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कोरिया@बड़े सालही में बेदखली बनाम पौधारोपण! ग्रामीणों की गुहार अनसुनी,वन विभाग की कार्रवाई जारी

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  • जनसुनवाई बिना वृक्षारोपण बड़े सालही में आदिवासियों ने उठाए सवाल
  • पुश्तैनी जमीन पर संकट,200 साल से बसे ग्रामीणों पर बेदखली का खतरा
  • वन विभाग की कार्रवाई से भड़का आक्रोश,बड़े सालही में ग्रामीणों का विरोध तेज
  • गुहार के बाद भी नहीं रुकी कार्रवाई,बड़े सालही में जबरन पौधारोपण का आरोप
  • पेड़ कटाई बनाम पौधारोपण…सरगुजा में वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल
  • कलेक्टर को आवेदन बेअसर? बड़े सालही में जारी बेदखली और पौधारोपण
  • ग्रामीणों ने सुनाई पीड़ा,अशोक जायसवाल ने दिया आश्वासन,बड़े सालही विवाद गरमाया
  • अधिकार बनाम वन विभाग,बड़े सालही में जमीन और अस्तित्व की लड़ाई


-राजन पाण्डेय-
कोरिया,29 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले के ग्राम बड़े सालही में इन दिनों एक ऐसा विवाद गहराता जा रहा है, जिसने प्रशासनिक कार्यप्रणाली, आदिवासी अधिकारों और वन विभाग की गतिविधियों पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर ग्रामीण अपने पुश्तैनी निवास और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वन विभाग द्वारा वृक्षारोपण के नाम पर जमीन खाली कराने की प्रक्रिया जारी है, ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने पहले ही जिला कलेक्टर को लिखित आवेदन देकर अपनी समस्याएं और आपत्तियां दर्ज कराई थीं, लेकिन उनकी इस गुहार को अब तक कोई ठोस राहत नहीं मिली, उल्टा, वन विभाग द्वारा बिना जनसुनवाई और बिना पुनर्वास के पौधारोपण की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है, जिससे गांव में आक्रोश और असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है।
अधिकारों और आजीविका पर खतरा
ग्रामीणों का कहना है कि यह मामला केवल जमीन का नहीं है, बल्कि उनके अस्तित्व और पहचान का है, उनकी आजीविका, रहन-सहन, संस्कृति और सामाजिक जीवन सब कुछ इसी जमीन से जुड़ा हुआ है, यदि उन्हें यहां से हटाया जाता है, तो वे न केवल अपने घर से वंचित होंगे, बल्कि अपनी परंपराओं और जीवन शैली से भी दूर हो जाएंगे, ऐसे में वे इस कार्रवाई को अपने मूल अधिकारों के खिलाफ मानते हैं और इसे रोकने की मांग कर रहे हैं।
प्रशासन और वन विभाग पर बढ़ता दबाव
जैसे-जैसे यह मामला सामने आ रहा है, प्रशासन और वन विभाग पर दबाव बढ़ता जा रहा है, स्थानीय लोग और ग्रामीण लगातार मांग कर रहे हैं कि तत्काल इस कार्रवाई को रोका जाए, पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, पुनर्वास की स्पष्ट और ठोस व्यवस्था की जाए।
200 वर्षों से निवास का दावा,
अचानक बेदखली का दबाव

बड़े सालही के ग्रामीणों का दावा है कि वे पिछले लगभग 200 वर्षों से इस क्षेत्र में निवास कर रहे हैं, गांव में करीब 300 परिवार रहते हैं, जिनकी कुल आबादी लगभग 1000 के आसपास बताई जा रही है,यह क्षेत्र अनुसूचित जनजाति बहुल है और संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जहां आदिवासी समुदायों के हितों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं,ग्रामीणों का आरोप है कि इन संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी करते हुए वन विभाग द्वारा उन्हें बेदखल करने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। उनका कहना है कि बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था या पुनर्वास के इस तरह की कार्रवाई उनके जीवन, आजीविका और सांस्कृतिक अस्तित्व के लिए खतरा बन सकती है।
कांग्रेस नेता अशोक जायसवाल का दौरा,ग्रामीणों ने घेरकर बताई पीड़ा
मामले की गंभीरता को देखते हुए कांग्रेस नेता अशोक जायसवाल बड़े सालही गांव पहुंचे,उनके पहुंचते ही बड़ी संख्या में ग्रामीण उनके आसपास इकट्ठा हो गए और अपनी समस्याएं बताने लगे,ग्रामीणों ने उन्हें बताया कि वे पीढि़यों से इस जमीन पर रह रहे हैं और यदि उन्हें इस तरह हटाया गया,तो उनका सब कुछ खत्म हो जाएगा,उन्होंने यह भी बताया कि बिना पुनर्वास के बेदखली उनके लिए किसी आपदा से कम नहीं होगी, अशोक जायसवाल ने ग्रामीणों की समस्याओं को ध्यानपूर्वक सुना और उन्हें आश्वासन दिया कि वे इस मामले को कलेक्टर कोरिया के सामने उठाएंगे और समाधान निकालने की कोशिश करेंगे।
वृक्षारोपण के नाम पर जबरन कार्रवाई का आरोप
ग्रामीणों ने वन विभाग पर यह आरोप लगाया है कि व्यावसायिक वृक्षारोपण के नाम पर उनकी जमीन खाली कराई जा रही है, उनका कहना है कि पहले उन्हें नोटिस देकर चेतावनी दी गई और अब बिना उनकी सहमति के सीधे जमीन पर पौधारोपण का कार्य शुरू कर दिया गया है, ग्रामीणों के अनुसार, यह पूरी प्रक्रिया न तो पारदर्शी है और न ही कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप दिखाई देती है, उन्हें न तो समुचित जानकारी दी गई और न ही किसी प्रकार की जनसुनवाई आयोजित की गई, जिससे यह कार्रवाई एकतरफा और जबरन प्रतीत होती है।
पेड़ कटाई और पौधारोपण के विरोधाभास पर उठे सवाल
इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है,जिस पर ग्रामीणों और स्थानीय लोगों ने सवाल उठाए हैं,एक ओर सरगुजा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की खबरें सामने आती रही हैं,वहीं दूसरी ओर बड़े सालही में जबरन पौधारोपण किया जा रहा है,ग्रामीणों का कहना है कि यह विरोधाभास समझ से परे है,जहां पर्यावरण संरक्षण के नाम पर पौधे लगाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी जगहों पर पेड़ों की कटाई जारी है। इससे वन विभाग की नीतियों और कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
ग्रामीणों की गुहार पर प्रशासन की चुप्पी
ग्रामीणों ने अपनी समस्याओं को लेकर जिला कलेक्टर को आवेदन दिया था,जिसमें उन्होंने पुनर्वास प्रक्रिया पूरी किए बिना किसी भी प्रकार की बेदखली और वृक्षारोपण की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की थी,लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी इस मांग को गंभीरता से नहीं लिया गया, आवेदन देने के बावजूद न तो कोई ठोस कार्रवाई हुई और न ही किसी प्रकार की जांच या संवाद की पहल की गई,इस चुप्पी ने ग्रामीणों के मन में प्रशासन के प्रति अविश्वास की भावना को और बढ़ा दिया है।
टकराव की स्थिति बनने की आशंका
लगातार अनदेखी और जबरन कार्रवाई के कारण गांव में आक्रोश बढ़ता जा रहा है,यदि समय रहते इस मामले का समाधान नहीं निकाला गया,तो यह विवाद और बढ़ सकता है और प्रशासन तथा ग्रामीणों के बीच टकराव की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है,स्थिति को देखते हुए यह जरूरी हो जाता है कि प्रशासन संवाद का रास्ता अपनाए और सभी पक्षों को साथ लेकर समाधान निकाले।
विकास बनाम अधिकार का संघर्ष
बड़े सालही का यह मामला अब केवल वृक्षारोपण या बेदखली तक सीमित नहीं रह गया है,बल्कि यह विकास और अधिकारों के बीच संतुलन का बड़ा प्रश्न बन गया है,एक ओर पर्यावरण संरक्षण और वन विकास की योजनाएं हैं,वहीं दूसरी ओर उन योजनाओं के कारण प्रभावित होने वाले लोगों के अधिकार और जीवन से जुड़े सवाल हैं,यदि इन दोनों के बीच संतुलन नहीं बनाया गया,तो इस तरह के विवाद आगे भी सामने आते रहेंगे,अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस संवेदनशील मुद्दे को किस तरह सुलझाता है और क्या ग्रामीणों को न्याय मिल पाता है या नहीं।


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