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अंबिकापुर/लखनपुर@अमेरा कोल माइंसः खदान का धुआं,गुस्से की आग…और पत्थरों की बरसात

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अमेरा कोल खदान विस्तार पर बवालः ग्रामीणों के पथराव में 2 दर्जन से अधिक पुलिसकर्मी घायल

  • ग्रामीण भी हुए घायल,लाठी-डंडे और पत्थरबाजी से क्षेत्र में तनाव,प्रशासन-पुलिस के शीर्ष अधिकारी मौके पर
  • 200 से अधिक पुलिसकर्मियों पर ग्रामीणों का धावा…अमेरा माइंस विस्तार फिर बना रणभूमि
  • बिना भूमि अधिग्रहण खनन का आरोप…ग्रामीणों की चेतावनीःजमीन नहीं देंगे…
  • स्थिति बेकाबूःपुलिस ने मंगाए आंसू गैस के गोले,प्रशासनिक अमला मौके पर डटा…

-न्यूज डेस्क-
अंबिकापुर/लखनपुर,03 दिसम्बर 2025 (घटती-घटना)। सरगुजा जिले के लखनपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत अमेरा कोल माइंस विस्तार को लेकर बुधवार का दिन हिंसक टकराव में बदल गया। ग्राम परसोड़ीकला में कोल कंपनी द्वारा खनन कार्य जारी था, इसी दौरान ग्रामीणों का विशाल समूह अचानक खदान क्षेत्र में पहुंच गया। पहले नारेबाजी हुई,फिर बहसबाजी और देखते ही देखते माहौल पूरी तरह बेकाबू हो गया,ग्रामीणों ने पुलिस दल पर अचानक तेज पत्थरबाजी शुरू कर दी,लाठी-डंडे भी चलाए गए,इस हमले में दो दर्जन से अधिक पुलिसकर्मी घायल हो गए, ग्रामीण पक्ष के भी कई लोग पत्थर और लाठी लगने से चोटिल हुए हैं।
बता दे की परसोड़ीकला का माहौल बुधवार दोपहर अचानक ऐसा बदल गया मानो खदान के मुहाने पर नहीं,किसी युद्धभूमि के प्रवेशद्वार पर खड़ा हो गया हो। हवा में कोयले की धूल थी,लेकिन उससे भी भारी था ग्रामीणों का आक्रोश। सूरज सिर पर था, आवाजें तेज थीं और खदान क्षेत्र की सड़क पर भीड़ हर मिनट बढ़ रही थी,सुबह खदान में मशीनों की आवाज सामान्य थी, डंपर चल रहे थे,ड्रिल मशीनें गड़गड़ा रही थीं, और खदान विस्तार का काम चल रहा था, लेकिन 11 बजे के बाद,मुख्य गेट के पास ग्रामीणों का हुजूम उमड़ पड़ा,महिलाएँ सिर पर गमछा बाँधे,पुरुष हाथ में लाठी-डंडा पकड़े और युवा पत्थर उठाए हुए…सब एक साथ आगे बढ़ने लगे,उनकी आँखों में एक ही संदेश था जमीन हमारी है,खदान तुम्हारी नहीं होगी।
पुलिस ने लाठियाँ भांजी, पर ‘संख्या’ के सामने बेअसर
पुलिस ने पहले चेतावनी दी,फिर हल्का लाठीचार्ज किया,पर ग्रामीणों की संख्या इतनी अधिक थी कि पुलिस को रक्षात्मक मोड में जाना पड़ा,कुछ ग्रामीण भागे,कुछ पीछे हटे,लेकिन कई लोग और उग्र होकर आगे बढ़े,पुलिस रेडियो वायरलेस पर संदेश गूंजा स्थिति नियंत्रण से बाहर, तुरंत अतिरिक्त बल भेजें…आंसू गैस की यूनिट तैयार रखें।
घायल जमीन पर ही पड़े रहे, महिलाएँ चिल्लाती रहीं
पत्थरबाजी इतनी तेज थी कि ग्रामीण भी घायल हुए,महिलाएँ अपने घरवालों को घसीटकर किनारे ले जा रही थीं,एक बुजुर्ग किसान के सिर से खून बह रहा था,उसने कहा हमको मरना मंजूर, जमीन दे देना मंजूर नहीं।
पुलिस का काफि़ला पहुँचा…पर भीड़ उससे भी बड़ी थी…
खदान प्रबंधन ने बढ़ती भीड़ की सूचना लखनपुर थाने को दी। मिनटों में 200 से अधिक पुलिसकर्मी मौके पर पहुँच गए,टीआई, एसडीओपी,आरक्षक सब पंक्ति में खड़े हुए, लेकिन ग्रामीणों की संख्या इतनी अधिक थी कि पुलिस बल अचानक छोटा पड़ गया,माहौल में तनाव साफ़ था दोनों ओर चेहरों पर तनाव की लकीरें, और बीच में खनन सड़क जो धीरे-धीरे झड़प की रेखा बन रही थी।
पहले नारा…फिर बहस…फिर पत्थरों की गूंज…कोल माइंस मुर्दाबाद…
हमारी जमीन वापस करो पहले नारे लगे…फिर पुलिस और ग्रामीणों के बीच बातचीत शुरू हुई,लेकिन यह बातचीत बहस में बदलने में ज्यादा देर नहीं लगी,ग्रामीणों ने आरोप दोहराए बिना अधिग्रहण खदान विस्तार कैसे? मुआवजा कहाँ है? दस्तावेज क्यों नहीं दिखाते? पुलिस ने उन्हें शांत रहने और हटने को कहा यह वही पल था जब वातावरण पूरी तरह फट पड़ा,एक युवक ने अचानक पुलिस की ओर पत्थर फेंका,उसके बाद पत्थर सिर्फ फेंके नहीं गए उड़ाए गए,पुलिस लाइन हिल गई,जवान ढाल उठाते हुए पीछे हटने लगे,कुछ ही सेकंड में दर्जनों पत्थर पुलिस पर बरसने लगे, पुलिसकर्मी चोटिल होकर जमीन पर गिरते दिखे, एक जवान माथे पर पत्थर लगने के बाद लड़खड़ाता दिखा सहकर्मियों ने उसे पीछे खींचा।
अपर कलेक्टर और एएसपी पहुँचे लेकिन भीड़ शांत नहीं…
अपर कलेक्टर सुनील नायक व एएसपी अमोलक सिंह ढिल्लो मौके पर पहुँचे, उन्होंने ग्रामीणों से बात करने की कोशिश की, लेकिन भीड़ में आवाजें तेज थीं पहले खनन बंद कराओ…फिर चर्चा करेंगे अधिकारी पीछे हटकर रणनीति बनाने लगे,पुलिस ने खदान गेट के पास सुरक्षा बैरिकेड बना दिए।
खदान का शोर बंद,टकराव की आवाजें गूंजती रहीं…
कंपनी प्रबंधन ने मशीनें बंद करा दीं, डंपर एक लाइन में रोक दिए गए,खदान का सन्नाटा पहली बार इतना भारी महसूस हुआ,पर इलाके का माहौल अभी भी विस्फोटक है,ग्रामीण भारी संख्या में डटे हुए हैं,पुलिस लगातार बैकअप की मांग कर रही थी यह संघर्ष सिर्फ जमीन का नहीं यह संघर्ष भरोसे का था, अधिकारों का है,और विकास की परिभाषा पर सवाल उठाने का है, परसोड़ीकला में आज जो हुआ, वह एक चेतावनी था खनन सिर्फ वैज्ञानिक तरीका नहीं मांगता…सामाजिक सहमति भी मांगता है।
खनन बनाम किसान…किसकी कीमत पर विकास?
इस मामले में दैनिक घटती-घटना के पत्रकार रवि सिंह का विचार ये हैं की अमेरा कोल माइंस का विवाद सिर्फ एक प्रशासनिक समस्या नहीं थी,यह सवाल है कि विकास किसके लिए और किस कीमत पर? जब किसी जिले में खदानों का विस्तार होता है, तो सरकार विकास की बात करती है राजस्व,उद्योग,रोजगार। कंपनियाँ सीएसआर की किताबें दिखाती हैं स्कूल,सड़क,पानी, स्वास्थ्य बताती है,लेकिन धरातल पर एक और कहानी चल रही होती है जमीन छिनने का डर,विस्थापन का दर्द,और यह भय कि गांव की मिट्टी अब किसी मशीन की धूल में बदल जाएगी,अमेरा में जो कुछ हुआ पुलिसकर्मियों पर पथराव,ग्रामीणों की चोटें, प्रशासन की बेचैनी यह सब अचानक नहीं हुआ,यह उस अविश्वास की उपज थी जिसे वर्षों से बढ़ने दिया गया,बिना अधिग्रहण काम शुरू किया गया यह आरोप सामान्य नहीं होता,किसी भी ग्रामीण के लिए उसकी जमीन सिर्फ खेत नहीं होती वह उसकी पहचान,उसकी विरासत और उसकी अंतिम सुरक्षा-कवच होती है, पर जब उसकी आवाज को सिर्फ कागज के दस्तावेजों में दबा दिया जाता है,तो उसका प्रतिरोध पत्थरों में बदल जाता है,खनन की जरूरत से कोई इनकार नहीं कर सकता,पर सवाल यह है कि क्या खनन मनुष्य से बड़ा है? क्या राजस्व किसान से महत्वपूर्ण है? क्या विकास की कीमत किसी परिवार का उजड़ना हो सकता है? यदि ग्रामीणों को लगता है कि कंपनियाँ और प्रशासन उनके खिलाफ हैं,तो यह सिर्फ विरोध नहीं, शासन पर अविश्वास का सबसे बड़ा संकेत है, सरकारें कहती हैं विकास सबका,छूट किसी का नहीं,लेकिन जमीन अधिग्रहण,विस्थापन, पुनर्वास और जनसंवाद की प्रक्रिया को देखें, तो विकास कुछ का लगता है… और नुकसान कुछ और का, आज परसोड़ीकला में पत्थर चले,कल कहीं और चल सकते हैं,यह चेतावनी है जब तक विकास को ‘न्याय’ का आधार नहीं दिया जाएगा,विरोध को ‘अपराध’ बताने से हालात नहीं सुधरेंगे,खनन जारी रह सकता है,पर उससे पहले यह समझना जरूरी है किसकी मिट्टी,किसका हक… और किसकी सहमति? विकास कभी भी संघर्ष की कीमत पर नहीं होना चाहिए,कोई भी खदान उतनी कीमती नहीं जितना एक ग्रामीण का भरोसा, और आज उस भरोसे की खदान सबसे ज्यादा खतरे में है।


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