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कोरिया@भांडी का ‘कर्मा चौक’ या फाइलों का चक्रव्यूह? अतिक्रमण की कहानी कैसे बनी ‘अनापत्ति’ की सरकारी गाथा?

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  • नहर में अतिक्रमण से ‘नो ऑब्जेक्शन’ तक : भांडी के कर्मा चौक ने खोल दी फाइलों की पोल
  • पहले अतिक्रमण, फिर अनापत्ति : भांडी के कर्मा चौक पर सरकारी फाइलों का यू-टर्न
  • नहर वही,चौक वही….बस बदल गई रिपोर्ट…भांडी में फाइलों का खेल?
  • कागजों में खिसकी नहर की सीमा! भांडी के कर्मा चौक पर प्रशासनिक सवाल
  • अतिक्रमण से वैध निर्माण तकः किसके इशारे पर बदली सरकारी राय?
  • नहर की जमीन पर निर्माण बताने वाले दस्तावेज, फिर अचानक बदल गई सरकारी राय…आखिर किसके इशारे पर पलटी फाइलों की भाषा?


-रवि सिंह-
कोरिया,12 मार्च 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले के बैकुंठपुर क्षेत्र के छोटे से गांव भांडी में बना भक्त माता कर्मा चौक इन दिनों सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं रहा,बल्कि यह सरकारी फाइलों के ऐसे चक्रव्यूह का प्रतीक बन गया है, जिसमें सच, नियम और निर्णय तीनों अलग-अलग दिशाओं में चलते दिखाई देते हैं।
इस पूरे मामले की कहानी अगर शुरू से अंत तक पढ़ी जाए तो ऐसा लगता है जैसे किसी प्रशासनिक नाटक की पटकथा हो,जहां पहले किसी निर्माण को नहर की जमीन पर अतिक्रमण बताया जाता है, फिर उसी निर्माण को बिना आपत्ति के वैध घोषित कर दिया जाता है, और अंत में उसी आधार पर अदालत में चल रहा मामला ही खत्म कर दिया जाता है, सबसे बड़ा सवाल यही है की क्या जमीन बदली, या फाइलों की भाषा बदल दी गई?
क्या माइनर नहर के किनारे कोई भी कर सकता है निर्माण?
सिर्फ नुकसान नहीं होगा,कहना काफी नहीं,विभाग की अनुमति और सुरक्षा दूरी जरूरी, माइनर नहर के किनारे निर्माण को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि अगर किसी निर्माण से नहर को कोई नुकसान नहीं हो रहा है,तो क्या कोई भी व्यक्ति वहां निर्माण कर सकता है और बाद में जल संसाधन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त कर सकता है,इस विषय पर एक कानूनी विशेषज्ञ से बात की गई तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि सिर्फ यह कहना कि निर्माण से नहर को नुकसान नहीं होगा,पर्याप्त नहीं है,विशेषज्ञ के अनुसार जल संसाधन या सिंचाई विभाग के अंतर्गत आने वाली नहरें,उनकी पटरी और आसपास का रखरखाव क्षेत्र सामान्यतः सरकारी संपत्ति माना जाता है, नहर के दोनों किनारों पर एक निर्धारित सुरक्षा क्षेत्र (सेफ्टी जोन) रखा जाता है,ताकि नहर की मरम्मत,सफाई और रखरखाव में कोई बाधा न आए और पानी के प्रवाह पर भी असर न पड़े,इसी कारण नहर की भूमि या उसके सुरक्षा क्षेत्र में बिना अनुमति निर्माण अतिक्रमण माना जा सकता है और प्रशासन को उसे हटाने का अधिकार होता है। हालांकि कुछ मामलों में विभाग हृह्रष्ट देता है, लेकिन यह आमतौर पर पुल,पुलिया,पाइपलाइन या सड़क क्रॉसिंग जैसे सार्वजनिक उपयोग के कार्यों तक सीमित होता है,निजी उपयोग के लिए स्थायी निर्माण—जैसे मकान, दुकान, चबूतरा या अन्य संरचना—नहर की भूमि या उसके सुरक्षा क्षेत्र में सामान्यतः अनुमति योग्य नहीं होते,स्थायी निर्माण सामान्यतः अनुमति योग्य नहीं होते। निर्माण तभी संभव है जब वह नहर की निर्धारित सीमा से बाहर हो और विभाग से पूर्व अनुमति प्राप्त हो,अन्यथा उसे प्रशासनिक रूप से अवैध निर्माण माना जा सकता है।
मामला आखिर है क्या
भांडी गांव में खसरा नंबर 101/15 (0.332 हेक्टेयर) की भूमि पर भक्त माता कर्मा चौक का निर्माण किया गया, इस चौक के बीच में माता कर्मा की मूर्ति स्थापित की गई और चारों ओर लगभग 7 फीट ऊंची दीवार बनाकर चबूतरा तैयार किया गया,जिसका क्षेत्र लगभग 338 वर्गफुट बताया गया, भाड़ी यह निर्माण स्थानीय स्तर पर साहू समाज से जुड़ा बताया गया,क्योंकि माता कर्मा को साहू समाज की आराध्य देवी माना जाता है,लेकिन यह धार्मिक आस्था का मामला जल्दी ही राजस्व और जल संसाधन विभाग की फाइलों में अतिक्रमण के विवाद में बदल गया।
जब मामला बना अतिक्रमण
जांच के दौरान राजस्व अधिकारियों ने पाया कि जिस स्थान पर चौक बनाया गया है, वह भूमि नहर क्षेत्र के पास स्थित है और निर्माण की स्थिति पर सवाल उठे, इसी आधार पर प्रशासन ने छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 248(1) के तहत अतिक्रमण का मामला दर्ज किया,संबंधित पक्ष को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया,भाड़ी सरकारी प्रक्रिया के अनुसार यह साफ संकेत था कि प्रशासन इस निर्माण को अतिक्रमण मानते हुए कार्रवाई की दिशा में बढ़ रहा था।
साहू समाज का जवाब
नोटिस मिलने के बाद साहू समाज जिला कोरिया की ओर से विस्तृत जवाब प्रस्तुत किया गया की चौक का नामकरण भक्त माता कर्मा के नाम पर किया गया है,ग्राम पंचायत भांडी ने 22 सितंबर 2022 को प्रस्ताव पारित किया था,चौक और चबूतरे के निर्माण के लिए मुख्यमंत्री मद से लगभग 5 लाख रुपये की स्वीकृति मिली थी,निर्माण के लिए तकनीकी स्वीकृति भी प्राप्त की गई थी,भाड़ी यानी उनके अनुसार यह निर्माण किसी निजी कब्जे का नहीं बल्कि सार्वजनिक धार्मिक स्थल का विकास था।
सरकारी फाइलों में आया पहला झटका
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका जल संसाधन विभाग की थी, क्योंकि निर्माण के पास से नहर गुजरती है,शुरुआती रिपोर्टों में यह संकेत दिया गया कि निर्माण नहर की भूमि के भीतर किया गया है,यही आधार अतिक्रमण के आरोप का सबसे मजबूत तर्क था,लेकिन यहीं से कहानी ने ऐसा मोड़ लिया,जिसने पूरे मामले की दिशा ही बदल दी।
तीन साल बाद बदली तस्वीर
समय बीतता गया और मामला राजस्व न्यायालय में विचाराधीन रहा, इसी दौरान 6 फरवरी 2026 को जल संसाधन विभाग का नया पत्र सामने आया,इस पत्र में विभाग ने लिखा कि ग्राम भांडी में बने कर्मा चौक के पीछे सिलफोडा जलाशय की माइनर नहर गुजरती है, निर्माण से नहर को कोई नुकसान नहीं हुआ कोई अतिक्रमण नहीं किया गया है, विभाग को इस निर्माण से कोई आपत्ति नहीं है, भाड़ी यह वही विभाग था, जिसकी शुरुआती टिप्पणियों के आधार पर अतिक्रमण की आशंका पैदा हुई थी,अब वही विभाग कह रहा था कि सब कुछ ठीक है।
अदालत का फैसला
राजस्व न्यायालय, बैकुंठपुर ने इस पूरे मामले की सुनवाई के दौरान सभी दस्तावेजों का परीक्षण किया,आदेश में कहा गया कि,जल संसाधन विभाग ने स्पष्ट किया है कि निर्माण से नहर को कोई नुकसान नहीं है, ग्राम पंचायत का प्रस्ताव और सरकारी स्वीकृति मौजूद है, इसलिए यह निर्माण अतिक्रमण की श्रेणी में नहीं आता,इसी आधार पर न्यायालय ने प्रकरण समाप्त कर दिया और केस को दाखिल-दफ्तर कर दिया।
लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होते हैं…
कानूनी रूप से मामला खत्म हो चुका है,लेकिन कई सवाल अब भी हवा में तैर रहे हैं, सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर निर्माण नहर की जमीन पर नहीं था,तो पहले इसे अतिक्रमण क्यों बताया गया? और अगर वाकई अतिक्रमण था,तो फिर अचानक वह वैध कैसे हो गया? सरकारी विभागों के बीच इस तरह के विरोधाभासी निष्कर्ष सामान्यतः बहुत कम देखने को मिलते हैं।
फाइलों का रहस्यमय यू-टर्न
इस मामले को देखने वाले कई लोगों का कहना है कि यह सरकारी फाइलों के यू-टर्न का क्लासिक उदाहरण बन गया है,क्योंकि पहले निर्माण नहर क्षेत्र में बताया गया फिर वही निर्माण नहर को बिना नुकसान वाला बताया गया,और अंत में मामला ही समाप्त कर दिया गया, अगर इसे व्यंग्य में कहा जाए तो ऐसा लगता है जैसे नहर अपनी जगह से नहीं हटी, लेकिन कागजों में उसकी सीमा बदल गई।
प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल
ऐसे मामलों में सबसे बड़ी चिंता प्रशासनिक विश्वसनीयता की होती है, जब सरकारी दस्तावेज अलग-अलग समय पर अलग-अलग निष्कर्ष देने लगें,तो आम लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सही क्या है? क्या शुरुआती जांच गलत थी? या बाद की रिपोर्ट दबाव में बदली गई? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी दस्तावेज ही न्यायिक निर्णयों का आधार बनते हैं।
राजनीति और सामाजिक समीकरण
इस मामले में एक और पहलू भी चर्चा में है सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव, माता कर्मा साहू समाज की आराध्य देवी मानी जाती हैं और समाज का स्थानीय स्तर पर प्रभाव भी है, ऐसे में कई लोग मानते हैं कि इस पूरे मामले में सामाजिक दबाव भी एक कारक हो सकता है,हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन स्थानीय चर्चाओं में यह मुद्दा बार-बार उठ रहा है।
विकास बनाम नियम
भांडी के कर्मा चौक का मामला सिर्फ अतिक्रमण का विवाद नहीं है, बल्कि यह उस बड़ी बहस का हिस्सा भी है जिसमें अक्सर धार्मिक स्थल, विकास कार्य और सरकारी नियम आपस में टकराते दिखाई देते हैं, कई बार स्थानीय स्तर पर विकास या धार्मिक आस्था के नाम पर निर्माण हो जाते हैं, और बाद में प्रशासन को नियमों और सामाजिक भावनाओं के बीच संतुलन बनाना पड़ता है, भांडी का यह मामला भी शायद उसी जटिल संतुलन की कहानी है।
अंत में…
भांडी गांव में बना भक्त माता कर्मा चौक आज भी वहीं खड़ा है, उसके आसपास नहर भी बह रही है और गांव का सामान्य जीवन भी चल रहा है, लेकिन सरकारी फाइलों में दर्ज उसकी कहानी यह बताती है कि प्रशासनिक दुनिया में सच हमेशा स्थिर नहीं रहता, कभी वह अतिक्रमण बन जाता है, कभी अनापत्ति, और जब सच बदलता है, तो उसके पीछे छिपे सवाल भी उतने ही बड़े हो जाते हैं, भांडी का यह मामला शायद आने वाले समय में सरकारी फाइलों के रहस्यमय यू-टर्न का एक उदाहरण बनकर याद किया जाएगा।


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