- मार्च क्लोजिंग में ‘बजट मैनेजमेंट’? नए रेंजरों को रोके रखने पर उठे सवाल
- प्रभार रुका,बजट दौड़ा ! वन विभाग में वित्तीय खेल की चर्चा तेज
- आदेश जारी, कुर्सी खाली…आखिर रेंजरों को चार्ज क्यों नहीं?
- कोरिया-एमसीबी में प्रभार रोका गया या रोका गया है? बजट पर बड़ा सवाल

राजन पाण्डेय
बैकुंठपुर/मनेन्द्रगढ़,28 मार्च 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ शासन द्वारा वन विभाग में बड़े पैमाने पर रेंजरों की नई पदस्थापना के आदेश जारी हुए दो सप्ताह से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन कोरिया और मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी) जिले में अब तक नए रेंजरों को प्रभार नहीं सौंपा गया है, यह देरी अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि विभागीय कार्यप्रणाली और संभावित वित्तीय गतिविधियों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है, सूत्रों के अनुसार, इस देरी के पीछे सबसे बड़ा कारण वित्तीय वर्ष की समाप्ति यानी ‘मार्च क्लोजिंग’ से जुड़ा भारी-भरकम बजट बताया जा रहा है,चर्चा है कि वर्तमान में पदस्थ अधिकारी और रेंजर पुराने बिलों और निर्माण कार्यों के भुगतान को जल्दबाजी में निपटाने में जुटे हुए हैं, ताकि नए अधिकारियों के आने से पहले सभी वित्तीय प्रक्रियाएं पूरी कर ली जाएं।
मार्च क्लोजिंग और ‘बजट’
की बंदरबांट का अंदेशा
सूत्रों की मानें तो नए रेंजरों को चार्ज न सौंपने के पीछे मुख्य कारण ‘मार्च क्लोजिंग’ का भारी-भरकम बजट बताया जा रहा है, वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर करोड़ों रुपये के बजट को ठिकाने लगाने की होड़ मची है,चर्चा है कि वर्तमान रेंजर और संबंधित अधिकारी पुराने बजट और लंबित बिलों के भुगतान को आनन-फानन में निपटाना चाहते हैं, ताकि नए अधिकारी के आने से पहले वित्तीय बंदरबांट में कोई अड़चन न आए।
गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यानः निर्माण कार्यों में अचानक आई ‘तेजी’
सबसे चौंकाने वाला मामला गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान से सामने आ रहा है, जहाँ निर्माण कार्यों की रफ्तार अचानक कई गुना बढ़ा दी गई है, स्थानीय जानकारों का कहना है कि गुणवत्ता को ताक पर रखकर दिन-रात निर्माण कार्य कराए जा रहे हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा बजट खर्च दिखाया जा सके। वन विभाग पहले भी घटिया निर्माण कार्यों और गुणवत्ता की अनदेखी को लेकर सुर्खियों में रहा है,ऐसे में आनन-फानन में कराए जा रहे ये कार्य संदेह के घेरे में हैं।
क्या बजट खत्म होने के बाद ही
मिलेगा नए रेंजरो को प्रभार ?-
शासन के स्थानांतरण आदेश और धरातल पर प्रभार के बीच की 15 दिनों की यह ‘खामोशी’ महज संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति की ओर इशारा कर रही है,वन विभाग के गलियारों में चर्चा आम है कि जब तक वित्तीय वर्ष 2025-26 का ‘बजट कोटा’ पूरी तरह ठिकाने नहीं लग जाता, तब तक नए रेंजरों को कुर्सियां नसीब नहीं होंगी।
विश्लेषण के मुख्य बिंदु
‘पुराने हाथ’ और ‘पुराने बिल’ः वर्तमान में पदस्थ रेंजरों और बाबूओं की जुगलबंदी पुराने निर्माण कार्यों और पेंडिंग बिलों को क्लियर करने में जुटी है,नया अधिकारी आने पर वह पुराने कार्यों की गुणवत्ता और बिलों की सत्यता पर सवाल उठा सकता है, जिससे बचने का सबसे आसान तरीका ‘प्रभार में देरी’ है।
बजट सरेंडर का डर
सरकारी प्रक्रिया में मार्च के अंत तक आवंटित बजट खर्च करना अनिवार्य होता है, अन्यथा वह लैप्स हो जाता है, इसी ‘लैप्स’ होने के डर को ढाल बनाकर बिना किसी ठोस मॉनिटरिंग के करोड़ों रुपये के भुगतान की फाइलें दौड़ाई जा रही हैं।
1 अप्रैल का इंतज़ार
जानकारों का मानना है कि जैसे ही 31 मार्च की आधी रात को वित्तीय वर्ष समाप्त होगा और ‘खजाना’ कागजों में खाली हो जाएगा,वैसे ही 1 अप्रैल से नवीन रेंजरों को चार्ज देने की प्रक्रिया में ‘अचानक’ तेजी आ जाएगी,यानी नए अधिकारियों को काम करने के लिए नया बजट तो मिलेगा, लेकिन पुराने कार्यों की जवाबदेही से वे बच जाएंगे।कड़वा सच-यदि प्रभार देने में इसी तरह की देहोतीरी होती रही, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि विभाग के लिए प्रशासनिक व्यवस्था से कहीं ज्यादा जरूरी ‘बजट का प्रबंधन’ है।
प्रशासनिक आदेशों की अवहेलना
राज्य शासन द्वारा नवीन रेंजरों की पदस्थापना का आदेश जारी हुए 15 दिन से अधिक हो चुके हैं, नियमानुसार, आदेश के तत्काल बाद प्रभार का आदान-प्रदान हो जाना चाहिए था, लेकिन कोरिया और एम सी बी जिले में प्रभार न मिलना न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाता है, बल्कि विभाग की कार्यप्रणाली को भी संदिग्ध बनाता है।
प्रमुख सवाल जो खड़े हो रहे हैं
– आखिर शासन के आदेश के बाद भी रेंजरों को प्रभार देने में देरी क्यों हो रही है?
– क्या बजट खपाने के लालच में नए अधिकारियों को फील्ड से दूर रखा जा रहा है?
– गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान में हो रहे निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की जांच कौन करेगा?
बजट ज्यादा महत्वपूर्ण या व्यवस्था?
कोरिया और एमसीबी में रेंजरों को प्रभार न मिलने की यह स्थिति केवल प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि एक बड़े सवाल की ओर इशारा करती है क्या विभाग के लिए प्रशासनिक व्यवस्था से ज्यादा महत्वपूर्ण ‘बजट प्रबंधन’ हो गया है? यदि 31 मार्च के बाद ही प्रभार सौंपा जाता है, तो यह संदेह और गहरा जाएगा कि पूरा खेल केवल वित्तीय वर्ष के अंत से जुड़ा हुआ था, अब नजर इस बात पर है कि शासन इस पूरे मामले को कैसे देखता है और क्या समय रहते पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं।
सोनहत कार्यालय निर्माण में घटिया
सामग्री का खेलः पुष्पेंद्र राजवाड़े-
कोरिया जन सहयोग समिति के अध्यक्ष पुष्पेंद्र राजवाड़े ने विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाते हुए मामले को गरमा दिया है, राजवाड़े का कहना है कि पार्क परिक्षेत्र सोनहत में निर्माणाधीन कार्यालय भवन में खुलेआम अनियमितता बरती जा रही है।
क्या है प्रमुख आरोप
घटिया निर्माण सामग्री- भवन निर्माण में मानक स्तर की सामग्री के बजाय दोयम दर्जे की ईंट और सीमेंट का उपयोग किया जा रहा है।
मार्च क्लोजिंग की जल्दबाजी
आरोप है कि मार्च क्लोजिंग के दबाव में बजट खपाने के लिए गुणवत्ता को ताक पर रखकर ‘आनन-फानन’ में काम निपटाया जा रहा है।
निगरानी का अभाव
नए रेंजरों को प्रभार न मिलने का फायदा उठाकर पुराने रक्षक और ठेकेदार आपसी मिलीभगत से इस खेल को अंजाम दे रहे हैं।
आग की लपटों में खाक होते जंगल,
पर विभाग को ‘बजट’ की ज्यादा फिक्र!
एक तरफ मार्च के बजट को ‘ठिकाने’ लगाने के लिए निर्माण कार्यों में दिन-रात एक किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर कोरिया और एमसीबी के अलावा टाइगर रिजर्व के जंगलों में भड़की आग वन्यजीवों और वन संपदा को लील रही है,विडंबना देखिए कि विभाग का पूरा अमला इस वक्त ‘फाइलों के प्रबंधन’ और ‘बजट खपाने’ में व्यस्त है, जबकि मैदानी स्तर पर वनाग्नि रोकने के पुख्ता इंतजाम नदारद दिख रहे हैं।
जल्द होगा आंदोलन
‘हम इस भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करेंगे, यदि निर्माण कार्यों की उच्च स्तरीय जांच कर दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई और गुणवत्ता नहीं सुधारी गई, तो समिति उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होगी। ‘
पुष्पेंद्र राजवाड़े, अध्यक्ष
(कोरिया जन सहयोग समिति)
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