नई दिल्ली,29 अप्रैल 2026। केरलम के सबरीमाला मंदिर सहित अन्य धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई। कोर्ट ने एडवोकेट इंदिरा जयसिंह की दलीलों के जवाब में कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता। एडवोकेट जयसिंह ने सुनवाई के 10वें दिन कहा कि सबरीमाला मंदिर में एंट्री का फैसला अब भी लागू है। इस पर स्टे नहीं है लेकिन मंदिर में प्रवेश नहीं मिल रहा है। जयसिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट इसकी रिव्यू पिटिशन पर सुनवाई कर रहा है। हालांकि,कोर्ट कभी यह तय नहीं करता कि धर्म में क्या जरूरी है या और क्या नहीं। इसका फैसला तो धर्म ही करता है। इस पर जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि हम इस भूमि के सभ्यता के विकास और धार्मिक इतिहास को नजरअंदाज नहीं कर सकते। इसी बैकग्राउंड से संविधान के आर्टकिल 25 और 26 आए हैं। संविधान और बाकी सब ठीक है लेकिन हमें इतिहास नहीं भूलना चाहिए। आप अतीत को नजरअंदाज करके यह नहीं कह सकते कि यह एक कोरी स्लेट है। इस पर जयसिंह ने कहा कि इस पर डिबेट हो सकती है। यह क्लीन स्लेट है। सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई थी। इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है,इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
कोर्ट बोला…हम धार्मिक इतिहास को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं : जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि हम इस भूमि के सभ्यता के विकास और धार्मिक इतिहास को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। आखिर इसी बैकग्राउंड से संविधान के आर्टकिल 25 और 26 आए हैं। संविधान और बाकी सब ठीक है लेकिन हमें इतिहास नहीं भूलना चाहिए। इतिहास ही वर्तमान का निर्माण करता है। आप अतीत को नजरअंदाज करके यह नहीं कह सकते कि यह एक कोरी स्लेट है। इस पर जयसिंह ने कहा कि इस पर डिबेट हो सकती है। यह क्लीन स्लेट है।
क्या हम इस मुद्दे पर लुका-छिपी क्यों खेल रहे हैं? इंदिरा जयसिंह ने कहा कि अनुच्छेद 25(2) को अनुच्छेद 26(बी) से ऊपर मानने के सुझाव सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ। हालांकि, ऐसे तर्क के पीछे के कारण नहीं बताए गए। साथ ही, यदि हम इस बात से सहमत हैं कि अनुच्छेद 25(2), अनुच्छेद 25(1) को नियंत्रित करता है तो एक महिला होने के नाते मुझे मंदिर में प्रवेश करने से क्या रोकता है? हम इस मुद्दे के दायरे को लेकर लुका-छिपी क्यों खेल रहे हैं?
निर्णय एक अलग मुद्दा है लेकिन मेरे लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि धर्म का अधिकार वास्तव में क्या है और उस अधिकार का सार क्या है। संवैधानिक अधिकार क्या हैं।
क्या आर्टिकल 26, आर्टिकल 14, 19 को बेअसर कर सकता है : जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि देखिए देवरू मामले में यह तर्कसंगत है कि किसी धर्म की मौलिक धार्मिक पहचान तो कमजोर नहीं हो रही है। साथ ही अनुच्छेद 19, 21 या 14 के तहत अधिकारों का दावा भी किया गया है। इसीलिए कोर्ट को देखना होगा कि क्या अनुच्छेद 26 का प्रभाव ऐसा है कि यह अनुच्छेद 14, 19 या 21 को पूरी तरह से निष्प्रभावी कर देता है।
क्या उत्तर भारत का कोई व्यक्ति एंट्री की कोशिश कर रहा है?
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि हमें यह देखना होगा कि प्रवेश की मांग कौन कर रहा है? उत्तर भारत का कोई व्यक्ति दक्षिण के मंदिर में प्रवेश का दावा कैसे कर सकता है। क्या वे वाकई श्रद्धालु हैं? हमें यह भी देखना होगा।
यह केस धर्मांतरण विरोधी कानून समेत दूसरे मामलों को प्रभावित करेगा
जयसिंह ने कहा कि यह मुकदमा बेहद अहम है, जिसका उद्देश्य कुछ ऐसा हासिल करना है जो सीधे तौर पर हासिल नहीं किया जा सकता। इस मामले में आप जो भी कहेंगे, उसका असर न केवल आपके समक्ष लंबित मामलों पर पड़ेगा, बल्कि उन पर भी पड़ेगा जो आपके समक्ष नहीं हैं. धर्मांतरण विरोधी कानून इस समय लंबित है। और भी कई ऐसे मुद्दे हैं जिनका आप अनुमान नहीं लगा सकते। इसीलिए मैं सचेत कर रही हूं।
सुप्रीम कोर्ट बोला- अनुसूचित जाति के कारण प्रवेश से मना नहीं किया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपको अनुसूचित जाति की महिला होने के कारण मंदिर में प्रवेश से नहीं रोका गया है। बल्कि इसकी वजह आपका 10 से 50 साल की महिला होना है।
क्या अनुसूचित जाति की महिला से छुआछूत का मामला है
इंदिरा जयसिंह ने कहा कि मैं जि दो महिलाओं का प्रतिनिधित्व कर रही हूं। इनमें से एक अनुसूचित जाति की महिला है। इसलिए मैं यह प्रश्न पूछना चाहती हूं कि जब आप एक अनुसूचित जाति की महिला को मंदिर में प्रवेश करने से रोकते हैं, तो क्या आप अनुच्छेद 17 का उल्लंघन कर रहे हैं या नहीं? वह हिंदू हैं और अनुसूचित जाति की महिला है। क्या छुआछूत का उन्मूलन केवल पुरुषों के लिए है या इसमें सभी व्यक्ति शामिल हैं? आज हमें बताया जा रहा है कि गैर-जातीय हिंदू सबरीमाला में प्रवेश कर सकते हैं, लेकिन महिलाएं नहीं। सभी पुरुष बिना किसी जातिगत प्रतिबंध के प्रवेश कर सकते हैं। क्यों? अनुच्छेद 17 के कारण। इसीलिए वे प्रवेश कर सकते हैं।
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