायाधीश आशीष पाठक की अदालत ने रामनारायण उर्फ बबन नामक आरोपी को 15 वर्ष के कठोर कारावास और 1 लाख 50 हजार रुपये के अर्थदंड से दंडित किया है, मामला थाना पटना क्षेत्र में अवैध रूप से बुप्रेनॉर्फिन इंजेक्शन रखने और बेचने का था, यह फैसला सिर्फ एक व्यक्ति की सजा नहीं, बल्कि उस पूरे नशे के नेटवर्क पर अदालत की चोट है, जो गांव-कस्बों से लेकर युवाओं की नसों तक फैल चुका है।
बस स्टैंड से शुरू हुई कहानी….मंदिर के पास खत्म हुआ खेल
14 अगस्त 2024 थाना पटना पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली कि एक व्यक्ति बस से भारी मात्रा में नशीली दवा लेकर आने वाला है,सूचना मामूली नहीं थी,पुलिस हरकत में आई, गवाह बुलाए गए,घेराबंदी हुई और ग्राम रनई के पास मंदिर के समीप संदिग्ध व्यक्ति को रोक लिया गया,जब पुलिस ने पूछताछ की,तो सामने आया नाम रामनारायण उर्फ बबन,तलाशी शुरू हुई और फिर वह निकला जिसने पूरे मामले को गंभीर बना दिया। आरोपी के कब्जे से बुप्रेनॉर्फिन इंजेक्शन की 1000 नग एम्प्यूल और एविल की 1000 वायल बरामद हुईं। कुल मात्रा लगभग 2000 ग्राम पाई गई,जो एनडीपीएस एक्ट के अनुसार वाणिज्यिक मात्रा की श्रेणी में आती है,यानी मामला सिर्फ कुछ इंजेक्शन का नहीं था, बल्कि संगठित नशे के कारोबार की बू दे रहा था।
नशे का नेटवर्क कितना गहरा?
यह मामला कई सवाल भी छोड़ता है,इतनी बड़ी मात्रा में इंजेक्शन आखिर आया कहां से? कौन सप्लाई कर रहा था? क्या इसके पीछे कोई मेडिकल चैन सक्रिय है? क्या गांव-कस्बों तक नशे का यह कारोबार संगठित रूप ले चुका है? जिले में पिछले कुछ वर्षों में मेडिकल नशे के मामले तेजी से सामने आए हैं,कफ सिरप,प्रतिबंधित टेबलेट,नशीले इंजेक्शन और फार्मेसी नेटवर्क को लेकर लगातार चर्चाएं होती रही हैं, कई मामलों में यह भी देखा गया कि युवाओं को पहले फ्री डोज देकर लत लगाई जाती है और बाद में उनसे पैसा वसूला जाता है।
युवाओं की नसों में उतरता जहर
विशेषज्ञ मानते हैं कि इंजेक्शन आधारित नशा शरीर को तेजी से नुकसान पहुंचाता है,इससे मानसिक संतुलन बिगड़ना,अपराध की प्रवृत्ति बढ़ना, हिंसक व्यवहार और संक्रमण जैसी समस्याएं बढ़ती हैं,गांवों में कई युवा बेरोजगारी और गलत संगत के कारण ऐसे नशे की गिरफ्त में आ रहे हैं, कई परिवार चुपचाप अपने बच्चों को बर्बाद होते देखते हैं लेकिन सामाजिक बदनामी के डर से खुलकर सामने नहीं आते,यही वजह है कि अदालत ने इस मामले को सिर्फ एक अपराध नहीं बल्कि सामाजिक संकट के रूप में देखा।
पटना पुलिस की कार्रवाई बनी मिसाल
इस मामले में थाना पटना पुलिस की कार्रवाई भी चर्चा में रही, मुखबिर सूचना पर त्वरित कार्रवाई,पंचनामा,गवाह,जब्ती और एफएसएल रिपोर्ट जैसी प्रक्रियाओं को व्यवस्थित तरीके से अदालत में प्रस्तुत किया गया, अक्सर एनडीपीएस मामलों में तकनीकी खामियों के कारण आरोपी बच निकलते हैं, लेकिन इस मामले में जांच प्रक्रिया मजबूत रही, जिसके कारण अदालत ने दोष सिद्ध माना।
इलाज के नाम पर नशे का कारोबार
बुप्रेनॉर्फिन मूलत,दर्द और नशा मुक्ति उपचार में उपयोग होने वाली दवा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यही इंजेक्शन युवाओं के लिए सस्ता नशा बन चुका है,गांवों में इसे सुई वाला नशा कहा जाता है,कोर्ट ने अपने फैसले में इस खतरे को गंभीरता से स्वीकार किया,आदेश में स्पष्ट कहा गया कि सीमावर्ती जिलों में नशीले इंजेक्शनों का अवैध उपयोग लगातार बढ़ रहा है और इससे किशोर अपराध एवं सामाजिक अव्यवस्था को बढ़ावा मिल रहा है,यानी अदालत ने केवल कानून की किताब नहीं देखी, बल्कि समाज की बिगड़ती तस्वीर को भी पढ़ा।
2000 ग्राम का मतलब क्या होता है?
अक्सर आम लोग सोचते हैं कि इंजेक्शन तो दवा होती है,फिर इतनी बड़ी सजा क्यों? असल खेल मात्रा का है, केंद्र सरकार की अधिसूचना के अनुसार बुप्रेनॉर्फिन की 20 ग्राम से अधिक मात्रा वाणिज्यिक मात्रा मानी जाती है, यहां पुलिस ने 2000 ग्राम मात्रा बरामद की। यानी तय सीमा से सौ गुना अधिक,कानून की नजर में यह केवल व्यक्तिगत उपयोग नहीं, बल्कि अवैध व्यापार माना जाता है, इसी आधार पर अदालत ने आरोपी को एनडीपीएस एक्ट की धारा 22 (सी) के तहत दोषी ठहराया।
जांच में नहीं बच पाया आरोपी
मामले में पुलिस ने केवल गिरफ्तारी तक खुद को सीमित नहीं रखा, जब्त इंजेक्शन को परीक्षण हेतु फॉरेंसिक साइंस लैब भेजा गया, एफएसएल रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि बरामद दवा मादक प्रभाव वाली है, आरोपी से वैध मेडिकल लाइसेंस,स्टॉक रजिस्टर या बिक्री से संबंधित दस्तावेज मांगे गए,लेकिन वह कुछ प्रस्तुत नहीं कर सका,यहीं से उसका बचाव कमजोर पड़ गया,अभियोजन पक्ष की ओर से लोक अभियोजक कामिनी राजवाड़े ने अदालत में तर्क दिया कि आरोपी समाज के युवाओं को नशे की दलदल में धकेल रहा था और ऐसे मामलों में कठोर सजा ही उचित है।
कोर्ट की टिप्पणी ने बढ़ाई सख्ती
फैसले के पैरा 43 में अदालत ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि कोरिया और एमसीबी जैसे सीमावर्ती जिलों में नशीले पदार्थों का अवैध व्यापार बढ़ रहा है और किशोरों में नशे की प्रवृत्ति चिंताजनक स्तर पर पहुंच रही है, कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसी परिस्थितियों में आरोपी के प्रति नरम रुख दिखाने का कोई आधार उपलब्ध नहीं है,यानी अदालत ने यह संकेत दिया कि भविष्य में भी ऐसे मामलों में कठोर दंड की नीति अपनाई जा सकती है।
15 साल की सजा… और एक संदेश
अदालत ने आरोपी को 15 वर्ष का कठोर कारावास सुनाया है,साथ ही 1.50 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है,जुर्माना नहीं भरने पर अतिरिक्त एक वर्ष की जेल भुगतनी होगी, यह फैसला अब जिले में एक मिसाल की तरह देखा जा रहा है,संदेश साफ है जो लोग युवाओं के भविष्य को नशे की सुई में बेच रहे हैं,उनके लिए अदालत अब नरमी के मूड में नहीं है,क्योंकि यह लड़ाई केवल कानून की नहीं,आने वाली पीढ़ी को बचाने की भी है।
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