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अम्बिकापुर@अम्बिकापुर में ‘मच्छर संकट’ गहराया : सड़क,पानी,बिजली पर बहस… लेकिन जनता की नींद उड़ाने वाले आतंक पर चुप क्यों नगर निगम?

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-संवाददाता-
अम्बिकापुर,23 मई 2026 (घटती-घटना)। शहर में इन दिनों सड़क,पानी,बिजली और विकास कार्यों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी और बैठकों का दौर लगातार जारी है, लेकिन आम जनता की रोजमर्रा की सबसे बड़ी परेशानी बन चुके ‘मच्छरों के बढ़ते प्रकोप’ पर नगर निगम की चुप्पी अब सवालों के घेरे में आ गई है। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि कई मोहल्लों में लोग बिना मच्छर अगरबत्ती,कॉइल या स्प्रे के घर के भीतर सो तक नहीं पा रहे। शाम ढलते ही गली-मोहल्लों में मच्छरों का ऐसा हमला शुरू हो जाता है कि घर के बाहर खड़ा होना तक मुश्किल हो जाता है। शहर के गांधी नगर, ब्रह्मपारा,केदारपुर,महामाया रोड,नवापारा,सत्तीपारा,शिवधारी कॉलोनी, कंपनी बाजार समेत कई क्षेत्रों के लोगों का कहना है कि पिछले कई महीनों से मच्छरों की संख्या लगातार बढ़ रही है,लेकिन नगर निगम की ओर से न तो नियमित फॉगिंग दिखाई दे रही है और न ही दवाइयों का प्रभावी छिड़काव। लोगों का आरोप है कि निगम की प्राथमिकताओं में जनता की वास्तविक परेशानी कहीं दिखाई नहीं देती। करोड़ों रुपए के विकास कार्यों की चर्चा तो होती है, लेकिन जनस्वास्थ्य से जुड़े इस गंभीर मुद्दे पर ठोस कार्रवाई नजर नहीं आती।
नालियों की बदहाल स्थिति बनी बड़ी वजह : शहर के कई इलाकों में नालियों की नियमित सफाई नहीं हो रही। कहीं नालियां जाम हैं तो कहीं महीनों से गंदा पानी जमा हुआ है। खाली प्लॉटों, तालाब किनारों और कचरा डंपिंग स्थलों के आसपास मच्छरों का सबसे ज्यादा प्रकोप देखा जा रहा है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि बरसात शुरू होने से पहले ही स्थिति भयावह हो चुकी है। यदि समय रहते रोकथाम नहीं हुई तो मानसून के दौरान डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ सकता है।
‘स्वच्छता सर्वेक्षण’ में क्या मच्छरों की गिनती नहीं होती?
हर साल नगर निगम ‘स्वच्छता अभियान’ और ‘स्वच्छ सर्वेक्षण’ को लेकर बड़े-बड़े दावे करता है। शहर की सफाई व्यवस्था,कचरा प्रबंधन और रैंकिंग सुधारने के लिए प्रचार अभियान चलाए जाते हैं। बाहर से टीमें आकर निरीक्षण भी करती हैं। लेकिन शहरवासियों का सवाल है कि क्या इन सर्वेक्षणों में बढ़ते मच्छरों और उनसे फैलने वाली बीमारियों की स्थिति का भी आकलन किया जाता है? यदि किया जाता है,तो फिर जमीनी स्तर पर सुधार क्यों नहीं दिखाई देता? लोगों का कहना है कि नगर निगम के अधिकारी स्वच्छता को केवल फोटो, पेंटिंग और प्रचार तक सीमित कर चुके हैं, जबकि असल समस्या नालियों में जमा गंदगी, जलभराव और कचरे से पैदा हो रहे मच्छरों की है।
फॉगिंग मशीन आखिर कहां है?
शहरवासियों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि नगर निगम के पास फॉगिंग मशीनें और मच्छर नियंत्रण के संसाधन आखिर कितने हैं और उनका उपयोग कहां हो रहा है? कई वार्डों के लोगों का कहना है कि उन्होंने महीनों से अपने क्षेत्र में फॉगिंग वाहन नहीं देखा। कुछ जगहों पर केवल औपचारिकता निभाने के लिए एक-दो बार धुआं कर दिया जाता है, लेकिन उसका कोई स्थायी असर नहीं दिखता। लोगों का आरोप है कि निगम का स्वास्थ्य विभाग कागजी कार्रवाई तक सीमित हो गया है। नियमित मॉनिटरिंग और वार्ड स्तर पर अभियान जैसी व्यवस्था नजर नहीं आती।
बजट है तो खर्च कहां हो रहा?
जनता अब यह सवाल भी पूछ रही है कि मच्छर नियंत्रण, फॉगिंग,दवा छिड़काव और जनस्वास्थ्य सुरक्षा के लिए नगर निगम के पास कितना बजट निर्धारित है? यदि हर वर्ष स्वास्थ्य मद में राशि स्वीकृत होती है तो उसका उपयोग किस प्रकार किया जा रहा है? कितनी दवाइयां खरीदी गईं? कितने वार्डों में छिड़काव हुआ? कितनी बार फॉगिंग कराई गई? इन सवालों का स्पष्ट जवाब जनता को नहीं मिल पा रहा।
बढ़ सकता है डेंगू और मलेरिया का खतरा
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार मच्छरों की बढ़ती संख्या केवल असुविधा नहीं बल्कि गंभीर स्वास्थ्य संकट का संकेत है। गंदगी और जलभराव के कारण डेंगू फैलाने वाले एडीज मच्छर तेजी से पनपते हैं। वहीं मलेरिया और वायरल फीवर का खतरा भी लगातार बढ़ता है। डॉक्टरों का कहना है कि रोकथाम इलाज से ज्यादा जरूरी है। यदि समय रहते सफाई, दवा छिड़काव और जनजागरूकता अभियान नहीं चलाया गया तो अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ सकती है।
जनता की मांग : घोषणाएं नहीं,जमीन पर कार्रवाई चाहिए
शहरवासियों ने नगर निगम प्रशासन से मांग की है किः

– सभी वार्डों में नियमित फॉगिंग अभियान चलाया जाए
– नालियों और जलभराव वाले क्षेत्रों की तत्काल सफाई हो
– मच्छरनाशक दवाइयों का नियमित छिड़काव कराया जाए
– वार्डवार कार्ययोजना सार्वजनिक की जाए
– स्वास्थ्य विभाग की मॉनिटरिंग टीम सक्रिय की जाए
– खाली प्लॉटों और गंदगी फैलाने वालों पर कार्रवाई हो
– मच्छर नियंत्रण के लिए खर्च किए गए बजट का ब्यौरा सार्वजनिक किया जाए
स्मार्ट सिटी नहीं,पहले सुरक्षित शहर बनाइए…
स्थानीय लोगों का कहना है कि शहर को स्मार्ट बनाने के दावे तब तक अधूरे हैं, जब तक नागरिक रात में चैन की नींद न सो सकें।
जनता का सीधा सवाल है…
जब घर के अंदर बैठना मुश्किल हो गया है, बच्चे मच्छरों से परेशान हैं और बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है, तब नगर निगम आखिर किस बात का इंतजार कर रहा है? अब देखने वाली बात यह होगी कि नगर निगम इस बढ़ती समस्या को गंभीरता से लेकर व्यापक अभियान चलाता है या फिर मच्छरों का आतंक केवल जनता की परेशानी बनकर रह जाएगा।


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