- नेतृत्व दानिश के हाथ,संगठन सवालों के घेरे में…
- कांग्रेस के भीतर खींचतानःमंच पर भूपेश,परदे के पीछे असहजता…
- सरगुजा से कोरिया तक संदेश साफ-मैदान में वही टिकेगा जो सक्रिय है…
- सरगुजा से कोरिया तकः दानिश रफीक के हाथ में कमान,भूपेश बघेल का दौरा रहा सियासी तौर पर सफल…


-अनिल सिन्हा-
अंबिकापुर/कोरिया 31 दिसम्बर 2025 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस महासचिव भूपेश बघेल का सरगुजा संभाग दौरा संगठनात्मक दृष्टि से सफल रहा और इस सफलता की धुरी बने अंबिकापुर के कांग्रेस नेता दानिश रफीक। स्वागत से लेकर समन्वय तक, मंच से लेकर मुलाकातों तक पूरे दौरे में नेतृत्व और तैयारी दोनों स्तरों पर दानिश की भूमिका निर्णायक दिखी,दौरे के दौरान कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद, पारिवारिक भेंट, और जमीनी फीडबैक,हर पड़ाव पर कार्यक्रम सुचारु रहा। लेकिन इसी के साथ कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी भी खुलकर सामने आई, खासकर कोरिया और एमसीबी जिलों में तीनों पूर्व विधायकों की अनुपस्थिति ने सियासी हलकों में सवाल खड़े कर दिए। बता दे की सरगुजा संभाग में भूपेश बघेल का हालिया दौरा कांग्रेस के लिए दोहरी तस्वीर लेकर आया, एक ओर, कार्यकर्ताओं में ऊर्जा,संवाद और संगठनात्मक अनुशासन दिखा,तो दूसरी ओर, पार्टी की आंतरिक गुटबाजी भी उतनी ही स्पष्ट होकर सामने आई,इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में सबसे उभरकर सामने आया नाम है दानिश रफीक,दौरे की कमान दानिश के हाथ में थी,और यह सिर्फ औपचारिक मौजूदगी नहीं,बल्कि रणनीतिक तैयारी थी,कार्यक्रमों का समन्वय, कार्यकर्ताओं से संवाद,स्थानीय नेतृत्व को साथ लेना,इन सबमें दानिश की पकड़ साफ़ दिखी, यही वजह है कि सरगुजा से लेकर कोरिया तक दौरा सफल रहा और इसका श्रेय स्वाभाविक रूप से उन्हीं के खाते में गया, लेकिन सफलता के इस चित्र के बीच एक कड़वा सच भी उभरा कोरिया और एमसीबी जिलों में तीनों पूर्व विधायकों की अनुपस्थिति,सवाल लाजमी हैः क्या यह आगामी चुनाव में टिकट को लेकर भय था? या फिर पार्टी के भीतर शक्ति-संतुलन का दबाव? समर्थकों की नगण्य मौजूदगी ने इन सवालों को और धार दी,यह अनुपस्थिति सिर्फ व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि संगठन के भीतर भरोसे की कमी का संकेत भी है,दानिश रफीक की राजनीतिक यात्रा उन्हें साधारण आयोजक से आगे ले जाती है, जोगी कांग्रेस से कांग्रेस में वापसी के बाद उनकी सक्रियता और स्वीकार्यता ने उन्हें सरगुजा की राजनीति में एक कार्यकारी चेहरा बना दिया है,भूपेश बघेल के साथ उनकी निकटता बताती है कि संगठन उन्हें भरोसेमंद मान रहा है, वहीं टी.एस. सिंहदेव से उनकी दूरी भी सियासी चर्चाओं का हिस्सा है, जो यह दर्शाती है कि सरगुजा की राजनीति अब पुराने ध्रुवों में सीमित नहीं रही,यह दौरा कांग्रेस के लिए चेतावनी और अवसर,दोनों है,चेतावनी इसलिए कि गुटबाजी को अनदेखा किया गया तो संगठन कमजोर होगा, और अवसर इसलिए कि जमीनी स्तर पर सक्रिय, भरोसेमंद और मेहनती नेतृत्व, जैसा कि दानिश रफीक पार्टी को नई दिशा दे सकता है।
भूपेश के करीब, ‘बाबा’ से दूरी?
दौरे के हर बड़े पड़ाव पर दानिश, भूपेश बघेल के साथ करीब नजर आए तैयारी,अनुशासन और समन्वय में उनकी छाप स्पष्ट थी। वहीं दूसरी ओर,टी.एस. सिंहदेव से उनकी दूरी भी चर्चा का विषय बनी, क्या भूपेश से बढ़ती नजदीकी ही इस दूरी की वजह है? या यह सरगुजा की बदलती सियासी गणित का संकेत?
सरगुजा में भूपेश बघेल के आगमन से लेकर सूरजपुर,कोरिया आगमन तक साथ दिखे दानिश सरगुजा पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री के सभी कार्यक्रमों में दानिश की मौजूदगी नजर आई,यह मौजूदगी के केवल उपस्थिति मात्र नहीं थी यह उनकी की तैयारी थी यह भी साफ नजर आया,कोरिया जिले तक दानिश ने पूर्व मुख्यमंत्री का कार्यक्रम सफल बनाया,सभी जगह कार्यकर्ताओं सहित पदाधिकारियों से उन्होंने कार्यक्रम सफल बनाने अपील की,इस दौरान कई पारिवारिक मुलाकातों के दौरान भी दानिश की तैयारी नजर आई जहां पूर्व मुख्यमंत्री पहुंचे और मुलाकात की।
तीन पूर्व विधायक दूर क्यों?
कोरिया-एमसीबी में पूर्व विधायकों की गैरमौजूदगी पर चर्चाएँ तेज रहीं क्या आगामी चुनाव में टिकट कटने का भय वजह बना? या फिर पार्टी के भीतर दो प्रभावशाली नेताओं का दबाव? समर्थकों की कम उपस्थिति ने इन अटकलों को और हवा दी। जवाब चाहे जो हो, संदेश साफ़ था, संगठन के भीतर खींचतान अब पर्दे में नहीं रही।
जोगी से कांग्रेस तकः दानिश की लंबी राजनीतिक यात्रा
दानिश रफीक की पहचान सिर्फ आयोजक भर की नहीं है,वे वर्षों तक अजीत जोगी के करीबी रहे,जोगी कांग्रेस के गठन से लेकर सक्रिय राजनीति तक। 2018 में कांग्रेस की वापसी और अजीत जोगी के निधन के बाद दानिश की कांग्रेस में घर-वापसी हुई, बीते कुछ वर्षों में सरगुजा संभाग में उनकी सक्रियता और स्वीकार्यता लगातार बढ़ी है यही कारण है कि आज वे सरगुजा कांग्रेस के उभरते चेहरे के रूप में देखे जा रहे हैं।
क्या जोगी कांग्रेस से घर वापसी करने वाले दानिश
अब सरगुजा की राजनीति में एक अलग पहचान बना रहे हैं…
सरगुजा का दानिश रफीक वह नाम है जो कभी पूर्व और प्रथम मुख्यमंत्री स्व अजीत जोगी के खास थे,नया प्रदेश गठित होने के बाद स्व अजीत जोगी पहले मुख्यमंत्री बने थे और सरकार प्रदेश में कांग्रेस की स्थापित हुई थी,लगातार दानिश रफीक की आस्था और उनका समर्पण स्व अजीत जोगी के प्रति ही कई दशकों तक नजर आया वहीं जब कांग्रेस से अलग जाकर स्व अजीत जोगी ने नई पार्टी जोगी कांग्रेस की स्थापना की तब भी दानिश रफीक स्व अजीत जोगी और उनकी पार्टी में ही शामिल नजर आए, वैसे इस दौरान लगातार प्रदेश में भाजपा की सरकार बनती रही वहीं जब वर्ष 2018 में प्रदेश में कांग्रेस ने वापसी की और इसी दौरान जब पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का देहांत हुआ तब दानिश रफीक ने जोगी कांग्रेस का साथ छोड़ दिया और पुनः कांग्रेस में वापस लौट आए, हाल के कुछ वर्षों की बात की जाए तो दानिश रफीक लगातार सरगुजा सहित प्रदेश कांग्रेस में अपनी बेहतर उपस्थिति दर्ज कर रहे हैं, वैसे उनकी लगातार सक्रियता यह सवाल खड़े करती है कि क्या वह सरगुजा कांग्रेस के लिए वह चेहरा बनने जा रहे हैं जो आगे और आगे जाने वाला है क्या। वैसे पूर्व मुख्यमंत्री के साथ उनकी करीबी भी टी एस सिंहदेव से उनकी दूरी की एक वजह हो सकती है।
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