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भोपाल@जब-जब जुल्म होगा,तब-तब जिहाद होगा : मौलाना मदनी

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भोपाल,29 नवम्बर 2025। भोपाल में जमीयत उलेमा-ए-हिंद की गवर्निंग बॉडी की बैठक में शनिवार को मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि मौजूदा दौर में इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने की कोशिशें बढ़ गई हैं। जिहाद जैसे मुकद्दस शब्द को आतंक और हिंसा से जोड़ना जानबूझकर किया जा रहा है। उन्होंने कहा…लव जिहाद, लैंड जिहाद, थूक जिहाद जैसे शब्द मुसलमानों को बदनाम करने के लिए गढ़े गए हैं। इस्लाम में जिहाद का मतलब अन्याय और ज़ुल्म के खिलाफ संघर्ष है। जब-जब जुल्म होगा, तब-तब जिहाद होगा। उन्होंने आरोप लगाया कि मुसलमानों को लगातार टारगेट किया जा रहा है और उनके धार्मिक पहनावे, पहचान और जीवनशैली पर सवाल उठाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुसलमान इस देश के बराबर के नागरिक हैं, लेकिन शिक्षा, रोज़गार और सामाजिक बराबरी के अधिकार जमीनी स्तर पर मुसलमानों के खिलाफ बुलडोजर कार्रवाई, मॉब लिंचिंग, आर्थिक बहिष्कार और नफरती अभियानों का माहौल बनाया जा रहा है।उन्होंने कहा कि धर्मांतरण कानूनों के जरिए मुसलमानों की दावत और तालीम को अपराध बना दिया गया है, जबकि कुछ संगठनों को खुली छूट है। उन्होंने वक्फ संपत्तियों को लेकर भी सरकार के हस्तक्षेप का विरोध किया और कहा कि वक्फ मुसलमानों की अमानत है, इसमें दखल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
गुरु तेग बहादुर साहिब की शहादत को याद किया
मौलाना मदनी ने गुरु तेग बहादुर साहिब की शहादत को याद करते हुए कहा कि यह सिर्फ सिख इतिहास नहीं, बल्कि पूरी भारतीय विरासत की अमानत है। गुरु तेग बहादुर साहिब का बलिदान इंसानियत, धर्म और आज़ादी की रक्षा का प्रतीक है। उनकी कुर्बानी हमें नफरत के खिलाफ खड़ा होना सिखाती है।
मुसलमानों को बदनाम किया जा रहा
आज की राजनीति में मुगलों के नाम पर मुसलमानों को बदनाम करने की कोशिश हो रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी शासक के अत्याचार को इस्लाम से जोड़ना सरासर गलत है। इस्लाम का पैगाम इंसाफ और इंसानियत है।
मुर्दा कौम घुटने टेक देती है
मुर्दा कौमें हालात के आगे सरेंडर कर देती हैं, लेकिन जिंदा कौमें अपने हक और पहचान पर समझौता नहीं करतीं। उन्होंने नौजवानों से मायूसी छोड़ने और संवैधानिक अधिकारों के लिए जागरूक रहने की अपील की।
न्यायपालिका पर गंभीर आरोप
मौलाना महमूद मदनी ने भारतीय न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हुए कहा कि, ‘सुप्रीम कोर्ट को सुप्रीम कहलाने का हक नहीं है, क्योंकि अदालत सरकार के दबाव में काम कर रही है।’ उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि एक अदालत तभी ‘सुप्रीम’ कहलाती है जब वह संविधान और कानून का सख्ती से पालन करती है। उनके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानवापी जैसे कई संवेदनशील मामलों में संविधान की अनदेखी करते हुए निर्णय दिए हैं, जिससे न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा होता है। मौलाना मदनी के इस बयान ने राजनीतिक और कानूनी क्षेत्रों में तीखी प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न की हैं, क्योंकि भारत में न्यायपालिका को लोकतंत्र का एक अनिवार्य और स्वतंत्र स्तंभ माना जाता है।


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