



- कदना में धंसी दीवार और टूटा गेट—किसानों का सवाल,
- ‘सुशासन में कब मिलेगा पानी?
- कदना जलाशय बना भ्रष्टाचार की मिसाल….
- गेट टूटा, दीवार धंसी,किसानों को पानी का इंतजार
- भ्रष्टाचार की नहरें,सूखे की आहट,कदना जलाशय
- की बदहाली से 400 हेक्टेयर जमीन संकट में
- एक साल से टूटा गेट,धंसी दीवार—कब
- जागेगा जल संसाधन विभाग?
- सुशासन के दावे पर सवाल,कदना में बर्बाद जलाशय,परेशान किसान
- नहरें बनीं मलबा,जलाशय बेकार,विभागकी चुप्पी से किसानों में आक्रोश
- कागजों में मरम्मत,जमीन पर बर्बादी,कदना
- जलाशय पर उठे भ्रष्टाचार के सवाल
- पानी बहने से पहले फूटा गुस्सा,कदना के
- किसान आंदोलन की तैयारी में
- ध्वस्त सिंचाई तंत्र गेट पोल जंग खा रहा,किसान बूंद-बूंद को मोहताज
-राजन पाण्डेय-
कोरिया/सोनहत,29 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)। जिले में जल संसाधन विभाग इन दिनों अपने काम से कम और ‘निराला सिस्टम’ से ज्यादा चर्चा में है, सिस्टम ऐसा कि नाम भी निराला, काम भी निराला और नतीजा इतना निराला कि नहरें कागज पर बनती हैं, जमीन पर टूटती हैं और पानी किसानों तक पहुंचने से पहले ही भ्रष्टाचार में बह जाता है, ऊपर से नीचे तक जिम्मेदारों की एक ऐसी चेन दिखाई देती है, जहां जवाबदेही गायब और सुविधा-शुल्क का प्रवाह स्थायी बताया जा रहा है। बता दे की कोरिया जिले के सोनहत विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत चन्दहा के कदना गांव में स्थित बंधापाठ जलाशय इन दिनों बदहाली,लापरवाही और कथित भ्रष्टाचार की कहानी बयां कर रहा है। कभी सैकड़ों किसानों की जीवनरेखा रहा यह जलाशय आज खंडहर में तब्दील होता नजर आ रहा है। जल संसाधन विभाग की अनदेखी के कारण यहां का वेस्ट वियर (अतिप्रवाह निकास) का गेट पोल टूटकर गिर चुका है और दीवार धंस गई है। चिंताजनक बात यह है कि इस गंभीर स्थिति को एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन विभाग अब तक मरम्मत के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा पाया है।
जिम्मेदार अधिकारी का नाम भी ‘निराला’ है और कार्यप्रणाली भी उतनी ही निराली
कोरिया जिले के बैकुण्ठपुर क्षेत्र में जल संसाधन विभाग इन दिनों अपने कामकाज को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में है, विभाग में कथित तौर पर ‘निराला सिस्टम’ चलने की चर्चा जोर पकड़ रही है, जहां जिम्मेदार अधिकारी का नाम भी ‘निराला’ है और कार्यप्रणाली भी उतनी ही निराली नजर आ रही है, लंबे समय से एक ही क्षेत्र में पदस्थ अधिकारी पर आरोप है कि वे अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ते हुए ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने में अधिक रुचि ले रहे हैं, नहर निर्माण और जलाशयों के रखरखाव के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च दिखाए जा रहे हैं,लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है, बताया जा रहा है कि बैकुण्ठपुर क्षेत्र में 10 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जलाशयों और नहरों के निर्माण एवं मरम्मत कार्यों पर खर्च की जा चुकी है, इसके बावजूद नहरों की हालत बदतर बनी हुई है,कई जगहों पर नहरें टूट चुकी हैं,कहीं कंक्रीट बह गया है तो कहीं निर्माण कार्य अधूरा पड़ा है, ग्रामीणों का कहना है कि नहरों का निर्माण कागजों में पूरा दिखा दिया जाता है,जबकि वास्तविकता में गुणवत्ता का अभाव साफ नजर आता है,हालात ऐसे हैं कि पानी खेतों तक पहुंचने के बजाय बीच रास्ते में ही बह जाता है, जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है, स्थानीय लोगों और किसानों के बीच यह चर्चा आम हो गई है कि विभागीय कार्यों में पारदर्शिता का अभाव है और निर्माण कार्यों में गंभीर अनियमितताएं हो रही हैं, ‘निराला सिस्टम’ अब एक प्रतीक बन चुका है—ऐसी व्यवस्था का, जहां जवाबदेही कम और लापरवाही ज्यादा दिखाई देती है, सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इतने बड़े बजट के बावजूद न तो नहरें टिक पा रही हैं और न ही जलाशयों की स्थिति सुधर रही है, कुल मिलाकर,जल संसाधन विभाग की कार्यशैली ने क्षेत्र में असंतोष का माहौल बना दिया है,यदि समय रहते इन आरोपों की निष्पक्ष जांच नहीं हुई और जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं की गई, तो यह ‘निराला सिस्टम’ किसानों के लिए और भी भारी पड़ सकता है।
नहरें भी बनीं भ्रष्टाचार की मिसाल
स्थानीय किसानों और जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि जलाशय से जुड़ी नहरों की हालत भी बेहद खराब है, मरम्मत के नाम पर हर साल लाखों रुपए खर्च किए जाते हैं,लेकिन धरातल पर नतीजा शून्य नजर आता है। कई स्थानों पर नहरें पूरी तरह टूट चुकी हैं, तो कहीं कंक्रीट की संरचना हवा में लटकती दिखाई दे रही है, नहरों के नीचे की जमीन गहरे खड्डों में तब्दील हो चुकी है, जिससे यह पूरा सिस्टम किसी भी समय पूरी तरह ध्वस्त हो सकता है,कोरिया जन सहयोग समिति के अध्यक्ष पुष्पेंद्र राजवाड़े ने विभाग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि ‘यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सीधा-सीधा भ्रष्टाचार है, घटिया निर्माण और मरम्मत कार्यों के कारण आज पूरी सिंचाई व्यवस्था चरमरा गई है। ‘
गेज बांध और अन्य जलाशयों का भी यही हाल- यह समस्या केवल कदना जलाशय तक सीमित नहीं है,सोनहत क्षेत्र में स्थित गेज बांध,तन्जरा जलाशय और नाटवाही जलाशय की स्थिति भी लगभग ऐसी ही बताई जा रही है, हाल ही में गेज बांध की बदहाली भी चर्चा में रही, जिससे यह साफ होता है कि जल संसाधन विभाग पूरे जिले में अपने दायित्वों के निर्वहन में विफल साबित हो रहा है, पंच संघ के अध्यक्ष प्रेम सागर तिवारी का कहना है कि ‘हर साल मरम्मत के नाम पर खानापूर्ति होती है और किसानों को सिर्फ धोखा मिलता है। जिले के सभी जलाशयों और नहरों के कार्यों की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए। ‘
एसी कमरों में अधिकारी,धूप में जूझता किसान- ग्रामीणों में इस बात को लेकर खासा आक्रोश है कि विभागीय अधिकारी मौके पर आकर स्थिति का जायजा लेने तक की जरूरत नहीं समझ रहे, उनका आरोप है कि अधिकारी केवल दफ्तरों तक सीमित हैं, जबकि किसान अपनी आजीविका के लिए संघर्ष कर रहा है, पिछले वर्ष भी इस समस्या को उठाया गया था, लेकिन विभाग के स्तर पर कोई ठोस पहल नहीं हुई, परिणामस्वरूप स्थिति और बदतर हो गई है।
एसडीओ पर सवाल—‘चेंबर मोह’ में फंसा विभाग?–स्थानीय लोगों ने जल संसाधन विभाग के एसडीओ निराला की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए हैं, उनका कहना है कि वर्षों से गेट पोल जमीन पर पड़ा जंग खा रहा है, लेकिन अधिकारी ने इसकी सुध लेने की जहमत तक नहीं उठाई, ग्रामीणों के अनुसार, यह केवल एक तकनीकी समस्या नहीं,बल्कि विभागीय उदासीनता और जवाबदेही की कमी का उदाहरण है, इससे न केवल सरकारी संपत्ति को नुकसान हो रहा है,बल्कि किसानों का भरोसा भी टूट रहा है।
जनप्रतिनिधियों और किसानों की चेतावनी
पुष्पेंद्र राजवाड़े ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि एक माह के भीतर जलाशय और नहरों की मरम्मत का कार्य शुरू नहीं हुआ,तो किसान उग्र आंदोलन करने को मजबूर होंगे। उन्होंने कलेक्टर को ज्ञापन सौंपने की भी बात कही है, वहीं, युवा किसान कुलदीप कुमार ने कहा कि यदि जल्द सुधार नहीं हुआ,तो इस साल खेती करना मुश्किल हो जाएगा,पंच संघ अध्यक्ष प्रेम सागर तिवारी ने जिले के सभी जलाशयों और नहरों के मरम्मत कार्यों की जांच की मांग की है,जबकि जिला कांग्रेस कमेटी के महामंत्री अनित दुबे ने भी इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग की है।
उठते बड़े सवाल…
एक साल से टूटी संरचनाओं पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं?
मरम्मत कार्यों में गुणवत्ता की जांच कौन करेगा?
किसानों की आजीविका के साथ हो रहे इस खिलवाड़ का जिम्मेदार कौन?
क्या ‘सुशासन’ के दावे केवल कागजों तक सीमित हैं?
जवाबदेही तय हो,तभी बचेगी खेती
कदना जलाशय की यह स्थिति केवल एक गांव या क्षेत्र की समस्या नहीं है,बल्कि पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करती है,यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर न केवल किसानों की आजीविका पर पड़ेगा, बल्कि क्षेत्र की कृषि व्यवस्था भी गंभीर संकट में आ जाएगी,अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस चेतावनी को गंभीरता से लेता है या फिर किसान आंदोलन के रास्ते पर उतरने को मजबूर होते हैं।
एक साल से टूटा गेट,धंसी दीवार—फिर भी मौन विभाग
जलाशय के वेस्ट वियर का गेट पोल पिछले एक वर्ष से टूटा हुआ है और दीवार भी कई जगहों से धंस चुकी है, हैरानी की बात यह है कि इतने लंबे समय से यह स्थिति जस की तस बनी हुई है, लेकिन जल संसाधन विभाग की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई, आने वाले मानसून के मद्देनजर यह स्थिति और भी गंभीर हो गई है, क्योंकि यदि समय रहते मरम्मत नहीं हुई तो बारिश का पानी जलाशय में ठहरने के बजाय सीधे बह जाएगा,इसका सीधा असर कदना और नावाटोला के सैकड़ों किसानों पर पड़ेगा,जिनकी खेती पूरी तरह इस जलाशय पर निर्भर है।
मानसून से पहले बढ़ी किसानों की चिंता
मानसून आने में अब ज्यादा समय नहीं बचा है,और ऐसे में कदना जलाशय की वर्तमान स्थिति किसानों के लिए चिंता का बड़ा कारण बन गई है,यदि समय रहते गेट और दीवार की मरम्मत नहीं होती, तो बारिश का पानी जलाशय में ठहरने के बजाय सीधे बह जाएगा, इससे न केवल जलाशय की उपयोगिता खत्म हो जाएगी, बल्कि कदना, नावाटोला और आसपास के गांवों के लगभग 200 किसानों की सिंचाई व्यवस्था पूरी तरह ठप हो सकती है। करीब 400 हेक्टेयर कृषि भूमि सूखे की चपेट में आ सकती है।
400 हेक्टेयर सिंचाई पर संकट,200 किसान प्रभावित
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार,इस जलाशय से करीब 200 किसान लाभान्वित होते थे और लगभग 400 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती थी, लेकिन वर्तमान स्थिति में यह पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है,कोरिया जन सहयोग समिति के अध्यक्ष पुष्पेंद्र राजवाड़े ने आरोप लगाया कि नहरों की मरम्मत के नाम पर सिर्फ औपचारिकता निभाई गई है, उन्होंने कहा कि नई बनी नहरें भी कुछ ही समय में टूटने लगी हैं, जो स्पष्ट रूप से घटिया निर्माण और भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती हैं।
नहरों की हालत—जमीन में धंसी,हवा में लटकी संरचना
स्थानीय स्तर पर उपलब्ध तस्वीरें इस पूरे मामले की भयावहता को उजागर करती हैं, कंक्रीट की मजबूत मानी जाने वाली नहरें अब कई जगहों पर हवा में लटक रही हैं, जबकि नीचे की जमीन गहरे खड्डों में तब्दील हो चुकी है। भारी-भरकम कंक्रीट के टुकड़े मलबे की तरह बिखरे पड़े हैं, यह दृश्य किसी प्राकृतिक आपदा का नहीं, बल्कि लापरवाही और भ्रष्टाचार का परिणाम प्रतीत होता है, ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल निर्माण में खामियों का मामला नहीं, बल्कि ‘अपराधिक लापरवाही’ है।
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