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सूरजपुर@गायब धान,बंद कैमरे,बदली रिपोर्ट… सूरजपुर में धान खरीदी का संगठित खेल?

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-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,18 मार्च 2026 (घटती-घटना)। सूरजपुर जिले की धान खरीदी व्यवस्था अब केवल अनियमितताओं का मामला नहीं रह गई है,बल्कि यह एक बहु-स्तरीय,परतदार और संभावित संगठित तंत्र का संकेत देती दिखाई दे रही है,एक के बाद एक सामने आए तथ्य करोड़ों का घोटाला,हजारों मि्ंटल धान की कमी,एआई कैमरों की रिपोर्टिंग बंद होना,जांच रिपोर्टों का विरोधाभास, रिकॉर्ड में अचानक खरीदी का विस्फोट और उठाव के दौरान ‘सब बराबर’ का पैटर्न,इन सभी को जोड़ने पर जो तस्वीर बनती है,वह बेहद चिंताजनक है,यह विस्तृत रिपोर्ट इन्हीं सभी पहलुओं को क्रमवार जोड़ते हुए उस पूरे मॉडल को समझने का प्रयास है,जो अब सवालों के केंद्र में है। (रिपोर्ट उपलब्ध दस्तावेजों, स्थानीय तथ्यों और सूत्रों के आधार पर तैयार की गई है। प्रशासनिक पक्ष प्राप्त होने पर प्रकाशित किया जाएगा।)
अध्याय 1ः 11.69 करोड़ का खुला खेल… जब रिकॉर्ड भरे,गोदाम खाली मिले
सूरजपुर जिले के 10 से अधिक धान उपार्जन केंद्रों में किए गए भौतिक सत्यापन ने चौंकाने वाला सच उजागर किया, 37,734 मि्ंटल धान की कमी, अनुमानित मूल्यः 11.69 करोड़ यह कमी किसी एक केंद्र तक सीमित नहीं, बल्कि कई केंद्रों में फैली हुई थी।
प्रमुख केंद्रों में कमी…
उमेश्वरपुर – 7,036 मि्ंटल
सूरजपुर – 6,610 मि्ंटल
टुकुडांड – 6,412 मि्ंटल
शिवप्रसादनगर – 5,552 मि्ंटल
लटोरी – 4,367 मि्ंटल
मूल सवालः धान खरीदा गया,भुगतान हुआ,रिकॉर्ड में मौजूद-तो स्टॉक गया कहां ?
अध्याय 2 : निगरानी का ‘ब्लाइंड स्पॉट’ एआई कैमरे क्यों बंद हुए?
धान खरीदी के दौरान एआई कैमरे सक्रिय थे,लेकिन खरीदी समाप्त होते ही उठाव (लिफ्टिंग) शुरू होते ही कैमरों की रिपोर्टिंग बंद हो गई,यही वह चरण है जहां धान गोदाम से निकलता है,ट्रांसपोर्ट होता है,रिकॉर्ड की सत्यता तय होती है आरोप सामने आए गाडि़यां खाली आती-जाती,लेकिन रिकॉर्ड में पूरा धान उठाव दर्ज,जहां निगरानी सबसे जरूरी थी,वहीं अंधेरा कर दिया गया।
अध्याय 3 : शून्य बनाने का मॉडल… कमी से बराबरी तक का सफर
सूत्रों और स्थानीय चर्चाओं के अनुसार पहले केंद्रों में धान की कमी पाई गई, बाद में उठाव के दौरान रिकॉर्ड पूरा कर दिया गया,इसे कहा जा रहा है,शून्य बनाने का मॉडल मतलब पहले कमी दिखती है,फिर रिकॉर्ड सुधरता है,अंत में सब बराबर, घोटाला खत्म नहीं होता,कागजों में संतुलित हो जाता है।
अध्याय 4 : शिवप्रसादनगर… पूरे खेल का केंद्र
शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र इस पूरे मामले का सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है,यहां घटनाएं सिर्फ संयोग नहीं, बल्कि एक पैटर्न दर्शाती हैं।
पहली जांच (7 जनवरी)
13,000 से अधिक बोरियां गायब
दूसरी जांच (24-25 जनवरी)
कोई कमी नहीं, स्टॉक पूरा
सवालः क्या धान 17 दिन में खुद वापस आ गया?
11.69 करोड़ की कमी, 37,734 क्विंटल धान गायब
अध्याय 5: दो जांच,दो नतीजे-सच कौन सा?
पहली रिपोर्टः घोटाले का संकेत
दूसरी रिपोर्टः सब ठीक
प्रशासनिक विरोधाभास
राजस्व विभाग कमी मानता है
खाद्य विभाग इनकार करता है
निष्कर्ष : सच दो हिस्सों में बंट गया है…
अध्याय 6: 35 हजार क्विंटल 13 दिन में – आंकड़ों की खेती?
2 महीने में खरीदीः 65,000 मि्ंटल
13 दिन में खरीदीः 35,000 मि्ंटल
जबकि- किसान धान बेच चुके खेत खाली
सवालः धान खेत में उगा या फाइल में?
अध्याय 7 : ‘एक धान – अनेक किसान’ मॉडल
आरोप एक ही धान के साथ कई किसानों का सत्यापन, पोर्टल में खरीदी बढ़ाई गई, मतलबः धान वही… रिकॉर्ड कई।
अध्याय 8: बोरी वजन और चट सिस्टम में खेल
मानक बोरीः 40.700 किलो- वास्तविकः 35-38 किलो
परिणामः बोरी संख्या ज्यादा मि्ंटल पूरा
चटा नियमः
1 चटा = 92000 मि्ंटल
दावाः 2 चट में 35,000 मि्ंटल
व्यंग्यः चट रबर की या धान डिजिटल?
अध्याय 9 : जमीन,बैंक और राइस मिल – नया एंगल
7.7 एकड़ जमीन ट्रांसफर- जमीन 3 बैंकों में बंधक- फिर भी रजिस्ट्री
सवाल
एनओसी किसने दी? पैसा कहां से आया?
उसी जमीन पर राइस मिल निर्माण की चर्चा
अध्याय 10: धान माफिया और सिस्टम का गठजोड़?
स्थानीय आरोप
केंद्र का संचालन बाहरी प्रभावशाली लोग करते हैं
समिति सिर्फ औपचारिक
कार्रवाई से पहले मामला दब जाता है
अध्याय 11: प्रशासन की भूमिका – कार्रवाई या मौन?
अब तक- नोटिस जारी- जांच जारी
लेकिन- कोई ठोस कार्रवाई नहीं
कोई स्पष्ट जवाब नहीं
सवालः क्या सिस्टम खुद को बचा रहा है?
अध्याय 12 : किसानों का भरोसा – सबसे बड़ा नुकसान
धान दिया
भुगतान मिला
लेकिन सिस्टम संदिग्ध
किसान पूछ रहे हैंः हमारा धान गया कहां?
अध्याय 13: मीडिया की भूमिका…
सच सामने आया
लगातार रिपोर्टिंग के बाद-
प्रशासन सक्रिय हुआ
जांच शुरू हुई
घोटाला सामने आया
यह दिखाता है कि जिम्मेदार पत्रकारिता अभी भी असरदार है

सिस्टम फेल या सिस्टम सेट?
सभी पहलुओं को जोड़कर देखें तो घोटाला उजागर,कैमरे बंद,रिपोर्ट बदली,आंकड़े बढ़े,कार्रवाई रुकी यह केवल संयोग नहीं,बल्कि एक पैटर्न लगता है।
अंतिम निष्कर्ष…
यह सिर्फ धान का घोटाला नहीं…यह सिस्टम की पारदर्शिता और विश्वसनीयता की परीक्षा है, यदि समय रहते निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई नहीं हुई,तो यह मॉडल पूरे जिले में फैल सकता है-और तब नुकसान सिर्फ सरकारी खजाने का नहीं,बल्कि किसानों के विश्वास का भी होगा।
अंतिम सवाल…पूरे सिस्टम से
37,734 क्विंटल धान गया कहां?
13 हजार बोरियां कैसे गायब हुईं और फिर कैसे आईं?
एआई कैमरे क्यों बंद हुए?
कौन-सी जांच सही है?
क्या ऊपर तक संरक्षण है?


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