
- कोतवाली,सुपर कॉप और होटल कनेक्शन की अंदरूनी पटकथा चर्चा में…
- सारे जगह बंद होगा…हमारे यहां नहीं! — आखिर किसके दम पर इतना भरोसा?
- जुए से ज्यादा अब सेटिंग सिस्टम पर उठ रहे सवाल
- मनेन्द्रगढ़ में जुए का खेल या संरक्षण का महाखेल?
- कोतवाली की कुर्सी बदली…और शहर में फिर लौट आया कथित अवैध कारोबार!
- 112 से शुरू हुआ सफर…शहर के कथित नेटवर्क तक कैसे पहुंचा सुपर कॉप?
- कार्रवाई हुई या सिर्फ कहानी का ट्रेलर दिखाया गया?
- आईजी की सख्ती नहीं होती तो क्या दब जाता पूरा मामला?
- होटल,हार-जीत और संरक्षण…. सबसे चर्चित पटकथा!
- कमाऊ सिस्टम के आरोपों में घिरी कोतवाली पुलिस
- मनेन्द्रगढ़ बनेगा अवैध कारोबार का गढ़ या टूटेगा संरक्षण का जाल?
- कोतवाली की सेटिंग कथा में सुपर कॉप,होटल और संरक्षण की परतें चर्चा में…
-संवाददाता-
मनेन्द्रगढ़,14 मई 2026 (घटती-घटना)। मनेन्द्रगढ़ शहर इन दिनों किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं लग रहा,फर्क सिर्फ इतना है कि यहां पर्दे पर नहीं,असल जिंदगी में किरदार घूम रहे हैं,कोई सुपर कॉप बनकर व्यवस्था की नसों में घुसा बैठा है, कोई होटल की आड़ में कथित कारोबार का केंद्र बना हुआ है,कोई संरक्षण के दम पर सीना ठोक रहा है और कोई कार्रवाई करके भी सवालों के घेरे में है।
सबसे मजेदार बात यह है कि जितना जुआ पुलिस ने पकड़ा,उससे कहीं ज्यादा कहानी लोगों के हाथ लग गई,शहर की चाय दुकानों में इस वक्त आईपीएल से ज्यादा चर्चा अगर किसी चीज की है,तो वह है मनेन्द्रगढ़ महाजुआ कांड की अंदरूनी पटकथा की है, लोग पूछ रहे हैं अगर सब कुछ अचानक पकड़ा गया,तो फिर महीनों से शहर में चर्चा क्यों थी? अगर पुलिस अनजान थी,तो पत्रकारों और आम लोगों तक जानकारी कैसे पहुंच रही थी? और अगर जानकारी थी,तो फिर कार्रवाई इतनी देर से क्यों हुई? यानी सवाल इतने हैं कि जवाब देने वाला भी शायद अब जवाब ढूंढ रहा होगा।
मनेन्द्रगढ़ को अवैध कारोबार की राजधानी बनने से रोकना होगा…
आज सबसे बड़ा खतरा यही है कि अगर समय रहते सिस्टम में सुधार नहीं हुआ,तो मनेन्द्रगढ़ धीरे-धीरे अवैध कारोबारों का स्थायी केंद्र बन सकता है, जुआ…सट्टा…. कोयला…सेटिंग…संरक्षण…अगर यह सब एक ही छत के नीचे मिलने लगे,तो फिर कानून का डर खत्म होने में ज्यादा समय नहीं लगता।
सेटिंग है,कोई कार्रवाई नहीं होगी — आरोपी के कथित बयान ने बढ़ाई बेचैनी
सूत्रों के अनुसार पूछताछ में एक आरोपी ने कथित तौर पर कहा कि उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि पुलिस से सेटिंग है, कोई कार्रवाई नहीं होगी, जब एडिशनल एसपी ने पूछा कि किसने कहा…तो आरोपी ने लल्ला,अजीत और मोहन नाम लिए,अब यही तीन नाम जिले की सबसे बड़ी चर्चा बन चुके हैं, लोग पूछ रहे हैं,कौन हैं ये लोग? क्या ये केवल खिलाड़ी थे? या पूरे नेटवर्क के मैनेजर? और सबसे बड़ा सवाल है की क्या पुलिस अब इन तक पहुंचेगी?
मुख्य सरगना मोहन आखिर कैसे बच निकला?
पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि मुख्य सरगना बताया जा रहा व्यक्ति बच निकला,जबकि पुलिस के पास टाइमिंग भी थी, जानकारी भी थी और पूरी रणनीति भी, तो फिर सरगना कैसे निकल गया? क्या उसे पहले से सूचना मिल गई थी? या फिर कार्रवाई इतनी नियंत्रित रखी गई थी कि बड़े नाम बच जाएं? लोग अब कह रहे हैं कि यदि राजा ही भाग गया, तो सैनिक पकड़कर क्या मिला?
जब पत्रकारों को पता था,तो पुलिस को कैसे नहीं?
यही सवाल अब सबसे ज्यादा उठ रहा है,अगर शहर के पत्रकारों,आम नागरिकों और चाय दुकानों तक कथित गतिविधियों की चर्चा पहुंच चुकी थी, तो फिर पुलिस आखिर क्या कर रही थी? क्या वाकई जानकारी नहीं थी? या जानकारी होने के बावजूद आंखें बंद थीं? शहर के लोग अब तंज कस रहे हैं—कोतवाली के कैमरे शायद सिर्फ हेलमेट चेक करने के लिए चालू रहते होंगे।
आईजी ने पहले ही पहचान लिया था खेल?
सूत्र बताते हैं कि पूर्व सरगुजा रेंज के आईजी पहले ही संबंधित प्रधान आरक्षक की कार्यशैली को लेकर सतर्क थे, बताया जा रहा है कि उन्होंने उसकी पूरी कार्यप्रणाली की फाइल तैयार कर उसे जिले से बाहर भेजा था, लेकिन फिर बल की कमी का तर्क आया और साहब की वापसी हो गई, अब लोग व्यंग्य में कह रहे हैं—जिसे बाहर भेजा गया था सुधार गृह की तरह, वह अपग्रेड होकर वापस आ गया।
जो उसके करीब गया,वही बदनाम हुआ…
पुलिस विभाग के भीतर भी यह चर्चा है कि उक्त प्रधान आरक्षक की शैली ऐसी है कि वह धीरे-धीरे अधिकारियों को अपने प्रभाव में ले लेता है, पहले दोस्ती…फिर सलाह…फिर कमाई मॉडल…और आखिर में पूरा सिस्टम उसी की लाइन पर चलने लगता है,यही वजह है कि अब शहर में यह कहा जा रहा है की कोतवाली में पोस्टिंग भले प्रभारी की हो, लेकिन रिमोट किसी और के हाथ में है।
इतिहास की सबसे बड़ी कार्रवाई…या सबसे बड़ी अधूरी कहानी?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है की अगर पुलिस सचमुच पूरी नीयत से कार्रवाई करती, तो क्या यह जिले की सबसे बड़ी जुआ कार्रवाई बन सकती थी? लोगों का कहना है कि कथित नेटवर्क इतना बड़ा था कि उसकी सिर्फ सतह ही सामने आई है, कई नाम बच गए…कई चेहरे गायब रहे…और कई खिलाड़ी शायद पहले ही बाहर निकल गए,यानी कार्रवाई हुई जरूर,लेकिन सवाल यह है कि क्या पूरी हुई?
सरगुजा आईजी की सक्रियता बनी उम्मीद…
इस पूरे मामले में एक नाम ऐसा है,जिसे लेकर लोगों के बीच सकारात्मक चर्चा है वह नाम है आईजी दीपक झा,सूत्रों का कहना है कि लगातार निगरानी और दबाव की वजह से ही कार्रवाई आगे बढ़ पाई, लोगों का मानना है कि अगर उच्च स्तर से सख्ती नहीं होती,तो शायद मामला किसी फाइल में दबकर रह जाता।
अंतिम सवाल…. मनेन्द्रगढ़ शहर आज यही पूछ रहा है
क्या सचमुच जुआ खत्म होगा?
क्या संरक्षण पर कार्रवाई होगी?
क्या सिस्टम बदलेगा?
या फिर कुछ दिनों बाद नया होटल, नया ठिकाना और वही पुरानी पटकथा फिर शुरू होगी?
क्योंकि शहर अब समझ चुका है —यह सिर्फ जुए का मामला नहीं….यह उस सिस्टम की कहानी है, जहां कुछ लोग कानून से ज्यादा सेटिंग पर भरोसा करने लगे हैं।


अब सवाल सिर्फ कार्रवाई का नहीं,सफाई का है…
एमसीबी जिले में अब सिर्फ छापेमारी से काम नहीं चलेगा, जरूरत उस पूरे नेटवर्क को तोड़ने की है,जो कथित तौर पर पुलिस, कारोबार और संरक्षण की तिकड़ी पर खड़ा बताया जा रहा है,जब तक विवादित चेहरों को सिस्टम से अलग नहीं किया जाएगा,तब तक हर कार्रवाई के बाद यही सवाल उठेगा —पकड़ा कितना गया…और बचाया कितना गया?
विशेष नोट
यह समाचार विभिन्न सूत्रों, स्थानीय चर्चाओं और घटनाक्रमों से प्राप्त जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है,समाचार में उल्लिखित आरोपों एवं दावों की आधिकारिक पुष्टि शेष है, प्रस्तुत सामग्री का उद्देश्य जनचर्चा और घटनाक्रम को सामने लाना है।
पहला अध्याय…
जब कोतवाली में अंकुश नाम की चीज हुआ करती थी-सूत्र बताते हैं कि जब तक कोतवाली की कमान सुनील तिवारी के हाथ में थी,तब तक शहर में कथित जुआ कारोबार की हालत वैसी थी जैसे स्कूल में सख्त प्रिंसिपल के समय पिछली बेंच वाले छात्र की होती है,डर के साथ उपस्थिति,कहा जा रहा है कि जिस होटल में आज कथित तौर पर जुए का साम्राज्य फलता-फूलता दिखा, वहां तिवारी ने तीन-तीन बार दबिश दी थी,होटल संचालकों को साफ संदेश था—होटल चलाओ, होटल को कसीनो मत बनाओ। उस समय शहर में यह चर्चा थी कि कुछ लोग पुलिस सिस्टम के भीतर अपनी अलग दुकान खोलने की तैयारी कर रहे थे,लेकिन सुनील तिवारी उनकी राह में स्पीड ब्रेकर बने हुए थे।
सुपर कॉप की एंट्री : 112 से सीधे अंडरग्राउंड नेटवर्क
फिर कहानी में एंट्री होती है उस किरदार की, जिसे शहर के लोग अब व्यंग्य में सुपर कॉप कहकर बुला रहे हैं, सूत्रों की मानें तो उक्त प्रधान आरक्षक को 112 सेवा के लिए बुलाया गया था, लेकिन धीरे-धीरे उसकी सक्रियता ऐसी बढ़ी कि लोग कहने लगे —112 कम, 420 ज्यादा एक्टिव है। कहते हैं कि उसने शहर में अपने अलग संपर्क विकसित करने शुरू किए,कहीं होटल वालों से दोस्ती,कहीं अवैध कारोबारियों से तालमेल,कहीं पुलिस के भीतर पकड़ मजबूत करने का खेल, सब कुछ इतनी शांति से हुआ कि शहर को भनक तब लगी, जब कथित कारोबार फिर से पनपने लगा।
सुनील तिवारी क्यों दूरी बनाकर रखते थे?
सूत्रों के अनुसार सुनील तिवारी उस प्रधान आरक्षक की कार्यप्रणाली से पहले से परिचित थे,उन्हें अंदेशा था कि यदि उसे ज्यादा खुली छूट मिली, तो पूरा सिस्टम धीरे-धीरे कमाई मॉडल में बदल जाएगा, यही वजह बताई जा रही है कि उन्होंने उसे अपने करीब फटकने नहीं दिया, क्योंकि उन्हें मालूम था कीचड़ अगर जूते तक रहे तो धोया जा सकता है,लेकिन सिर तक पहुंच जाए तो आदमी पहचान में नहीं आता।
फिर बदला सिस्टम…और शुरू हुई नई पटकथा
कुछ समय बाद कोतवाली में बदलाव हुआ और दीपेश सैनी को जिम्मेदारी मिली, सूत्रों का दावा है कि यहीं से कथित रूप से बंद पड़े कारोबारों में फिर हलचल शुरू हुई,शहर में चर्चाएं शुरू हो गईं कि अब सेटिंग का नया अध्याय खुल चुका है,कहते हैं कि पर्दे के पीछे पूरा संचालन वही चर्चित प्रधान आरक्षक संभाल रहा था,कौन कहां बैठेगा…किसे संरक्षण मिलेगा…किससे कितना लेना है…और किसे कब बचाना है…सबका मैनेजमेंट शुरू हो गया,हालांकि बाद में दीपेश सैनी का तबादला हो गया,लेकिन तब तक कथित नेटवर्क जड़ें जमा चुका था।
साइबर प्रभारी को मिला कोतवाली का प्रभार…और शुरू हुआ कमाऊ पुत्र मॉडल
इसके बाद जिस निरीक्षक को कोतवाली का अतिरिक्त प्रभार मिला, वह पहले से साइबर शाखा देख रहे थे,अब यहां कहानी और दिलचस्प हो जाती है,सूत्रों के अनुसार सुपर कॉप ने उन्हें ऐसा गुरुमंत्र दिया कि धीरे-धीरे पूरा अवैध नेटवर्क फिर सक्रिय होने लगा,शहर में व्यंग्य चल पड़ा साइबर वाले साहब को ऑफलाइन कमाई का ऑनलाइन ट्रेनिंग मिल गया, कहा जा रहा है कि कथित तौर पर जुआ,सट्टा और अन्य अवैध कारोबारों को हरी झंडी इसी दौर में मिली।
नागपुर कनेक्शन : कोयला कारोबारी या नेटवर्क मैनेजर?
सूत्रों के अनुसार इस पूरी कहानी में एक नाम और चर्चा में है वह नाम नागपुर का कथित कोयला कारोबारी अंकित,लोगों का कहना है कि उसकी पहले से कुछ अधिकारियों के साथ मजबूत पकड़ थी और उसी पकड़ के दम पर शहर में कथित अवैध कारोबारों की नई नींव रखी गई,अब यह कितना सच है और कितना अफवाह,यह जांच का विषय है,लेकिन शहर में चर्चा इतनी तेज है कि लोग कहने लगे हैं मनेन्द्रगढ़ में कोयले से ज्यादा गर्मी अब सेटिंग से निकल रही है।
होटल बना मनोरंजन केंद्र?
शहर के बीच स्थित जिस होटल का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है,वहां कथित तौर पर पिता-पुत्र दोनों की भूमिका बताई जा रही है,सूत्रों के अनुसार पुत्र शहर के बीचोंबीच कथित जुआ संचालन देख रहा था, जबकि पिता किसी अन्य स्थान पर समान गतिविधियों से जुड़े बताए जा रहे हैं, सबसे हैरानी वाली बात वह कथित बयान है,जो अब शहर में वायरल चर्चा बन चुका है की सारे जगह जुआ बंद हो जाएगा, लेकिन हमारे यहां नहीं,अब सवाल यह है कि कोई इतनी छाती ठोककर यह बात आखिर किस भरोसे पर कह सकता है? क्या राजनीतिक संरक्षण? क्या पुलिस में मजबूत पकड़? या फिर दोनों?
घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur