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बिलासपुर@बिजली बिल की बकाया राशि का मामला पहुंचा हाईकोर्ट

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बिलासपुर,1 जनवरी 2026। बकाया बिल की वसूली को लेकर हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस बीडी गुरु ने अपने फैसले में कहा है, विद्युत (आपूर्ति) अधिनियम,1948 की धारा 49 के तहत यह शर्त है कि विद्युत आपूर्ति प्रदान करने से पहले नए मालिक को पिछले मालिक की बकाया राशि का भुगतान करना होगा, क्योंकि यह एक वैधानिक प्रक्रिया है और खरीदार पर बाध्यकारी है। पॉलीबॉन्ड रॉक फाइबर प्राइवेट लिमिटेड ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने बैंक अधिकारियों सहित,संयुक्त रूप से और अलग-अलग,बिजली कनेक्शन प्रदान करने के लिए अवैध रूप से वसूल की गई राशि को प्रचलित बैंक दर पर ब्याज सहित वापस करने की मांग की थी। याचिकाकर्ता ने बैंक ऑफ इंडिया पर आरोप लगाया है कि नीलामी से पहले कई वर्षों तक संपत्ति पर कब्जा होने के बावजूद मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अपने विज्ञापन में मौजूदा बकाया बिजली बिल का खुलासा नहीं किया है। अरिहंत रॉक वूल फाइबर प्राइवेट लिमिटेड, राजनांदगांव जिले के डोंगरगांव तहसील के बकल गांव में स्थित खसरा संख्या 887/1 और 888 वाली 2.04 एकड़ भूमि पर एक संयंत्र संचालित करती थी। उक्त संयंत्र के संचालन के लिए, अरिहंत ने बैंक ऑफ इंडिया से ऋण लिया था। हालांकि, अरिहंत द्वारा ऋण राशि के पुनर्भुगतान में चूक के कारण, बैंक ने प्रतिभूतिकरण और वित्तीय परिसंपत्तियों के पुनर्निर्माण और सुरक्षा हित प्रवर्तन अधिनियम, 2002 के तहत बैंक ने अरिहंत की संपत्ति पर कब्जा कर लिया। इसके बाद उक्त संपत्ति की बिक्री के लिए 19 अप्रैल 2012 को नीलामी सूचना प्रकाशित की गई। इस प्रक्रिया में याचिकाकर्ता कंपनी ने भाग लिया और सफल घोषित होने पर उसने 2,62,18,000 रुपये का विक्रय मूल्य अदा किया। इसके बाद बैंक ने अरिहंत की चल और अचल संपत्तियों के विक्रय प्रमाण पत्र याचिकाकर्ता कंपनी को सौंप दिया। याचिकाकर्ता के अनुसार, विक्रय प्रमाण पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि ‘अनुसूचीबद्ध संपत्ति की बिक्री सुरक्षित लेनदार को ज्ञात सभी भारों से मुक्त थी’। जब उसने उत्पादन शुरू करने या संयंत्र चलाने के लिए छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड ष्टस्क्कष्ठष्टरु से बिजली कनेक्शन के लिए आवेदन किया। उस समय उसे पता चला कि अरिहंत पर 2008 से बिजली बिल बकाया है, जिसके कारण बिजली कनेक्शन स्थायी रूप से काट दिया गया है।
याचिकाकर्ता के अनुसार उसने अधिकारियों को यह समझाने की पूरी कोशिश की कि वे अरिहंत के किसी भी बिजली बिल का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। इसके बावजूद,ष्टस्क्कष्ठष्टरु ने याचिकाकर्ता से 17,67,873 रुपये का भुगतान करने को कहा, अन्यथा वसूली की कार्यवाही शुरू की जाएगी। तत्काल बिजली कनेक्शन प्राप्त करने के लिए, याचिकाकर्ता ने उक्त राशि का भुगतान कर दिया और उसके बाद से इस राशि की वापसी के लिए दर-दर भटक रहा है। याचिकाकर्ता के अनुसार, बैंक ऑफ इंडिया ने भी अपनी जिम्मेदारी से इनकार कर दिया है और यहां तक कि ष्टस्क्कष्ठष्टरु ने भी इस संबंध में याचिकाकर्ता के अनुरोध को स्वीकार नहीं कर रहा है। याचिकाकर्ता की ओर से उपस्थित अधिवक्ता ने सिंगल बेंच के समक्ष तर्क दिया कि बिजली कंपनी द्वारा की गई कार्रवाई अवैध, मनमानी और विधिवत रूप से अस्वीकार्य है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता से वसूल की गई राशि वसूली की तिथि पर समय सीमा से बाहर हो गई थी और चूंकि समय सीमा से बाहर हो चुकी ऋण राशि याचिकाकर्ता द्वारा देय नहीं है, इसलिए ष्टस्क्कष्ठष्टरु ब्याज सहित राशि वापस करने के लिए बाध्य हैं। बिजली कंपनी की यह कार्रवाई भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 और 300 ए के तहत याचिकाकर्ता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। बिजली कंपनी ने कहाः बकाया बिल का भुगतान करने की जिम्मेदारी की है बिजली कंपनी की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने कहा, यह याचिका धन संबंधी दावे से संबंधित है, जिसके लिए तीन वर्ष की अवधि के भीतर मुकदमा दायर किया जा सकता था।


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