

- विधायक गायब,सचिव सक्रिय — सुशासन मंच पर फूटा भाजपा कार्यकर्ताओं का गुस्सा
- मुख्यमंत्री के सामने खुली भाजपा की अंदरूनी लड़ाई, विधायक की निष्कि्रयता पर उठा सवाल
- सुशासन के मंच पर संगठन की बेचैनी, विधायक से ज्यादा चर्चा में निज सचिव
- कुशहा में भाजपा का सियासी भूचाल,अपने ही कार्यकर्ताओं ने खोली विधायक की पोल
- सीएम के दौरे में फूटा असंतोष,भाजपा नेता बोले — क्षेत्र में दिखती ही नहीं विधायक
- सुशासन तिहार बना शिकायत दरबार,भाजपा कार्यकर्ताओं ने अपनी ही विधायक को घेरा
- दो साल की नाराजगी मंच पर फूटी,भाजपा में विधायक बनाम कार्यकर्ता की जंग तेज
- मुख्यमंत्री के सामने भाजपा की किरकिरी, विधायक की अनुपस्थिति पर उठे तीखे सवाल
- भाजपा में ‘पीए राज’ का आरोप,कार्यकर्ताओं ने विधायक से ज्यादा सचिव को घेरा
- हमने उन्हें बोल दिया है — सीएम के जवाब ने बढ़ाई राजनीतिक हलचल
-रवि सिंह-
कोरिया,23 मई 2026(घटती-घटना)। कोरिया जिले के सोनहत विकासखंड के ग्राम कुशहा में आयोजित सुशासन तिहार कार्यक्रम सरकार के लिए उपलब्धियों का मंच होना था, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय जनता के बीच थे, अधिकारी फाइलों के साथ तैयार बैठे थे, योजनाओं के पोस्टर चमक रहे थे और मंच से सुशासन का संदेश दिया जा रहा था, लेकिन राजनीति अक्सर स्कि्रप्ट से नहीं चलती,कुशहा में भी वही हुआ,जनता की समस्याओं के लिए बनाए गए मंच पर भाजपा के अपने कार्यकर्ता ही अपनी विधायक रेणुका सिंह के खिलाफ मोर्चा खोल बैठे।
जो बात दो साल से सोशल मीडिया, व्हाट्सएप ग्रुप और बंद कमरों में धीरे-धीरे उबल रही थी,वह आखिरकार मुख्यमंत्री के सामने सार्वजनिक रूप से फूट पड़ी, भाजयुमो जिला महामंत्री मनोज साहू ने मंच से साफ शब्दों में कहा कि विधायक क्षेत्र में नहीं आतीं,कार्यकर्ता उपेक्षित हैं और जनता की सुनवाई नहीं हो रही,यह बयान केवल शिकायत नहीं था,बल्कि भाजपा संगठन के भीतर जमा असंतोष का सार्वजनिक विस्फोट था, सबसे दिलचस्प दृश्य यह रहा कि शिकायत होते समय वहां मौजूद जनता और भाजपा कार्यकर्ताओं में से किसी ने विरोध नहीं किया,राजनीति में कई बार तालियां नहीं, बल्कि खामोशी सबसे बड़ा संदेश देती है, कुशहा में वही खामोशी गूंज रही थी।

भाजपा के सामने सबसे कठिन चुनौती—अपनों की नाराजगी…
राजनीति में विपक्ष से लड़ना आसान होता है,लेकिन अपने कार्यकर्ताओं की नाराजगी संभालना सबसे मुश्किल काम होता है,भरतपुर-सोनहत क्षेत्र में भाजपा फिलहाल इसी संकट से गुजरती दिखाई दे रही है,एक तरफ विधायक की अनुपस्थिति को लेकर बढ़ती चर्चा है,दूसरी तरफ उनके निज सचिव को लेकर नाराजगी का स्तर इतना बढ़ चुका है कि अब लोग खुले मंच पर बोलने लगे हैं,संगठन अनुशासन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है,लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल नोटिस देकर नाराजगी खत्म हो जाएगी? क्योंकि क्षेत्र में अब एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी तेजी से फैल रही है विधायक का दर्शन दुर्लभ है,लेकिन उनके निज सचिव का प्रभाव सर्वव्यापी है, और राजनीति में जब व्यंग्य जनता की भाषा बन जाए, तो समझ लेना चाहिए कि असंतोष अब केवल चर्चा नहीं रहा,बल्कि जनधारणा बन चुका है।
कारण बताओ नोटिस युवा को, लेकिन सवालों के घेरे में कौन?
घटना के बाद भाजपा जिलाध्यक्ष देवेन्द्र तिवारी की ओर से मनोज साहू को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया, संगठन ने अनुशासन बनाए रखने का संकेत दिया, लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया, यदि मंच से शिकायत करना अनुशासनहीनता है, तो उन परिस्थितियों पर कार्रवाई कौन करेगा जिनकी वजह से शिकायत पैदा हुई? यदि कार्यकर्ताओं को उपेक्षित महसूस हो रहा है, यदि संगठन में संवाद खत्म हो रहा है, यदि सोशल मीडिया पर लगातार अपमानजनक माहौल बन रहा है, तो उसकी जिम्मेदारी तय कौन करेगा? राजनीतिक गलियारों में अब यही चर्चा है कि भाजपा समस्या उठाने वालों पर कार्रवाई करेगी या समस्या पैदा करने वालों पर भी नजर डालेगी, कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा तेजी से फैल रही है कि यदि मुख्यमंत्री के सामने विधायक की निष्कि्रयता की बात कहना अनुशासनहीनता है, तो सोशल मीडिया पर लगातार विवाद पैदा करने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती? मनोज शुक्ला को कारण बताओ नोटिस कौन देगा? विधायक और जनता के बीच बढ़ती दूरी के लिए जिम्मेदारी किसकी तय होगी? संगठन के भीतर गुटबाजी बढ़ाने के आरोपों की जांच कौन करेगा? यही वे सवाल हैं जो अब भाजपा संगठन के भीतर धीरे-धीरे और तीखे होते जा रहे हैं।
सुशासन के मंच पर अनुपस्थिति का सवाल
कार्यक्रम में मुख्यमंत्री मौजूद थे,अधिकारी मौजूद थे,पार्टी के स्थानीय नेता मौजूद थे,लेकिन जिस विधानसभा क्षेत्र में कार्यक्रम आयोजित था,उसकी विधायक अनुपस्थित थीं,यही अनुपस्थिति पूरे विवाद की धुरी बन गई,स्थानीय कार्यकर्ताओं का आरोप कोई नया नहीं है,चुनाव के बाद से लगातार यह चर्चा चलती रही है कि विधायक की क्षेत्रीय सक्रियता सीमित होती जा रही है,लोग कहते हैं कि क्षेत्र की जनता अपनी विधायक का इंतजार ज्यादा करती है और दर्शन कम होते हैं,गांवों में सड़क,बिजली,पानी और स्वास्थ्य की समस्याओं से ज्यादा चर्चा इस बात की होने लगी कि विधायक आखिर हैं कहां? मुख्यमंत्री ने मंच से स्थिति संभालने की कोशिश करते हुए कहा कि विधायक के परिवार में स्वास्थ्य संबंधी समस्या है,बाद में विधायक की ओर से अस्पताल में भर्ती बेटे की तस्वीर साझा कर सफाई भी दी गई,लेकिन राजनीति में समस्या केवल अनुपस्थिति नहीं होती,बल्कि वह धारणा होती है जो अनुपस्थिति पैदा करती है,और भरतपुर-सोनहत क्षेत्र में यह धारणा अब गहराई से बैठ चुकी है कि विधायक क्षेत्र से दूर होती जा रही हैं।
भाजपा में असली ताकत विधायक या उनका सुपर पीए?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे विस्फोटक हिस्सा विधायक के निज सचिव को लेकर उठ रही नाराजगी है, भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा अब खुलेआम होने लगी है कि विधायक से ज्यादा प्रभाव उनके निज सहायक का है,और यही भाजपा के भीतर सबसे बड़ी बेचैनी बन चुका है,राजनीतिक गलियारों में आरोप लगाए जा रहे हैं कि विधायक तक पहुंचने से पहले कार्यकर्ताओं को उनके दरबार से गुजरना पड़ता है, कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट डालना, संगठन के भीतर विरोधियों को निशाना बनाना, कार्यकर्ताओं से कठोर व्यवहार करना और खुद को सुपर पावर सेंटर की तरह प्रस्तुत करना अब आम बात हो गई है,भाजपा के पुराने कार्यकर्ता तंज कसते हुए कहते हैं कि अब राजनीति में जनता से ज्यादा महत्व मोबाइल और सोशल मीडिया का हो गया है,गांव का कार्यकर्ता घंटों इंतजार करता है, लेकिन फेसबुक पोस्ट पांच मिनट में पहुंच जाती है,यही कारण है कि भाजपा के भीतर अब यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि संगठन आखिर चला कौन रहा है—विधायक,कार्यकर्ता या सोशल मीडिया संचालित निज सचिव?
सोशल मीडिया की राजनीति ने संगठन को दो हिस्सों में बांटा
दो साल से सोशल मीडिया पर चल रही खींचतान अब सड़क और मंच तक पहुंच चुकी है, विधायक समर्थक और विरोधी गुटों के बीच पोस्ट,टिप्पणियां और कटाक्ष लगातार बढ़ते रहे,आरोप यह भी लगे कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल संगठन को मजबूत करने के बजाय विरोधियों को डराने और अपमानित करने में हो रहा है,राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि भाजपा के भीतर यह संघर्ष वैचारिक कम और एक्सेस पॉलिटिक्स ज्यादा बन चुका है,जो विधायक तक पहुंच रखता है,वही ताकतवर माना जाता है,बाकी कार्यकर्ता केवल पोस्टर लगाने और भीड़ जुटाने तक सीमित हो जाते हैं,यही कारण है कि कुशहा में मनोज साहू की शिकायत केवल व्यक्तिगत गुस्सा नहीं थी,वह उन कार्यकर्ताओं की सामूहिक नाराजगी थी जो खुद को धीरे-धीरे संगठन से कटता महसूस कर रहे हैं।
कारण बताओ नोटिस और बड़ा सवाल
घटना के बाद भाजपा जिलाध्यक्ष की ओर से मनोज साहू को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया,संगठन ने अनुशासन बनाए रखने का संकेत दिया,लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया, यदि मंच से शिकायत करना अनुशासनहीनता है,तो उन परिस्थितियों पर कार्रवाई कौन करेगा जिनकी वजह से शिकायत पैदा हुई? यदि कार्यकर्ताओं को उपेक्षित महसूस हो रहा है,यदि संगठन में संवाद खत्म हो रहा है, यदि सोशल मीडिया पर लगातार अपमानजनक माहौल बन रहा है,तो उसकी जिम्मेदारी तय कौन करेगा? राजनीतिक गलियारों में अब यही चर्चा है कि भाजपा समस्या उठाने वालों पर कार्रवाई करेगी या समस्या पैदा करने वालों पर भी नजर डालेगी।
मुख्यमंत्री का जवाब और राजनीति की भाषा
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का जवाब—हमने उन्हें बोल दिया है—अब पूरे क्षेत्र में राजनीतिक व्याख्याओं का विषय बन गया है, कुछ लोग इसे मुख्यमंत्री की सहज शैली मान रहे हैं,जबकि कुछ इसे अंदरूनी असंतोष को शांत करने का प्रयास बता रहे हैं,लेकिन राजनीति में शब्दों से ज्यादा महत्वपूर्ण वह माहौल होता है जिसमें शब्द बोले जाते हैं, कुशहा के मंच पर माहौल साफ बता रहा था कि भाजपा के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है,मुख्यमंत्री शायद कार्यक्रम को विवाद से बचाना चाहते थे, लेकिन जिस तरीके से शिकायत सार्वजनिक हुई, उसने यह संकेत जरूर दे दिया कि संगठन के भीतर संवाद की कमी अब गंभीर रूप ले रही है।
जनता की चुप्पी ने बढ़ाई भाजपा की चिंता
राजनीति में विरोध से ज्यादा खतरनाक मौन माना जाता है,कुशहा में यही मौन भाजपा की चिंता बढ़ा रहा है,जब विधायक की अनुपस्थिति और निष्कि्रयता की शिकायत हुई,तब जनता ने न विरोध किया, न समर्थन में शोर मचाया,लेकिन वहां मौजूद लोगों के चेहरे यह बता रहे थे कि शिकायत उन्हें अस्वाभाविक नहीं लगी,यही वह बिंदु है जहां मामला केवल संगठनात्मक नहीं रह जाता,बल्कि राजनीतिक जोखिम में बदल जाता है,क्योंकि जनता यदि शिकायत को सही मानने लगे,तो विपक्ष को मुद्दा खोजने की जरूरत नहीं पड़ती।
विपक्ष के हाथ लगा तैयार हथियार
भाजपा के इस अंदरूनी विवाद ने विपक्ष को बैठे-बिठाए बड़ा मुद्दा दे दिया है,विपक्ष अब तंज कस रहा है कि जब भाजपा के अपने कार्यकर्ता ही विधायक से परेशान हैं,तो आम जनता की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है,राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही,तो आने वाले चुनावों में भरतपुर-सोनहत सीट भाजपा के लिए चुनौती बन सकती है,क्षेत्र में यह चर्चा भी शुरू हो चुकी है कि वर्तमान परिस्थितियां पूर्व विधायक के लिए राजनीतिक जमीन तैयार कर रही हैं।
सुशासन तिहार से निकला सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश
कुशहा की घटना ने एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर दिया है क्या सुशासन केवल अधिकारियों की समीक्षा तक सीमित रहेगा,या जनता और कार्यकर्ताओं की राजनीतिक शिकायतें भी सुनी जाएंगी? यदि मुख्यमंत्री गांव-गांव जाकर विभागीय समीक्षा ले सकते हैं,तो क्या वे अपनी पार्टी के विधायकों की कार्यशैली पर कार्यकर्ताओं का फीडबैक नहीं सुन सकते? आखिर लोकतंत्र में सबसे पहले जनता और कार्यकर्ता ही राजनीतिक रिपोर्ट कार्ड तैयार करते हैं।
घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur