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बैकुंठपुर/कोरिया@ तहसील में शिक्षा का अपहरण!

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  • बैकुंठपुर में लिपिकों की संलग्नता पर उठे सवाल, स्कूलों से ज्यादा ‘राजस्व दरबार’ में दिख रही हाजिरी
  • स्कूलों के बाबू तहसील में व्यस्त, शिक्षा व्यवस्था भगवान भरोसे!
  • बैकुंठपुर तहसील में ‘संलग्नता राज’ शिक्षा विभाग बना स्टाफ सप्लायर?
  • राजस्व की फाइलों में उलझी शिक्षा व्यवस्था, आखिर किसके संरक्षण में चल रहा खेल?
  • विद्यालय खाली, तहसील गुलजार, बार-बार वही लिपिक क्यों?
  • शिक्षा विभाग के बाबुओं का तहसील प्रेम! सुविधा, दबाव या मिलीभगत?
  • तहसील कार्यालय बना पसंदीदा ठिकाना? शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल
  • बैकुंठपुर में ‘बाबू ट्रांसफर मॉडल’ पर बवाल,जवाबदेही से बच रहा कौन?
  • स्कूलों से गायब लिपिक,तहसील में हाजिरी—प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
  • राजस्व कार्य के नाम पर शिक्षा व्यवस्था की बलि?
  • फाइलों का खेल या सिस्टम का मेल? तहसील में जमे शिक्षा विभाग के लिपिक
  • जब स्कूल का बाबू तहसील में मिले,तो समझ लीजिए व्यवस्था ने यूनिफॉर्म बदल ली है


-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/कोरिया,24 मई 2026(घटती-घटना)।
कोरिया जिले के बैकुंठपुर तहसील कार्यालय में इन दिनों एक अनोखा प्रशासनिक प्रयोग चर्चा का विषय बना हुआ है। प्रयोग ऐसा, जिसमें शिक्षा विभाग के लिपिक राजस्व विभाग की फाइलें संभाल रहे हैं और विद्यालयों के कार्यालय भगवान भरोसे चल रहे हैं। सरकारी भाषा में इसे संलग्नता कहा जा रहा है,लेकिन जनता के बीच इसे व्यवस्था की सुविधाजनक अदला-बदली के रूप में देखा जा रहा है। मामला अब सिर्फ कर्मचारियों की ड्यूटी बदलने तक सीमित नहीं रहा। यह शिक्षा व्यवस्था,प्रशासनिक पारदर्शिता और विभागीय जवाबदेही पर बड़ा सवाल बन चुका है,सवाल यह भी है कि आखिर शिक्षा विभाग के कर्मचारी लगातार तहसील कार्यालय में क्यों दिखाई दे रहे हैं? क्या राजस्व विभाग में कर्मचारियों का अकाल पड़ गया है? या फिर कुछ लोगों के लिए तहसील कार्यालय आरामदायक पोस्टिंग सेंटर बन चुका है?
विद्यालयों के कार्यालयों में सन्नाटा, तहसील में बढ़ी रौनक
जिन लिपिकों की नियुक्ति विद्यालयों और शिक्षा कार्यालयों के प्रशासनिक कार्यों के लिए हुई थी, वे अब तहसील कार्यालयों में राजस्व संबंधी फाइलों की धूल झाड़ते नजर आ रहे हैं, नतीजा यह है कि स्कूलों में प्रमाण-पत्र,वेतन बिल, छात्रवृत्ति,सेवा पुस्तिका और अन्य जरूरी कार्य प्रभावित हो रहे हैं,ग्रामीण क्षेत्रों के कई विद्यालयों में स्थिति यह है कि प्रधानाचार्य खुद बाबू की भूमिका निभाने को मजबूर हैं,कहीं वेतन बिल अटका है,कहीं छात्रवृत्ति की फाइल रुकी है,तो कहीं दस्तावेज सत्यापन लंबित पड़ा हुआ है, लेकिन तहसील कार्यालय में व्यवस्था सुचारु बताई जा रही है,विडंबना देखिए—जिस शिक्षा व्यवस्था को पहले ही स्टाफ की कमी, संसाधनों के अभाव और प्रशासनिक लापरवाही ने कमजोर कर रखा है,अब उसी विभाग के कर्मचारियों को दूसरे विभागों में भेजकर सिस्टम सुधार का दावा किया जा रहा है।
नई कलेक्टर के सामने पहली प्रशासनिक परीक्षा?
अब निगाहें जिले की नवनियुक्त कलेक्टर पर टिकी हैं,जनता और कर्मचारी वर्ग दोनों यह देखना चाहते हैं कि क्या इस मामले की निष्पक्ष जांच होगी या फिर यह मुद्दा भी फाइलों की धूल में दब जाएगा,यदि जांच होती है,तो कई अहम सवाल सामने आ सकते हैं किन आदेशों के तहत संलग्नता की गई? कितनी अवधि के लिए अनुमति दी गई? क्या शिक्षा विभाग की सहमति ली गई थी? क्या इससे विद्यालयों का कार्य प्रभावित हुआ? बार-बार एक ही कर्मचारियों का चयन क्यों हुआ? यदि इन सवालों के जवाब नहीं मिले,तो यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता पर लंबे समय तक सवाल खड़े करता रहेगा।
अस्थायी व्यवस्था या स्थायी आरामगाह?
प्रशासन की ओर से यह तर्क दिया जाता है कि राजस्व कार्यों की अधिकता के कारण अस्थायी रूप से कर्मचारियों की संलग्नता की गई है, लेकिन सवाल यह है कि यह अस्थायी व्यवस्था वर्षों तक कैसे चलती रहती है? स्थानीय चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि कुछ कर्मचारी खुद तहसील कार्यालय में बने रहने के इच्छुक हैं,वजह चाहे सुविधाजनक माहौल हो,प्रभावशाली संपर्क हों या अतिरिक्त लाभ की संभावनाएं—लेकिन इससे सरकारी व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल जरूर खड़े हो रहे हैं,सरकारी नियम स्पष्ट कहते हैं कि किसी भी विभागीय कर्मचारी की संलग्नता सीमित अवधि और विशेष परिस्थितियों में ही होनी चाहिए। लेकिन जब वही चेहरे बार-बार दिखाई दें, तो जनता पूछने लगती है—क्या यह प्रशासनिक आवश्यकता है या स्थायी जुड़ाव योजना?
एक ही चेहरे बार-बार क्यों?
इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प और संदिग्ध पहलू यही बताया जा रहा है कि हर बार संलग्नता की सूची में वही नाम सामने आते हैं, इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या शिक्षा विभाग में बाकी कर्मचारी काम के लायक नहीं हैं? या फिर चयन का आधार योग्यता नहीं, बल्कि जुड़ाव और जुगाड़ है? सरकारी दफ्तरों में अक्सर यह कहावत सुनाई देती है—जिसकी पहुंच मजबूत,उसकी कुर्सी सुरक्षित। बैकुंठपुर में यह कहावत शायद नई ऊंचाइयों पर पहुंचती नजर आ रही है, कुछ लोग तंज कसते हुए कह रहे हैं कि यदि यही हाल रहा, तो भविष्य में स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के लिए भी तहसीलदार कार्यालय से अनुमति लेनी पड़ेगी।
प्राचार्य भी सवालों के घेरे में…
मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू विद्यालयों के प्राचार्यों की भूमिका है। किसी भी शासकीय संस्था के प्रशासनिक प्रमुख होने के नाते यह उनकी जिम्मेदारी होती है कि संस्था का कामकाज प्रभावित न हो,फिर सवाल उठता है कि यदि लिपिकों की अनुपस्थिति से विद्यालय प्रभावित हो रहे थे, तो आपत्ति क्यों दर्ज नहीं की गई? क्या प्राचार्यों पर दबाव था? क्या मौन सहमति थी? या फिर ऊपर से आदेश मानकर सबने आंखें मूंद लीं? कई शिक्षा कर्मियों का कहना है कि कुछ प्राचार्य विवाद से बचने के लिए चुप रहना ही बेहतर समझते हैं। सरकारी व्यवस्था में अक्सर यही संस्कृति पनपती है—फाइल मत छेड़ो, वरना खुद फंस जाओगे।
जिला शिक्षा अधिकारी की चुप्पी पर भी सवाल
इस पूरे मामले में जिला शिक्षा अधिकारी की भूमिका भी कटघरे में खड़ी दिखाई दे रही है,यदि संलग्नता उनकी जानकारी के बिना हुई, तो यह प्रशासनिक नियंत्रण की विफलता है,और यदि जानकारी में हुई,तो फिर सवाल उठता है कि शिक्षा व्यवस्था प्रभावित होने के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यह भी चर्चा है कि विभागीय निरीक्षणों में क्या कभी यह देखा गया कि संबंधित विद्यालयों का कार्यालय कार्य कौन संभाल रहा है? या निरीक्षण सिर्फ रजिस्टरों पर हस्ताक्षर तक सीमित रहा? सरकारी कार्यालयों में अक्सर जवाबदेही नीचे के कर्मचारियों तक सीमित कर दी जाती है,जबकि बड़े निर्णय लेने वाले अधिकारी जानकारी नहीं थी कहकर निकल जाते हैं।
राजस्व विभाग की मजबूरी या स्टाफ प्रबंधन की नाकामी?
राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली निश्चित रूप से व्यापक और दबावपूर्ण होती है,नामांतरण,सीमांकन,आय-जाति-निवास प्रमाण-पत्र,भू-अभिलेख और अन्य कार्यों का भार लगातार बढ़ रहा है,लेकिन इसका समाधान दूसरे विभागों से कर्मचारियों को खींच लेना तो नहीं हो सकता,यदि राजस्व विभाग में स्टाफ की कमी है, तो स्थायी नियुक्ति क्यों नहीं की जाती? क्यों शिक्षा विभाग को मानव संसाधन बैंक की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है? यह स्थिति वैसी ही लगती है जैसे एक अस्पताल में डॉक्टरों की कमी हो और समाधान के तौर पर स्कूल के शिक्षकों को इंजेक्शन लगाने भेज दिया जाए।
जनता पूछ रही—शिक्षा जरूरी है या फाइलों की रफ्तार?
ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अब खुलकर सवाल पूछने लगे हैं,अभिभावकों का कहना है कि जब स्कूलों के कार्यालयीय काम प्रभावित होंगे,तो सबसे ज्यादा परेशानी छात्रों को ही होगी,छात्रवृत्ति,अंकसूची,स्थानांतरण प्रमाण पत्र,प्रवेश प्रक्रिया और वेतन संबंधित फाइलें पहले ही महीनों अटकी रहती हैं,ऊपर से कर्मचारियों की संलग्नता ने स्थिति और बिगाड़ दी है, एक अभिभावक ने तंज कसते हुए कहा सरकार कहती है शिक्षा प्राथमिकता है, लेकिन बाबू साहब तहसील में ज्यादा जरूरी निकले।
व्यवस्था का सबसे बड़ा व्यंग्य
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि सरकार एक तरफ शिक्षा सुधार, डिजिटल स्कूल, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और प्रशासनिक दक्षता के बड़े-बड़े दावे करती है,वहीं दूसरी तरफ स्कूलों के लिपिक तहसील कार्यालयों की फाइलों में उलझे हुए हैं,यानी शिक्षा विभाग कह रहा है बच्चों की पढ़ाई बाद में,पहले राजस्व की लड़ाई,और सरकारी सिस्टम शायद यही मान चुका है कि जहां कुर्सी आरामदायक हो,वहीं सेवा भावना सबसे ज्यादा जागृत होती है।
अब जनता जवाब चाहती है…
यह मामला सिर्फ कुछ कर्मचारियों की संलग्नता का नहीं है,यह उस मानसिकता का प्रतीक बनता जा रहा है,जिसमें विभागीय सीमाएं, जवाबदेही और नियम सुविधानुसार बदल दिए जाते हैं,जनता अब यह जानना चाहती है कि क्या शिक्षा विभाग सिर्फ स्टाफ सप्लाई विभाग बनकर रह जाएगा? क्या विद्यालयों की व्यवस्था ऐसे ही प्रभावित होती रहेगी? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कभी कार्रवाई होगी, या हर बार की तरह जांच की फाइल भी किसी अलमारी में शांतिपूर्वक सो जाएगी?


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