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सूरजपुर@जांच हुई, घोटाला पकड़ा गया फिर चुप्पी क्यों?

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शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र में 13 हजार बोरी की कमी, प्रशासन मौन
धान घोटाले की जांच के बाद भी सच पर ताला
शिवप्रसादनगर मामले में कार्रवाई सार्वजनिक करने से बचता प्रशासन
13 हजार बोरी धान गायब, कार्रवाई की जानकारी भी गायब
शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र में घोटाला और प्रशासनिक चुप्पी
घोटाला साबित, फिर भी पर्दा डालने की कोशिश?
शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र जांच पर उठे गंभीर सवाल,धान घोटाले पर कार्रवाई छुपी क्यों?
शिवप्रसाद नगर केंद्र में जांच के बाद भी प्रशासन मौन, 13 हजार या 25 हजार बोरी?
शिवप्रसाद नगर धान घोटाले में जांच, आंकड़े और प्रशासन कटघरे में


-शमरोज खान-
सूरजपुर,11 जनवरी 2026 (घटती-घटना)।
जिला सूरजपुर के शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र में लंबे समय से चल रहे कथित धान घोटाले को लेकर दैनिक घटती घटना द्वारा लगातार प्रकाशित खबरों के बाद आखिरकार प्रशासनिक अमला जांच के लिए मौके पर पहुंचा,यह जांच शनिवार को दोपहर 12 बजे से शाम 8 बजे तक करीब 6 घंटे चली, लेकिन इतने लंबे समय के बाद भी न तो धान की सटीक गिनती हो सकी और न ही संदेह के घेरे में आए आंकड़ों पर पूरी तरह से स्थिति स्पष्ट हो पाई। बता दे की शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र में सामने आए बहुचर्चित धान घोटाले की जांच के बाद अब एक नया और गंभीर सवाल खड़ा हो गया है कार्रवाई की जानकारी को सार्वजनिक करने से प्रशासन क्यों बचता नजर आ रहा है? जांच दल द्वारा मौके पर पहुंचकर घंटों मशक्कत करने, भारी मात्रा में धान की कमी पाए जाने और मामला उजागर होने के बावजूद प्रशासनिक तंत्र की चुप्पी और देरी ने पूरे प्रकरण को और अधिक संदिग्ध बना दिया है, दैनिक घटती घटना द्वारा 07 और 10 जनवरी 2026 को प्रकाशित खबरों ने जिस बड़े घोटाले की ओर इशारा किया था, प्रशासनिक जांच ने उसकी पुष्टि तो कर दी है, लेकिन पूरी सच्चाई अब भी परदे में है, सबसे बड़ा सवाल यही है क्या 13,000 बोरी की कमी ही अंतिम सच है,या सच इससे कहीं ज्यादा बड़ा और डरावना है? अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि प्रशासन आगे निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई करता है या यह मामला भी फाइलों और आंकड़ों के बीच दबकर रह जाएगा।
पूर्व में प्रकाशित खबरों से हिला प्रशासन- गौरतलब है कि दैनिक घटती घटना ने 07 जनवरी 2026 के अंक में शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र में “बड़ा घोटाला?” शीर्षक से खबर प्रकाशित की थी, जिसमें यह बताया गया था कि कागजों में 65 हजार मि्ंटल धान की खरीदी दर्शाई गई है, जबकि गोदामों में वास्तविक भंडारण नदारद या बेहद कम प्रतीत हो रहा है, इसके बाद 10 जनवरी 2026 के अंक में प्रकाशित दूसरी रिपोर्ट में इस केंद्र को “संगठित लूट का अड्डा” करार देते हुए धान खरीदी से जुड़े पूरे तंत्र, कथित तिकड़ी और संरक्षण देने वाले सिस्टम पर गंभीर सवाल उठाए गए थे। इन्हीं खबरों के दबाव के चलते प्रशासन को जांच के लिए मैदान में उतरना पड़ा।
जांच शुरू, लेकिन अव्यवस्था हावी- शनिवार को हुई जांच में राजस्व विभाग, सहकारिता विभाग और खाद्य विभाग के अधिकारी संयुक्त रूप से शामिल रहे, जांच की शुरुआत तो हुई, लेकिन मौके पर पहुंचते ही टीम को कई स्तरों पर अव्यवस्था का सामना करना पड़ा, धान के बोरों के चट्टे इस तरह लगाए गए थे कि गिनती करने में भारी परेशानी हुई, सूत्रों का कहना है कि यह कोई संयोग नहीं, बल्कि पुरानी और सोची-समझी व्यवस्था है, ताकि जांच करने वाला अमला भ्रमित हो जाए और वास्तविक कमी सामने न आ सके।
13 हजार बोरी की कमी, लेकिन सवाल कायम- लंबी मशक्कत के बाद प्रशासनिक जांच में करीब 13,000 बोरी धान की कमी दर्ज की गई। राजस्व विभाग की ओर से इस आंकड़े को फिलहाल अंतिम बताया गया है, हालांकि, सूत्रों और स्थानीय जानकारों का दावा है कि यदि चट्टों को पूरी तरह हटाकर, व्यवस्थित ढंग से भौतिक सत्यापन किया जाता, तो 25,000 बोरी से कम धान की कमी नहीं निकलती, यानी जो आंकड़ा सामने आया है, वह केवल “आधी सच्चाई” हो सकता है।
सूत्रों के गंभीर आरोप- सूत्रों का आरोप है कि राजस्व अमला जहां वास्तविक स्थिति देखकर असहज नजर आया, वहीं सहकारिता और खाद्य विभाग केंद्र प्रबंधन को बचाने में जुटे दिखे, आरोप है कि गिनती को पूरी पारदर्शिता से करने के बजाय आंकड़ों को “मैनेज” करने का प्रयास किया गया, ताकि घोटाले का दायरा सीमित दिखाया जा सके।
हर बार विवादों में रहा है केंद्र- यह पहला मौका नहीं है जब शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र सवालों के घेरे में आया हो, इसके बावजूद न तो सिस्टम में सुधार हुआ और न ही जिम्मेदारों पर कोई ठोस, नजीर बनने वाली कार्रवाई हो सकी, नतीजा यह है कि यह केंद्र अब क्षेत्र में धान घोटाले का स्थायी केंद्र बिंदु बनता जा रहा है।
किसानों और ग्रामीणों में आक्रोश- जांच के दौरान और उसके बाद किसानों व ग्रामीणों में भारी नाराजगी देखने को मिली, लोगों का कहना है कि जब कमी 13,000 बोरी भी मान ली जाए, तो यह कोई छोटी गड़बड़ी नहीं,बल्कि करोड़ों रुपये के नुकसान का मामला है, ग्रामीणों की मांग है कि वर्तमान समिति कर्मचारियों और प्रभारी को तत्काल हटाया जाए, स्वतंत्र एजेंसी या उच्चस्तरीय जांच टीम से दोबारा भौतिक सत्यापन और गहन जांच कराई जाए।
कार्रवाई हुई, लेकिन जानकारी गायब- जांच पूरी होने के बाद न तो जिला प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रेस नोट जारी किया गया, न ही जनसंपर्क विभाग को कार्रवाई की ठोस जानकारी उपलब्ध कराई गई, स्थिति यह रही कि दिनभर पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों को फोन लगाते रहे, लेकिन हर बार एक ही जवाब मिला जानकारी मांगी गई है, अभी तक प्राप्त नहीं हुई है, यह जवाब अपने आप में कई सवाल खड़े करता है, क्या जांच रिपोर्ट अब तक तैयार नहीं हुई? या फिर रिपोर्ट तैयार हो चुकी है, लेकिन उसे सार्वजनिक करने से जानबूझकर रोका जा रहा है? सूत्रों के अनुसार, जांच के तत्काल बाद ही कमी का आंकड़ा सामने आ गया था, ऐसे में सूचना साझा न करने की यह स्थिति सामान्य नहीं कही जा सकती।
सूचना देने में देरी या सोची-समझी चुप्पी?- प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि जांच दल को मौके पर चट्टों की जटिल व्यवस्था में उलझाकर वास्तविक स्थिति से भटकाया गया, इसी कारण आधिकारिक तौर पर केवल 13,000 बोरी धान की कमी दर्ज हो पाई, जबकि जमीनी जानकारों और स्थानीय लोगों का दावा है कि यदि व्यवस्थित ढंग से चट्टों को हटाकर पूरी गिनती होती, तो 25,000 बोरी से कम धान की कमी नहीं निकलती, अब सवाल यह उठता है कि क्या जांच दल को वास्तव में गुमराह किया गया? या फिर घोटाले के दायरे को सीमित रखने के लिए जानबूझकर अधूरी जांच की गई?
13,000 बोरी भी “छोटा” घोटाला नहीं- सूत्रों के माने तो भले ही प्रशासन 13,000 बोरी की कमी को अंतिम मान रहा हो, लेकिन यह आंकड़ा भी मामूली नहीं है, इतनी बड़ी मात्रा में धान की कमी सीधे तौर पर करोड़ों रुपये के आर्थिक नुकसान की ओर इशारा करती है, सबसे अहम सवाल यह है कि यह धान न तो धान खरीदी केंद्र में मौजूद है, न ही मिलरों तक पहुंचने का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड है, तो आखिर यह धान गया कहां? क्या यह धान अवैध रूप से खुले बाजार में बेचा गया? कागजों में खरीदी दिखाकर राशि का बंदरबांट कर लिया गया? या फिर इसे किसी और केंद्र/मिल के नाम पर खपा दिया गया? इन सवालों का जवाब दिए बिना किसी भी जांच को पूर्ण नहीं माना जा सकता।
अब कार्रवाई क्या होगी?- स्थानीय लोगों और किसानों की निगाहें अब जिला प्रशासन, सहकारिता विभाग और खाद्य विभाग पर टिकी हैं, लोग खुलकर सवाल पूछ रहे हैं क्या इस मामले में एफआईआर दर्ज होगी? क्या जिम्मेदार समिति प्रबंधक, केंद्र प्रभारी और संबंधित अधिकारियों पर आपराधिक कार्रवाई की जाएगी? क्या गबन किए गए धान की भरपाई दोषियों से कराई जाएगी? या फिर हमेशा की तरह जांच रिपोर्ट फाइलों में बंद हो जाएगी, और वही लोग आगे भी धान खरीदी की जिम्मेदारी संभालते रहेंगे?
पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न- इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कार्रवाई के बाद भी जानकारी छिपाई जा रही है, जिससे यह संदेह गहराता जा रहा है कि कहीं न कहीं किसी को बचाने की कोशिश हो रही है, यदि प्रशासन निष्पक्ष है, तो उसे चाहिए कि जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करे, कमी का वास्तविक आंकड़ा स्पष्ट करे, और आगे की कार्रवाई की समय-सीमा तय करे।


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